Saturday, April 2, 2016

केवल तुम ।


बहुत छोटी सी
शक्ल रह रह उभरती
ठीक यही
अतीत के अंधेरों मे रश्मि बन
चमक देता अक्श
लुका छीपी भावों के साथ
ख्यालो के झरोखो में
उपर नीचे झूलता सा
हवा की गंध भरती
नथूने
बनती अपनी देती जाती
पहचान
सिर्फ तुम्हारी करती मुग्ध
बसती हृदय
अचेतन के साथ तुम
निहारती रहती मुझे
ओर मैं इस चेतन देह पर
करता हुआ विश्वास
तुम्हें पाना चाहता चेतन की परछाई
नहीं संभव
मोह माया मे भ्रमित
सत्य विमुख असत्य घीरा
कैसे पाऊँ तुम्हें
तुम आओ मेरे अचेतन प्रिये
नहीं मोह चेतन
केवल निश्छल स्नेह अचेतन मेरे
दोनों ही दशाओं में
अतीत भी भविष्य भी
केवल तुम
यही कारण प्रियतम मेरे
वर्तमान मेरा दयनीय नहीं ।
छगन लाल गर्ग ।