अचंभित कर देता
मन का मोहक जंजाल
नहीं समझ पाता सत्य
असलियत जानना
युग की चुनौती बना
क्या हो
विवश कुंठित अतिशय
ख्यालों मे चल रहा जीवन
हकीकत कर देता अनदेखा
स्वप्नवत सीखने लगा जीना
शायद यही तरीका
मिल जाये सुख सागर आंशिक ही
तनिक तिनका
ओर मानने लगा हूँ दुख को
सुख का प्रतिरूप
हल्कापन आवरण
चाहत बन जाती त्रासदी
जब उबलती वेदना चिंगारी
जलाना चाहती मेरा
संपूर्ण अस्तित्व
हो जाता ज्वरग्रस्त
काटने लगती
वासना की धार
हृदय मे अरि बनकर
नहीं जान पाया आज भी
सुख छिपा जिन्दगी हैं कहां
परेशान हूँ ओढ रखी असत्य चादर
ओर भारी भटकाव मे
सुख चाह की आस लिए
सरकती जाती जिन्दगी मौत की ओर ।
छगन लाल गर्ग ।