Friday, April 22, 2016

चाहत।


होना चाहता समर्पित
अनंत अदृश्य प्रकृति कणों में
यही कहीं तलाश पायेगी
अंतिम सत्य
मंदिर मस्जिद गिरजाघर
बहुत हुआ
तलाश पूरी होती नहीं
अनेकानेक युगों का चक्कर
नहीं हो पाता समाप्त
ओर आता जाता रहा
रूप बदलता
नहीं अंत यात्रा का
आया समझ केवल एक सूत्र
आधा अधूरा पर
मन भावन अपना सा
कि हो सके रूपांतरण
जीवन का
शायद यही
वेदों का सार कुरानों का भी
सारी प्रार्थनायें सारी याचनायें
कि हो जाऊँ समर्पित प्रभु को
अदृश्य अलौकिक को
जो करायेगा करेंगे
भटकायेगा जब तक
भटकते रहेंगे
जिसमें तू राजी
उसी मे हमारी मर्जी
नहीं हमारा तुझसे अलग
कोई इरादा
अब रखो ना मेरे ईश्वर
तेरी शरण ।
छगन लाल गर्ग ।