Thursday, April 28, 2016

छाये बादल ।

छाये बादल
अविश्वास घृणा
मानवता बीच
अधिक क्षमता का अहंकार
बन चुका विचारो का धुँआ
जात पात की ऊंचाई
धर्मों का पाखण्ड
बनता जाता
कट्टरता चक्रवात
धुंधला हुआ जाता नभ
एक समान
धरती आकाश
ढक दिया आज सूरज
रश्मियों को
तल से हिलोर लेते भंवर
मिट्टी हवा मिल
उतारू हुए
भरने उडान ऊँचाईयों की
महत्ता दिखाते से
अपने सर्वश्रेष्ठ की
कालिमा का चेहरा उनका
होता जाता
उजागर ठीक रात की तरह
उठते हैं अंधड जीवन में
ठीक इसी तरह
जख्मी कर जाते
हौसले उडान के
घने अंधेरे
नही सुझता राह
ओर
गंदले इरादे लोलुप बन
बाधित करते सत्य
अदृश्य रहा सत्य
अहसास में
नित्य भरता
चेतना की आस
हर अंधड निर्मित होता
वासना की दुर्गंध से
कही बहुत गहरे
स्नेह स्त्रोत
तरल सा सत्य छिपता सा
विकसित होता
नवल प्रभात की रश्मियाँ लेकर
ओर हर उत्पात
वासना जनित
लुप्त होकर खिलने लगते
जीवन के फूल
विश्वास आस्था के
संगम का
नवल प्रभात आने दोगे
सवाल सवाल ना रह जाये
उत्तर पाये बिना ।
छगन लाल गर्ग ।