Wednesday, April 20, 2016

एकरस नहीं ।


नहीं रही एकरसता
जीवन मे उठते रहते
बेसुरें सुर
जीवन वीणा के तार
होड़ करते रहते अपने ही
सुरों से
नहीं उठता
माधुर्य भरा संगीत
जीवन सुखा सूखा
उजाड़ रस हीन
कारण नहीं आता समझ
जीवन स्वयं समझे बिना
ज्ञानी महापुरुषों का
अनुकरणीय जीवन
नहीं आता समझ
फिर
युग साम्यता का अभाव
पढ़ें पढाये चरित्र मे
विश्वास दृढ़ता नहीं
हर आचरण की
तुलना आज से
संदेह अंकुर गहराते जाते
क्या हो
कहते वह कहां करते
बड़ी अजीब हैं आज की जिन्दगी
विश्वास श्रृद्धा प्रेम हर स्थल पर
केवल संदेह
नहीं
भीतर की वीणा के स्वर
सुनने होगे
आत्मीय रस से ही
एकरसता का संगीत ऊठने दो
रहने दो तुम्हारा
भ्रमित खुद ज्ञान विज्ञान ।
छगन लाल गर्ग ।