Thursday, April 28, 2016

बहाना ।

कब तक चलता
बहाना
हर बार पलटता
ओर देता
स्वयं के भीतर
नयी ऊर्जा नया रंग
झूठ को
कि बचा जा सके
बुद्धिजीवियों की भीड़ से
इतने ऊँचाई भरे प्रवचन
सुनना भी
धैर्य की पराकाष्ठा
व्यक्तित्व परिपक्वता का
असीम परिमार्जन
मनुष्यता का
मस्तिष्क पात्र छिद्र भरा
होता नहीं भराव
ज्ञान का
बिल्कुल खाली पात्र
पर उच्च तेजस्वी
गरिमा झेलने योग्य
बनना
नहीं मानव सामर्थ्य
यह ईश्वरीय अनुग्रह
आज नहीं कर सका
कोई उपाय बचने का
विवशता हैं
सभा सम्मेलन में
संभागी बनना
तैयार होना होगा
अप्रचलित शब्द प्रवाह से
रूबरू होना
समझना या
समझने की मुद्रा धारण करना
विचारों की बहती गंगा से
पावन होने निमित्त
करना होगा मुझे
आभार प्रदर्शन भी
स्तरीय शब्दों से
आग्रह करना पडेगा
स्मृति पटल के भूले बिसरे
शब्दों को
आये यादास्त बनकर
शलाघा निमित्त श्रेष्ठों की
कि ना लगे किसी को
मूढता को आमंत्रण देकर
सम्मेलन गिरावट को
न्यौता दिया
प्रयत्न शील निष्ठा लिए
अहंकार के उद्घोष बीच आज
समर्पित हूँ
पर चाहता भी बचना थोड़ा ।
छगन लाल गर्ग ।