Sunday, April 17, 2016

गुलमोहर का कीडा ।


कीड़ों ने बना दिया
तने के बीचों बीच गड्ढा
गोलाकार भीतरी गहराई
बढ़ती निरंतर
लगता कुतरता जाता कीडा
विनाशक भाव बन
मानवता को
गुलमोहर का सुंदर वृक्ष
अब नहीं रहा
अपने सामर्थ्य को संजोकर
भीतर की ऊर्जा
नहीं कर पाया स्फूरित
ओर यही कारण
कीड़ों का
कुतरने को मिलता रहा धरातल
पर हाँ जीजीविषा का सत्य
नहीं मरा अभी
कीड़ों के रहते भी
यही वह सूक्ष्म चिंगारी
जलाती रहती नित
कीड़ों की बीमार अस्मिता
देखता हूँ नित्य गुलमोहर तुम्हें
पुष्ट बनाने का बाहरी इंतजाम मात्र
मेरा सामर्थ्य
तुम्हें नहीं देख सकता
कीडो के हाथ मरते
आज के स्वार्थमयी
मानवता कुतरते कीड़ों की तरह
जो मिटा देना चाहते
खिलते सौरभ मयी
कुसुमों का सौन्दर्य
मेरे गुलमोहर संजोते रहो
ऊर्जा स्त्रोत
भीतरी भरा अलौकिक अदृश्य
बाहरी इंतजाम केवल दिखावे
असलियत तुम्हारी
अपनी अनुभूति मे समायी
संघर्ष ओर सत्य असली पूँजी
अहसास करो फिर लडो कीड़ों से ।
छगन लाल गर्ग ।