Monday, October 17, 2016

तपिश उदगार । (1 से 9 )

    (1)
कब तक यह कहूँ अकेला
कह ना सकूँ घिरा हूँ मेला
दुख सुख सब मेरा अपना
स्थूल तन जुडे मन अकेला ।
क्या कहूँ क्या मेरी पहचान
भटका भ्रमित रूप अनजान
तनिक मोह ढूँढ रहा रसकोष
शून्य हुआ सा मन चेतन मान।
तृष्णा की तन रहती नित प्यास
वही मन रस रही वितृष्णा पास
तन लावण्य कोष कुसुम मकरंद
सुख आकर तनिक न ठहरा पास ।
नील गगन गागर छलक जब जाता
झील बनकर रस घनीभूत छा जाता
नयनो की मृदुल स्वप्न लहरिया तब
झिलमिल अमंद सुख तन ढक जाता ।।
छगन लाल गर्ग ।

(2)


ले चल कही ओर भर गया मन
ले मन शब्द वितकाल मति क्षण
जगत ताप प्रखर पल हर ज्वलंत
विश्रांत रस हीन दग्ध घायल तन ।
दे रही आमंत्रण मुस्कान भरी लहरे
ले रही संताप उडोलित तरंग बिखरे
आओ मिले गलहार मन राग जान ले
उष्मा संग यह भाव गति तन मन घेरे ।
उच्छृंखल तन उन्माद रोमांसित होना चाहे
विगत व्याघि भरा मन विस्मृत होना चाहे
उठा पटक सागर तल अनंत रस चाव घना
उत्ताल तरंगों की गाथा सम्मुख सुनना चाहे।
अवनी क्षण भंगुर तपन ठंडक बीच जीवन
करनी मन की नही प्रकृति से कर्म स्वचेतन
कोलाहल बीच अनंत स्वप्न हैं नित घायल
अपार अभिप्शा से रीता मेरा जख्मी यौवन ।
ले न दे दूँ यौवन का दरिया हिलोर लेता
दे न अंबर सी ऊँचाई मैं तरंग बन कहता
नाविक बन तो नाव मैं अनाथ जन्मों से
निश्छल प्रेम राग घना हृदय संगीत देता ।।
छगन लाल गर्ग ।




   (3)
करना होता मनन सत्य अभिव्यक्ति से पहले
अब पहले सा स्पष्ट वक्ता कैसे जोखिम झेले
चुकानी होती किमत धृष्टता भरी नादानी की
साबित होते बिन प्रमाण के खतरनाक जुमले।
केवल एक सत्य जानो ओर अपनाओ
अंध भक्त बने रहो नित सत्ता गुण गाओ
हर खटकती बात बने स्वादिष्ट स्वीकार
रहस्य यही समस्त समझ मस्ती पाओ ।
मत करो व्यर्थ चिंता नोकरी धंधे की
सब्र करो समझ अभी नही जीवन की
देश हीत त्याग करो परिवार का मोह
प्रशंसा करो राज झोली भरो आशा की।
लेखनी कथनी मिडिया लेखक कवि छाया
जिन्दगी जीते रहे सच साक्षी समय आया
करना पडे त्याग सत्य सत्ताहीत हैं देश हीत
नियम गति स्वच्छन्द आचार सीमा मे आया ।।
छगन लाल गर्ग ।










   (4)
अज्ञेय अंगूरी आल्हाद नवल मदहोशी भरा
अन्वेषण अंतरतम चाह तन मृदुल जोश भरा
वयसंधि काल आगे अदृश्य राह संकोच घना
अवयव रोमांसित स्व सिमटन तन पल ठहरा ।
आशक्त स्वयं संतुलित देह नवनीत विकसित सुन्दर
आत्ममुग्ध सी नैन मुंद करूं स्व आत्ममंथन निरंतर
परिवर्तन मोह फसी करती देह दीदार श्रृंगार नित्य
नर नेह स्वप्न पाल बढती अज्ञात राह चंचल संसार।
सतरंगी स्वप्निल सहचर प्रगाढ प्रेम पुंज पुरूष चाह
नवरंग अलंकरण करे श्रृंगार बदन शोभित रहे उछाह
पवन गति विचरण करूं प्रियतम तन मे बिखर सुगंध
नवरस संचरण तन विरल बन बहे समतल सुख चाह ।
नयन कोष मे इठलाते शैशव तज यौवन सपने
शयन काल मे रोमांसित करें प्रिय मिलन सपने
गुम गुम जाती मृगी बन तृष्णा भरे रंगीले सागर
भूल भूलैया विपिन राहे खोजूँ प्रिय मिले अपने ।
सौरभ सौंदर्य रस घुलने लगी नादान जवानी
लावण्य तन केसर रंगने लगा अपनी मनमानी
आभामंडल प्रिय कल्पित नेह से रह रह सताये
लज्जा सुन्दरी तन मन हुई मोम सी आगवानी ।।




(5)




चंचल चित चंद्र मुख झलक छिटके घना
बंकिम नयन नटखट निर्वहन नाहक बना
नेह निशां निर्मल नहाये नादान रोके मुझे
विश्वास विमल वैभव विरासत मेरा बना ।
उलझे अलक भ्रमर से नव कुसुम रसपान हित
बिखराव दिव्य रूप घना दृष्टि अस्थिर भ्रमित
कमनीय कोमल मृदु गात निर्मित रश्मि सौंदर्य
आह यह क्षण दृश्य बना हुआ सौभाग्य अर्जित ।
रूपमय नयन कंटीले चुभते करे अंतरतम छलनी
अव्यक्त रस अहसास भरते हिय रमणीय करनी
सुक नासिका नटखट नार नस नस तृष्णा जगती
नजर नेह भिगोई नद कल कल सी संगीत बहनी।
देह गदराई बंधन वसन यौवन रह नही पाता
नेह नशीला नैनों के बंधन से छलक बह जाता
कंठ कमनीय मृणाल कमल मुख सौंदर्य सहेजा
रेशम रेशा रश्मि रागिनी रंगीन रूप मे खोता।
उर उन्नत उष्मा अखंडित उरोज उच्छृंखल
नूर नारीत्व नमनीय निर्मल न्यौछावर बल
निर्मम निष्ठुर जीवन मे हर विपदा विनिमय
असीम सुख गागर भरा चित नारी हैं निर्मल।।
छगन लाल गर्ग ।



(6)
हो रही विश्रृंखल गति विरह भरी
खो रही अवचेतन मे प्राण नेह भरी
खो गई सुधबुध विगत रस गागर मे
तन विलग हुआ अब मन मे दर्द भरी ।
क्रीडा सघन रस पान अधर घनी
व्रीडा प्रिय नेह डूब सागर सी बनी
लहरो का रज्जू आलंबन सुख भरा
तंद्रा शिथिल रजनी मे व्यतीत घनी ।
प्रिय गोद सम विषम का खेल बनी
हिय मोद रस अधरों का पान बनी
तीव्र गति मन तन एक हो रहे झेल
अमंद रसधार अधरों मे स्मित बनी ।
अलक मलयज गंध घुल बिखर गये
भनक तन गंध मिल रस निखार गये
बंद पलक स्व तृप्त सुख भान असर
विहाग राग नशा भर पलक सो गये।
नही संग अब संग विस्तार स्वप्न तना
वही रस सब मग्न संसार विस्तृत घना
मन डूब रहा अचेतन कोष आनंद भरा
रही लाज संयोग चेतन मे विश्वास घना ।।
छगन लाल गर्ग ।



     (7)
नही होंगे हम गर चल दिये तुम
बची यादें तब गर कल जिये हम
नही चित रहा वश लेकर चले हो
तभी पायें रब जब संग चले हम ।
क्यों रहें अदृश्य मन की गहराई
ज्यौ बहे अदृश्य उम्र की पुरवाई
आज अनंत काल अंतराल ढहा
क्यौ चले हो फासलों की तन्हाई ।
प्रकृति बहे निर्झर बनी देखो तो जरा
हरी भरी लता लहर देती नेह नजारा
नभ प्रिय मिल लालिमा लज्जित हुआ
संयोग क्षण ना छीनो प्रिय रूको जरा ।
उलाहना अब जानकर ना दूँगा कभी
ना आ सको मौत घडी अंतिम हो तभी
आ ही गये किस्मत से अब जाने दूँ कैसे
अकेला भटका हूँ कारवाँ मिले हो अभी।
रूसवाई की सजा भी कहीं अंजाम मौत तो नही
बेवफाई नही वफा की यह अंतिम श्वास तो नही
मनुहार मानो ना मेरे भोले से दिल के खरीददार
परछाई ना बन जाये तन्हाई तुम रूको तो सही ।।
छगन लाल गर्ग ।






   (8)

प्रिय सुख संसार भूल चली
हिय दुख अविरल शौर भली
करूण रूदन अब बहे धरा
तिय तन नही शिला बन छली ।
विषम सम मिल मुझमे आन बसे
निर्मम नेह रस लंपट हो नित डसे
अवयव सुंदर सुकोमल तन पाकर
निष्ठुर निर्मम देह प्रिय शिकंजे कसे ।
अकेलेपन की चित दशा झेल न पाऊँ
भरोसेमंद साथी से निर्मम स्वार्थ पाऊँ
जीवन जज्बा जलन नित अपनत्व मे
विरानियों का बीहड जंगल जीवन पाऊँ ।
दरअसल दाग दमन लायक दिल होता
जुल्म सितम का सिलसिला चला होता
ना नाजुक भाव टूट पाते बेवफाई भाती
हमसफर ना सही आग का दरिया भाता।।
छगन लाल गर्ग ।




    (9)
तन तपीश तहेदिल बसी चैन होगा कैसे
मन मंदिर अमूर्त बन चित्रित रहती जैसे
हर परमाणु अंश देह विरल हुआ आत्मा
तडप हैं रात दिन उकेरा नही चित्र जबसे ।
निराकार झलक सौंदर्य आकार भ्रम बिंब बन
चित्रकार ललक सृजन रूपसी देह मूर्त अंकन
हर कोण देह मे दृष्टि समाहित मुझमे अद्वैत सी
विलग नही अपरिचित नही तुम वही अंतर्मन ।
तुलिका में नोक बनी तीक्ष्ण शब्द डूब गिरा बोलती
नुकीला सौंदर्य बिखरती बिंब बनके रेखा उभारती
सुगठित यौवन देह मे रति राग सरिता गति उत्ताल
नक्काशी सर्वोच्च विमोहित कर हृदय घाव भरती ।
नही तुम चित्र अब रंग तन मे जीवन भर चुका
नही तुम मित्र हो मन मुझमे एकाकार हो चुका
एक रंग एक रूप एक हृदय स्पंदित अब होता
ना तुम चित्र ना मैं सृजक दोनो बिंब दिव्यता का ।
कभी तुम चित्रकार कभी मैं चित्र दोनो खेल रहे
कभी तुली तुम कभी में बलखाती नार संग रहे
अजीब रिश्ता नर नारी बना हैं जीवन सुख भरें
उलट पुलट हम दोनो देह मिल एक संसार गहे।।
छगन लाल गर्ग ।