Saturday, April 3, 2021

काल चक्र

 विषय - काल - चक्र! 

सरसी छन्द आधारित गीत!
विधान ~[ 27 मात्रा, 16,11 पर यति,
            चरणान्त में 21,कुल चार चरण,
                क्रमागत दो-दो चरण तुकांत]

काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !
ऊपर महा शून्य डरा रहा, छूट रहा पल दिनमान!

संध्या  आई  चला अधिक हूँ, जाना है परदेश !
साहस छूट गया है मेरा , थका हुआ अवशेष!
तृष्णा वंचित काल अनूठा, कैसा है अनजान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ गतिमान !!

छूना मत गंभीर बिमारी, तन मन बना अछूत !
निस्संबल बेकाम पथिक मैं, सारे मिले सबूत!
गया काल हाँ थे मेरे सब , बीत गया दिनमान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !!

नियति खेल देखूँ अब कैसे, उखड़ी मेरी श्वांस!
दे अवलंबन मेरे जीवन, क्यों भरता निश्वास!
रे विडंबना बोल बोध से, होगी निज पहचान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !!

जीवन के गैरिक अंचल में, संध्या का उपकार!
व्याकुल घन नभ तिमिर जाल ले , ढँकने को तैयार!
धैर्यमयी स्मृति मलयानिल का, होता अब अवसान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !!

देह- विखंडित पल असीम नभ , चिंतन  में है राज !
निराधार यह मानव जीवन, समय चक्र सरताज!
शून्य पवन से प्राण हमारे, कर ले उर अनुमान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !!

छगन लाल गर्ग 'विज्ञ' !