Friday, April 29, 2016

तालमेल ।


जाने कैसे कर सकूंगा
अब परिवार का संतुलन
नहीं रहा अब हाथ मेरे
व्यवस्था का तालमेल
बहुत असंतुलित परिवार
हरेक की अपनी अहमन्यता
ओर लगभग यही सत्य
कि नहीं करते
इतने छोटे से परिवार भी
आपसी विश्वास
ओर मजबूरी
भीषणता से दमन करती
अरमानों की दुनिया
सभी चाहते स्वच्छन्दता ओर
बँटवारे का हक
बिना कुछ किये बिना अंशदान
मोहताज रहना मजबूरी
फैसले का कर रहे इंतजार
धैर्य की अंतिम सीमा
लगभग तय
सुविधा के दिनों का जोड़
हो चुका
अब केवल दुनियादारी की गरज
कि बुरे ना कहे जाये
कोई कूटनीति चाल निर्णायाधीन
अंतिम मंत्रणा का सच
बनेगा आखिरी बिखराव
फिर तार तार होंगे रिश्ते
वसूले जायेंगे उपकारों के ब्याज
ओर फिर एक लंबी प्रतिस्पर्धा
जिसमें मानवता बेशर्म होती रहेगी
अपनी अंतिम ओकात तक
सब जानता समझता अहं कारण
केवल भौतिक तृष्णा की भूख
हर किसी को
ओर जीवन होने का असली अर्थ
भूले से मृगतृष्णा मोह का अंधकार
गहराता जाता
मेरे परिवार की तरह हर ओर ।
छगन लाल गर्ग ।

दर्शन प्यास ।


समझता हूँ मैं तुम्हारी
दर्शन प्यास
मंदिर सीढ़ीयों चढते पाता
आवेग श्रृद्धा भरा समर्पण असीम
ओर तुम्हारा बढ़े पेट भी
लगभग कडक कपाट सा गिरना
मूर्ति के आगे दंडवत होना
बड़ा कठिन योगाभ्यास कर लेते
साधना के मर्मज्ञ साधक
जानना नहीं रहा बाकी तुम्हें
सभी जानते करते तुम्हें
ठठाकेदार घरानों के धनी
आम व्यक्ति का सपना हो तुम
विस्तार का दबदबा तुम्हारा
प्रजातंत्र के असली पहरेदार
यहां मंदिर भी तुम्हारे स्वागत मे तत्पर
आरती का करते इंतजार
तुम्हारे आने तक
ओर सामान्य की भीड बीच
कैसे प्रवेश कर जाते प्रभु मूर्ति पास
फिर वहीं तुम्हारा योगाभ्यास
झुकना ओर लंबवत हो जाना
अधिकांश को कर देता मंदिर बाहर
ओर तभी आपके हाथों
जल उठते मंदिर के दीये
होने लगता आधुनिक यांत्रिक कीर्तन
आरती ओर वाद्ध्य संगीत
ईश्वरीय रश्मियां प्रतिबिम्बित होकर
खोलती जाती कपाट चेतना के
युगो के बंद
भभकती चिंगारी जलाने लगी
अहंकार जंग का कचरा
ओर दीये ओर अधिक ऊर्जावान हुए
मिटाने लगे अज्ञान वर्ग की मीनार
शायद सच होने लग गया
निर्मल आकाश तुल्य पृथ्वी का सपना
आध्यात्मिक क्षेत्र अब तो पहचान आती
अपनी ओकात
पर नहीं रहना चाहता अपाहिज
बौद्धिक क्षमता मांजता जाता
बनता तीक्षण
नुकुली चुभन देती अस्मिता ज्ञानी की तरह
आखिर बोध असलियत अब दिखने लगी
बाहर भी भीतर भी ।
छगन लाल गर्ग ।


Thursday, April 28, 2016

कुम्भ आमंत्रण ।

 स्वतः नही  उठते कदम
बिना श्रृद्धा
कुंभ महोत्सव दे रहा बुलावा
घने श्रध्दा  आस्था मय राग लेते लहर
अति भीतर
ओर मै करने लगा हूँ आमंत्रित मेरी तरह
डूबने का ख्याल रखते मित्रों को
अंतिम दशा का सच जानना हो सके संभव
कुम्भ में
देखता हूँ नित्य मीडिया से
गेरू ऐ रंग में विशाल सजी सजायी मेरी
मनोभावना का साक्षात आकार
आह यह रूप एक रंग हुआ आस्थावान
नही नसीब देने को
पर पाता इतराने लगा अपने भाग्य पर
ईश्वर का असीम स्नेह बरसना चाहता
करता आमंत्रित मुझे
तन मन की यह श्रृद्धा भरी गति पहली बार
आस्था की ऊंचाई ले चढती मुझे
आओ ना साकार सत्य पाये
कुंभ मेले मे
ईश्वरीय दुर्लभ अनुभूति जीवन का सार
अनायास आया अवसर
आओ सभी मित्रो मेरे अपनो
बुलावे का अप्रत्यक्ष  अहसास कर
अपना मानव भव सुधारे ।
छगन लाल गर्ग ।

बहाना ।

कब तक चलता
बहाना
हर बार पलटता
ओर देता
स्वयं के भीतर
नयी ऊर्जा नया रंग
झूठ को
कि बचा जा सके
बुद्धिजीवियों की भीड़ से
इतने ऊँचाई भरे प्रवचन
सुनना भी
धैर्य की पराकाष्ठा
व्यक्तित्व परिपक्वता का
असीम परिमार्जन
मनुष्यता का
मस्तिष्क पात्र छिद्र भरा
होता नहीं भराव
ज्ञान का
बिल्कुल खाली पात्र
पर उच्च तेजस्वी
गरिमा झेलने योग्य
बनना
नहीं मानव सामर्थ्य
यह ईश्वरीय अनुग्रह
आज नहीं कर सका
कोई उपाय बचने का
विवशता हैं
सभा सम्मेलन में
संभागी बनना
तैयार होना होगा
अप्रचलित शब्द प्रवाह से
रूबरू होना
समझना या
समझने की मुद्रा धारण करना
विचारों की बहती गंगा से
पावन होने निमित्त
करना होगा मुझे
आभार प्रदर्शन भी
स्तरीय शब्दों से
आग्रह करना पडेगा
स्मृति पटल के भूले बिसरे
शब्दों को
आये यादास्त बनकर
शलाघा निमित्त श्रेष्ठों की
कि ना लगे किसी को
मूढता को आमंत्रण देकर
सम्मेलन गिरावट को
न्यौता दिया
प्रयत्न शील निष्ठा लिए
अहंकार के उद्घोष बीच आज
समर्पित हूँ
पर चाहता भी बचना थोड़ा ।
छगन लाल गर्ग ।

रूकना होगा ।

रूकना तो होगा
शिथिल कदम देते भेद
भीतर शायद समझे
बेतहाशा दौड़ना कब तक
नहीं संभव
ओर थकान आभास भी
नहीं तैयार मानने
हठिला अहंकार
अजीब जीवट लिए संतप्त
यह जीवन
एक आवरण चमकदार चाहता
जो विपरीत अवस्था ढकता
ओर छिपे रहे जर्जर घाव
रीसते जख्म खाये
अंदर बाहर दशा अंतराल
बड़ी जोखिम
अहंकार बरकार रहे लक्ष्य
ओर दुआऐं करता रहता परमात्मा
बनायें रखना आबरू मेरी
कि जी सकूँ
व्यवहारिक जीवन मे वर्चस्व बनाये
ओर यह तभी संभव
जब दिखूँ ढका ढका
गरिमा पूर्ण
भीतर की गंदगी ना दिखे
शिथिलता ढक जाये वैभव चमक
ओर दुर्गंध रोक सकँ
विदेशी परफ्यूम
कृपा मात्र इतनी देना
कि ना हो सके प्रकट
मेरी असलियत
देखो पूरी ताकत का दांव
कि ना हो रूकना
बनावटी जिन्दगी का
हाँ मित्रों का सहयोग
अप्रकट चाहता
अगर मिल सके।
छगन लाल गर्ग ।

मापदंड ।

निर्धारित मापदंड
यांत्रिक कर देता जीवन
नव सृजन क्षण होते दमित
मूल्यों की बेडियाँ
बाँधे रखती मनुष्य का स्पंदन
अधिकांश बार
मूल्यों के भय छूट जाते
मानवीय संवेदना कर्म
नहीं होती हिम्मत रीतियों विरुद्ध
सत्य पावन ओर सहृदय जीना
मानव बन संवेदनशील पल
ओर सभ्यता देती चमक
बनावटी बेअर्थ वैभव धुन
जिसमें पीसती जाती
मानवता
ओर छल साम्राज्य हुआ जाता
आच्छादित नैतिक मूल्यों पर
नहीं मिलती झलक
कि व्यथित अहसास हो कहीं
वात्सल्य स्नेह
या औलाद कर्तव्य बोध
धंसता जा रहा युग स्वार्थ के अज्ञात कुएँ
क्या कहूँ
घनी उद्र भ्रांत दशा भटकन मात्र
यह जीवन
स्वार्थ पूर्ति प्रयास ले डूबता नित्य
अनीति कदाचार ओर शोषण के ताल
उधर मापदंडों की स्वीकृति
मूक मन मिलती रहती
ओर युग प्रगति का यह नया आयाम
होता जाता यांत्रिक मानव
आत्माहीन संवेदना शून्य
बौद्धिकता की सीढ़ी से उठना होगा
थोड़ा ऊपर
करो ना पकड ढीली
बढ़ो आगे मानवता की ऊँची सीढ़ी
वहीं ले जाती दिव्यता की मंजिल
अन्यथा
जीवन पाये भी अनपाया सा
बिना मानव मर्म पाये।
पशुवत ही काल खींचता निरंतर ।
छगन लाल गर्ग।

रोशनी ओर नींद ।

नहीं पता नींद रात भर
आती भी रूकती डरती
अधिक तर रोशनी रहते
आँखों का बुरा वक्त
जलते दीये रहते घेरे
आँखों की रोशनी बंद पलकों से
झांकती पलक के पार
सिन्दूरी घनत्व
से होना पडता एकाकार
मोटी परतों मे कुंठित हुई
बाहर पसरे उजालों से विलग
दीवारों सिमटी रोशनी
तेज हीन विवशता से बाधित
विश्राम कहां अपनेपन का
फिजूल का बाहरी प्रकाश
करता बाधित
नींद के गुमनाम अंधेरों में
नहीं जाने देता
ओर अचेतन की दुनिया
जहाँ भटकता पाना चाहता मैं
विश्रान्ति का राज स्वप्नवत
सुख भरा डूबना चाहता संपूर्ण अस्तित्व
बाहर भीतर दोनों ही उन्मादित
देते रहते चेतन का गुलाबी आँगन
अचेतन ना पाऊँ
पर सत्य इतना सा
बिना अचेतन पाये चेतन
नहीं ला पाता असलियत में
नवीन ऊर्जा ताजगी युक्त सवेरा ।
छगन लाल गर्ग ।

खूबसूरती ।

खूबसूरती करती मोहित
आशक्त हूँ मैं
नशीला रूप मादक यौवन
सुरभि बिखेरता तन तुम्हारा
मधु हलाहल का हिलोर लेता
असीम गहरा दरिया
खो गया संपूर्ण अस्तित्व
नहीं रहा मैं
समर्पित मन वासना गंध से
उतेजित उन्मादित
बहुत विशाल सृजन का स्वामित्व
मन करता जाता सवारी
सौन्दर्य के अथाह घनत्व पर
पर कहीं हल्की सी खरांच
उभरती दर्द की जलती लकीर
दागती जाती हृदय का कोमल अंश
करती घात आत्मा पर
नहीं शरीर सौन्दर्य से नाता
आत्मा का
अनंत फासला
आत्मा ओर शरीर बीच
सौन्दर्य शरीर केवल
झरोखा बना
असलियत की झलक का
मत समझना इसे सर्वांग
अतुलनीय दुराव
आत्मा व शरीर बीच
पाटना असंभव
मत रूको इसी सौन्दर्य
सीढ़ी केवल यह
संकेत करती
परम का
मत रूको मेरे प्राण
शरीर सौन्दर्य
रहोगे क्या पास बूझते भी
शरीर का सामीप्य बनाता
आत्मा से फासला
ओर सत्य
तरसता प्राण चाहता
परमानंद परमात्मा तुल्य
रहो ना समीप आत्मा के
हो सकोगे
दूर तन सौन्दर्य
स्वतः अलगाव ओर परिणाम
सघन चिर आनंद आत्म सौन्दर्य
मेरे प्राण
नहीं चाहता संसारी छलभरा
सौन्दर्य जो देता तृष्णा रस केवल क्षणिक ।
छगन लाल गर्ग ।

ज्ञान प्रदर्शन ।

बड़ी रहती आँकाक्षा
मेरी मिले मौका
बता सकूँ अपना संचित
ढूँढता अवसर हर समय
नहीं चुकता मौका
यदि मिलता
बताता जाता अपना ज्ञान
बिना आवश्यकता बिना पूछे
उथला हूँ घना
पूर्णता नहीं आई अभी
कारण यही कि रहता हूँ हर समय
लालायित प्रकट होने
बताना भी स्व को बड़ा खतरा
पर लेता हूँ जोखिम
ओर करता जाता अधूरेपन का प्रदर्शन
बार बार पाता हूँ संतुष्टि
बहुत गहरे जानता हूँ मैं
बहुत गहरे तक पसरा मेरे भीतर
अज्ञान का अंधकार
ओर यही कारण शायद
इस अभाव की प्रतिक्रिया का मूर्त
स्थूल बन चूका हूँ मैं
पाखण्ड युक्त ज्ञान सुना सुनाया
बिना प्रमाणित
केवल हल्के स्पर्श से स्पंदित हुआ
करने लगा
भावनाओं का विश्लेषण
शाब्दिक समझदारी मे उलझा हुआ
गूँथा मेरा व्यक्तित्व
बौझिल हो चुका अपनी ही मार
अच्छा हो शब्द राग बने
स्वर बन लहर बने
ओर विलय हो सके अमूर्त प्रकृति
पवन की संगीत ध्वनि बन
प्रार्थना राग पहुँच सके प्रभु द्वार ।
छगन लाल गर्ग ।

भटकन।

कठिनाई हैं बड़ी
नहीं होती शिथिल
भटकन
बढती बेचैनी निरंतर
नहीं ज्ञात रिक्तता
असीम आकांक्षा से घीरा
निरीह अक्षम बना
ढूँढता जाता अनंत में
अपनी सुख तृप्ति निमित्त
उडता जाता मेरा नित्य
चेतना कबतूर
नहीं मिलता कहीं ठौर
ओर थकान आती नहीं
कि करे आस विश्राम
अल्पता भरे छितरे छाये
उड़ान सत्य असत्य भरा
बेभान बेबूझ
कभी किसी ने कहां पाई
विश्रान्ति अनंत अतीत मे
सत्य झूठलाती चेतना को
कैसे मिलेगा किनारा
बाहर बाहर
असलियत जानबूझकर भी
चमकदार तृष्णा से
हठ करता जाता सुख की
ओर चेतन भ्रमण
होता रहता भ्रमित
क्षणिक प्रलोभन
भूल भूलैया का सुख देकर
जर्जर करते जाते स्वप्न
सत्य रह जाता अपूर्ण
अजान
लौटोगे क्या मेरे चेतन
वापस अपने घर
भीतर हैं सर्वस्व जो चाहते
बाहरी यात्रा
सुख नहीं केवल मृगतृष्णा
करो विश्वास खुद का
शायद पा जाओ पूर्णता का सुख।
छगन लाल गर्ग।

उलहाना।

ढंग की जगह तो हो
सुनता आवाज मित्र की
मुस्कान की जगह
कसैला चेहरा उनका
देता उलाहना सुबह सुबह
लगाता हूँ हिसाब
समय देखकर
सत्य कहते हैं मित्र
क्या हो जवाब इसका
नहीं शब्द केवल मुस्कान
काफी मित्रता निभे
अकडे असमर्थ पैरों का
यह पड़ाव
निर्माणाधीन नीव सडक से सटी
थोड़ी बाहर बैठने लायक
मलबे घीरा एक रास्ता
उसी से पहुँचा मुडेर तक
बैठा सोचने लगा विगत
ठीक कहा मित्र ने
बैठने का स्थान
थोड़ा ढंग का हो
लगे सभ्य व्यक्ति सा
मजदूरों की तरह बैठना
अपनो की तोहिन ही तो
फिर मिसाल बनते हम
ओर शर्म महसूस करते
मित्रगण ओछी हरकत से
रास्तों मे मुडेर बैठक
भई वाह बुद्धि कुंठित हुई शायद
कितना संवारा खुद को
देह की पहचान इसी कारण
मन की दशा भी
देह करती निर्धारित
बाहर का सत्य देता पहचान
व्यक्तित्व का तोल भी
उसी अनुरूप
सर्वमान्य पहचान मात्र इतनी
कि आम का तिरस्कार करने की
क्षमता कितनी घनी पाये
ओर आज यही करता महसूस
जब सामान्य बना
जीने लगा तिरस्कार का जीना
अब नहीं कद्र संस्कृत जीवन
धन का वैभव
स्वयं संस्कृति सद्भावना सद् गुण
भीतर स्वत्व भाव अवधारणा
आदि बिना वैभव बेमानी
निश्वास भरता उठता हूँ
समर्थता चलने की
करता महसूस बढता घर की ओर।
छगन लाल गर्ग ।

छाये बादल ।

छाये बादल
अविश्वास घृणा
मानवता बीच
अधिक क्षमता का अहंकार
बन चुका विचारो का धुँआ
जात पात की ऊंचाई
धर्मों का पाखण्ड
बनता जाता
कट्टरता चक्रवात
धुंधला हुआ जाता नभ
एक समान
धरती आकाश
ढक दिया आज सूरज
रश्मियों को
तल से हिलोर लेते भंवर
मिट्टी हवा मिल
उतारू हुए
भरने उडान ऊँचाईयों की
महत्ता दिखाते से
अपने सर्वश्रेष्ठ की
कालिमा का चेहरा उनका
होता जाता
उजागर ठीक रात की तरह
उठते हैं अंधड जीवन में
ठीक इसी तरह
जख्मी कर जाते
हौसले उडान के
घने अंधेरे
नही सुझता राह
ओर
गंदले इरादे लोलुप बन
बाधित करते सत्य
अदृश्य रहा सत्य
अहसास में
नित्य भरता
चेतना की आस
हर अंधड निर्मित होता
वासना की दुर्गंध से
कही बहुत गहरे
स्नेह स्त्रोत
तरल सा सत्य छिपता सा
विकसित होता
नवल प्रभात की रश्मियाँ लेकर
ओर हर उत्पात
वासना जनित
लुप्त होकर खिलने लगते
जीवन के फूल
विश्वास आस्था के
संगम का
नवल प्रभात आने दोगे
सवाल सवाल ना रह जाये
उत्तर पाये बिना ।
छगन लाल गर्ग ।

बेदर्द रिश्ते ।

बेदर्द हो चुके
समय के साथ
रक्त संबंध रिश्ते
नही कर पाते
बाहरी अहसास
विगत संजोए जर्जर टुकडे
आस्था व सहारा ढूँढते पल
अपनो से
नही मिल सका भीतरी
ममत्व कि संस्कृति बने
ओर नव पीढी
ले सके संस्कारों की सीख
अपने घर से
किताबे नही सार्थक
संसाधनो की क्रांति बीच
अस्तित्व अपूर्ण सा
नही टटोली जाती
विधालय शिक्षा अतिरिक्त
कही ओर
अनजान त्रासदी झेलता युग
चकाचौंध हुआ
भूलता जाता स्व नीजता
रिश्ते के दर्द
अब मात्र दिखावा
भीतर बहुत गहरे विभत्स घृणा
धूमिल करता व्यक्तित्व
नफरत का दम घौटूं धुँआ
जहर भरता सारे रिश्तो मे
क्या हो चेतना का
रही कहां स्वयं की
आराम पसंदगी सभ्य जीवन
लेता रहता प्रेरणा
टी वी सीरीयल से
जहां यथार्थ के नाम
विघटित परिवार व रिश्तों की
अतिशयोक्ति भरती स्वार्थ की जेब
स्वता बिना यह तरक्की
नित्य डरावनी लगती
पहचाना होगा अपने बूते
समय का सच ।
छगन लाल गर्ग ।

जीवन लक्ष्य ।

समझ नही पाया
आज तक
जीवन लक्ष्य
साहित्य साक्षात
नही आया
जीवित रहने मे काम
आवश्यकता होने पर
विलुप्त हो जाता
किताबी ज्ञान
बदलता हैं हर पल
नये अंदाज लिए
विवेक गडबडा जाता
अंधेरों के घने छाये
रोकते हैं रोशनी
बाहरी ओर भीतरी
ऐसे मे मेरे चेतन
आत्मीय रहो ओर छुओं मेरी
अंधेरे की दुनिया
महसूस करो मुझे
मेरा पात्र खाली घना  
स्व उत्पन्न विचारधारा
टेढे मेढे रास्तों सी
नही चला जाता
इस गति बढती लंबी दूरी
कैसे होगी पार
मिलेगी मंजिल संदेह अटल
नही जीया जाता खामोशी
ओर शब्द नही होते समर्थ
विश्वास दे सकूँ जिन्दगी तुझे
शब्दों से
एक गुमनाम गली बन चुकी
जिन्दगी
ओर सहारे सभी व्यवहारिक
जिससे चलता रहता
व्यवसाय जीवन का
अंत शून्य भरता जाता
अंतहीन जिज्ञासाओं का झोला
केवल सत्य सार मिथ्या जीवन तेरा
खूब कहो पलायन वादी मुझे
अच्छा है
कुछ कहने लायक बनने मे
पात्रता तो हो ।
छगन लाल गर्ग ।

खोने दो।

खोने दो
अपने लय अपने भाव
घट भीतर घटता रहे
मेरा अपनापन
मैं नहीं रहे मुझमें मेरापन
डूबता हूँ अगर
अच्छा रहेगा कला के लिए
डूबने दो
तुम मैं बने मत रोको डूबने से
भीतर बहने लगा
लीन होने लगा स्व भूला
एकाग्र हुआ जाता
अपनी भाव दशा
प्रस्फूटन होता जाता नव बोध
नया गीत नये अर्थ देता
निरूद्धेश्य अमोलक
काव्य अपना सा
ध्यान आता
चेतन स्वाद बन निराला
नहीं लक्ष्य
कीमत लगे स्व की
यह सृजन पुत्र सम
दिव्य अलौकिक राग भरता
चेतना में
निश्छल निरीह निष्पक्ष निस्पृह
रहने दो ।
छगन लाल गर्ग ।

होली आई ।

आई अब अलमस्त तूं होली
प्राणों मे ललक नवल रस गागर
छलक छलक रस धार गिराये
अवनी अँचल सौरभ छलकाये
लहर उठी चित सागर में
प्रेम क्रीड़ा भंवर उफान घीरा रे
मन चंचल उभार तन गिरता जाये
रंग बिरंगे सपने सच मे
आज सभी मिल मिश्रित कर ले
तेरा मेरा मिल जाने दे
नया रंग मिल अंकुर ले ले
उछल उछल अरमान सारे
बहुरंगी बन हमे नवरूप दे
भाव भरा मेरा प्रेम भीगा रंग
बिखर जायें तेरे आँचल में
देख अलबेली
अल्हड यौवन तेरा
करवट लेता भीगता जाये
आओं ना जरा
थोड़े से पास भी मेरे
मादक नेह कंपन राज समझ ले
महक उठी तेरी रूपहली मदिरा
मुस्काने लगी अब अधरों की लज्जा
नाजुक देह तेरी अंगुरी सी डार
रंगों मे घूलता जाय रंगीला यौवन
गीले बदन मे उठता मद ज्वार
मन नहीं तन नहीं फिसलन
केवल मदहोश मौसम आज
मिल मिल जाते प्रियतम गात
उन्माद गहरा बेबूझ हुआ भान
तूं ही तूं छाई हर ओर
प्रेम मदिरा पान किया अब
नशा घना उतरे नहीं तुम बिन
आओ प्रिये बन रसभरी कलिका
मकरंद घना उफनता जाय
लोलुप भंवरा नियत नहीं नियंत्रित
अलक पलक बेभान बुलाये
रंगों मे प्रेम रस रंग मिला ले
होली त्यौहार जीवन बन जाये ।
छगन लाल गर्ग ।

मेरे व्यतीत ।

आये तुम मेरे व्यतीत
अनहोनी नहीं होनी यह
कैसे तुम जा सकते
मुझे छोड
मेरी हर आह ने बार बार
पुकारा तुम्हें
कैसे हो सकते तुम पराये
सुलगते अंगारे पीघल पीघल बहे
आँसू बनकर
विलुप्त होंगे कैसे
तुम हो उन आँसूओं की पीर
 लेते आकार मूर्त हुए
रूप नव अंकुर लेकर
विभूषित करते मुझे विनोद से
आह भार जीवन हरण कर्ता बन
ईश्वरीय कृपा रूप बदला
तुम मे संपूर्ण मूर्त हुआ
सौभाग्य मेरा
अब बहुत संतोष मुझे
तुम देना अंतिम सहारा
मेरे व्यतीत अब आये तुम
नव भव मेरे बनकर
वादा कहां अब सत्य बने तुम
सब मिला मुझे
एकाकार हुआ अब सफल भव मेरा।
छगन लाल गर्ग।

संतप्त अतीत ।

संतप्त करता अतीत
अपने अस्तित्व के लिए
वर्तमान को
कि आंशिक ही सही
वर्चस्व का उभार बार बार सताये
प्रतिशोध की तरह
अकारण बेकसूर होते भी
 कसूरवार की तरह
अंतरमन का अतीत से जुड़ाव
बेमेल रिश्ते की तरह
सालता व्यतीत होता
नहीं कारण पाता वर्तमान से
कि जीये अतीत बन
निर्जीव निष्क्रिय अचेतन
पर यह मन अतीत ही हैं
त्यागे इसके
अतीत भी मन भी दमित होता
ओर यह त्याग
नहीं सामान्य क्रिया
कि संभव हो सके
बिना मर्मज्ञता भीतर की
एक उलझनभरा समझोता
विपरीत प्रकृति का
मन ओर चेतना बीच
वर्तमान ओर अतीत बीच
ओर कच्चापन लिए
यह तन ओर विवेक
गहरा भंवर घीरा यह अस्तित्व
क्या हो कैसे हो
चिंतन भार से बाधित ग्रसित जीवन
आह यह भार
नहीं होता समायोजित
जीवन ओर मृत्यु के अंतराल बीच
अदृश्य असीम अव्यक्त
बहुत दूर तक नहीं कर पाता यात्रा
अतीत का मारा मन
प्राणों का राग गाना चाहता
अस्वर अराग अविरल संगीत
ओर यह सब
नहीं होगा अतीत ना भावी
करना होगा अभी
आओ मन झूको आगे
वर्तमान बन
कि पा सको असलियत तुम्हारी भी
जीवन कारण भी ।
छगन लाल गर्ग ।

Wednesday, April 27, 2016

मेरा अपना ।

असली जिन्दगी चाहता
थोड़ा सा ही वक्त मिले
जिसे कह पाऊँ
मेरा अपना
मैं समाया हुआ
 हर पल की छाया
हो सके केवल मेरी
शायद यह अहसास उन्माद वस
नहीं असलियत
जिसे कहूँ पूर्णाहूति समय की मेरे भीतर
समा सके
नहीं सत्य जमीन आसमां
कहने का मात्र
यह भी कहां सत्य
बदलाव मेरी तरह इनका भी घटता
पल प्रतिपल
कुछेक हैं जिन्दगी
यह दान हैं ऊर्जा का
परमात्मा का दिया
तपिस मे जलता सा अपनी ही
नहीं झांक पाता
ओरों की तपिस जो जलते रात दिन
अभावों की आँधी
चाहता सबकुछ अपनी आगोश
अंधा बना स्वार्थ जीता रहा प्रति पल
समय का बिगूल हो चूका
अंतिम लय
अब उठानी होगी मुँह की नकाब
कि निहार लूँ
दिखे कहीं तेरा मुकाम
कि पुकारू तुझे
ऑखों को थोड़ा नूर दे
कि पहचान पाऊं तुझे
हर जगह पर्दे दर पर्दे लगे
नहीं आता रोशनी का कतरा
पुकारता हूँ तुझे
बंधे बंधाये शब्दों मे नहीं
आंतरिक स्वर बेशब्द हैं बुलावा मेरा
मेरे प्रभु दो ना अवसर
कि जीऊँ
मेरा असलीपन बाकी अवशेष मे
दो ना चेतना
कि उतार लूं तुम्हें दिल मे
मेरे पूर्णता से
पूर्णाहूति पा सके जीवन मेरा ।
छगन लाल गर्ग ।

साथी मेरे ।

ले चल मुझे साथी मेरे
व्यर्थ हुआ जाता क्षमता का
अहंकार
नहीं शरीर ओर प्राणों का समन्वय
विपरीत प्रकृति
ससीम तन का जौश केवल तन्द्रा
अज्ञान का पूँज
शिथिल होते ही हुआ तार तार
विवश कातर क्षुब्ध दशा
टूटता अहंकार ही नहीं स्व भी
चेतन अचेतन का यह विश्रृंखल रूप
असमझस भरा
ओर जर्जर हुए जीवन क्षण भी
चलना रहा हैं बाकी
प्राण कहे तक
मेरे संसार पथगामी
ले चल मेरे साथी
नहीं स्वच्छ अब संसार अपना
स्वप्न धूमिल सागर लहरें
कोलाहल बन रहा मोह जाल अब
तजना चाहूँ साथी अवनी
निश्छल स्नेहिल रागमय निर्झर
गगन मूर्त बन स्वर संगीत बना
कहता मधुमय वेराग्य राग घना
ले चल वहीं अब साथी मेरे
अनंत असीम से आती लहरें
अदृश्य बिम्ब स्वर बन गूँजन देती
शायद भीतर स्व रिक्त हुआ रे
खालीपन का भान हुआ रे
अस्तित्व संग अपनत्व अब व्यर्थ हुआ रे
चल रे साथी देर हुई रे
ले चल मुझे भी साथी मेरे ।
छगन लाल गर्ग ।

दिक्कत ।

दिक्कत तो होती हैं
जब तुम जीते हो इंसानियत
इस युग बनते जब दकियानुसी
हर प्रतिष्ठित मेहनत से बना अमीर
ओर मेहनत
निर्बल को हौशियारी से गिराने की
उसी की छाती पर निर्भर तरक्की
तुम अपने हो इससे कहता
आशाऐं जुड़ी तुमसे
ओर तुम
असलियत बन गये मेरे ही विरुद्ध
भाई यह तो भीषण छल तुम्हारा
कैसे कर सकते तुम यह सब
जरा सोचों
नन्हे बच्चे तुम्हारे
बिना मेरे सहारे ले पायेंगे शिक्षा
प्राइवेट स्कूलों में
ओर सरकारी स्कूल कहां हैं शिक्षक
ओर जो हैं वे सरकारी योजनाओं में
प्रतिनियुक्ति पर
स्कूलें बिना शिक्षकों के
सुनो समझो छोडो नाटक ईमानदारी का
अपनाओ मुझे मैं हूँ बेईमान
मजे करो ओर कराओ
थोड़ी सा समर्पण नेताजी के प्रति
जिन्दगी बना देगा
अरे फायदा उठाओ तुम पढ़ें हो
अनपढ साक्षर मंत्री बने
क्या बिना समर्पण के
अकड ईमानदारी छोड़ो
जीना सीखो दुनियादारी
शून्य कर दो विचार सहृदयता ना रहे
केवल दिखावा हो मानवता का
ओर वो तुम हो
आकार शरीर देता सूचना
तुम्हारे मानव होने की
बाकी छोड़ दो मुझ पर
विश्वास करो मुझ बुराई पर
आखिर आशाऐ पूरी मैं ही करती
जीवन का सुखद सार
बांटती अपनत्व देती
अब मनन चिन्तन का नहीं युग
जिन्दगी जीने का संघर्ष मात्र
ओर बिना बेईमान हुऐ जीओगे कैसे
फैसला तुम्हारा
कि किसे तुम कहते उर्ध्व गमन
ओर किसे अधोगमन ।
छगन लाल गर्ग ।

अब ले चल।


अब ले चल
भर गया पूरा बहुत पाया
राग ने खूब दौडाया
नहीं पा सका तनिक भी
विश्राम
बहुत हुआ जीवन
अब नहीं जाता दौडा
ओर बिना दौडे संसार क्या करूं
जर्जर देह कैसे रहना हो
नाविक मेरे
संसार सागर बेबूझ रहा
बहुत डूबा उतराया
हांफता रहा मोहक जाल
उपर उपर नाव तेरी
नहीं डूबा संकट
तेरी नाव से बचता रहा
चलती रही सुरक्षित रहा
भीगा कहां दर्द पराये
केवल स्वयं की वासना
लिपटा रहा दुर्गंध भरता रहा
देह गेह बेकार रहा
तृष्णा ठगनी भाती रही
अनुकंपा तेरी नहीं रही
झूठ में सत्य करता रहा आरोपित
कोलाहाल घीरा सुनता रहा
नीरवता नहीं पाया
निश्छल व्यक्ति रोता रहा
ओर मैं विमोहित हुआ हंसता रहा
निर्बल बना सामर्थ्य हीन
पीसता रहा छलावे के भीषण
क्रूर दोनों हाथों
नहीं कर पाया कुछ सामर्थ्य हीन
यह नहीं की संवेदना ना उठी
हूई घनी तपिस पर नहीं बन सका
अतिशय ताप पाया बादल
बरसने लायक
टीन के बर्तन सा गर्माहट पाया
निरंतर जलता रहा जर्जर हुआ
नहीं आ सका निर्बल
ओर आज हारा थका बिना काम का
निरर्थक स्वयं से घीन भरा
आत्म ग्लानि लिए मुश्किल जीना
अब ले चल
बहुत हुआ जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।


कैसे कहूँ ।

कैसे कहूँ हकीकत
आखिर अपनी लज्जा का सवाल
आडंबर का रंगीन आवरण
ढकता रहता हूँ
लोग अपने ही करते रहते चर्चा
काल्पनिक अनुमान से
भीतरी मर्म हर बार हो जाता रहस्य
कारण जानता हूँ मैं
अधिकांश का जीवन ठीक मेरी तरह
ओर हुबहू वहीं करते जाते
जो इज्जत बढ़ाने निमित्त करता हूँ मैं
बाहर बाहर टीम टाम
ठीक शरीर की तरह बनना संवरना
ओर बनावट का प्रदर्शन
ओर भीतर भीतर होता रहता जर्जर
उधारी के कर्ज डूबा साहूकार
ठीक शरीर के कंकाल की तरह
ओढता पहनता रहता चमकती पौशाक
यह दोगलापन जीता बन चुका
प्रख्यात इज्जतदार धनी
ओर प्रजातंत्रीय व्यवस्था का नहीं रहा
अब केवल मैं
हम बन चूके बहुमत हमारा
हम ही से चलता प्रशासन सत्ता
ओर बढाते रहते प्रत्येक कदम हम
शानो शौकत मातृभूमि तेरी
बोलते जाते मुँह धोने से पहले गुणगान मे
भारतीय गणतंत्र व भारत माता की जय ।
छगन लाल गर्ग ।

तुम हो क्या ।

तुम हो क्या थोड़ा ठहरों
अपने भीतर
शायद संभावना बने
मनुष्यता का कोई अंश कहीं
तडपता ढूँढता राह अंधेरो बीच
मिल सके तुम्हें
अच्छा होगा पहचान लो अपनत्व
वहीं असल में हो तुम
बहुत कम अस्तित्व पर सर्वांग पूर्ण
नहीं हो पाती पहचान
अपनी अपने से जीवन काल
ओर चलता भ्रमित भटकाव
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे गीरजाघर
कहां नही ढूँढना होता
हारा थका करता जाता शास्त्रीय चेष्टा
तुम्हें समझने जानने की
एक अटूट भटकन भरी उलझन
पाता जीता रहा असत्य
अब लौटना चाहता मूल में
साक्षी बन देखना चाहता मेरे अस्तित्व
निकलना चाहता थोड़ा बाहर
शरीर से बाहर
ओर मिलना चाहता अदृश्य चेतन से
संचालन शक्ति की ऊर्जा
घनीभूत होकर करती नव सृजन
पहचान की चेष्टा अब अंतिम निर्णय
ओर इसी निमित्त शरीर से बाहर
पर आत्म तत्व भीतर करना होगा प्रवेश
तभी संभव होगा जानना स्व को ।
छगन लाल गर्ग ।

सद्भावना ।

नहीं ले सकता मैं
निजी मानवीय सद्भावना से
अपना सम्मान
आवश्यक होते मेरे ऊँचाई निमित्त
नीतिगत कमाई के अलावा
अपने परिश्रम से शैतानी कर
कमाई दौलत पर बने
ऊँचे उठे मकान
असल मे इन्हीं की बदौलत
मेरी बढ़ती ख्याली ऊँचाई
बहुमंजिली इमारत की वजह
अधिकांश जानते मुझे
ओर युग का सत्य भी
नेक नियत नहीं कारण इज्जत का
कि बढ़ा सके व्यक्ति का कद
हम ऊँचे पद से हैं रिटायर
अतीत देता रहा ऊँचाईयां हमें
पद की बदोलत
पर अब पद तो रहा नहीं
ऊंचा खिताब मिले कैसे
आलिशान आवासीय
बंगला वजह
यही दिलाता याद अतीत ऊँचाईयां
ओर वर्तमान का वजूद बनाये रखता
मात्र यह बंगला
दोनों ही अवस्थाओ का सच
खुला खुला साफ साफ दिखता
केवल अतीत वर्तमान
सत्य केवल एक
पहले पद जीते रहे
अब बाकी जीना रहा बंगला
नहीं मिला समय
खुद को समझकर जीना
कहीं नहीं अपना पन
जिस पर करना पड़े फख्र
व्यक्तित्व नहीं झलकता
विगत का पद ओर
वर्तमान का विशाल भवन
मात्र इसी कारण मेहरबानी
कि चर्चित रहते मित्रों मे
ओर इधर
निरंतर प्रगति मे
रात दिन अग्रसर काबिल संताने
राजनीति मे पहुँच काबलियत
ओर दिमागी कौऐ मे
अच्छी सांठगांठ आजकल
घनी प्रतिभा उजागर करते जाते
ओर आकार बढता वर्चस्व
बंगले शोषण करते नित्य
व्यक्ति की प्रतिभा ओर
इन्सानियत के संवेदनशील हृदय को
फासला बढ़ता जाता
आम ओर खास बीच
सत्य यही प्रत्यक्ष होता जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।

आओ तनिक ।

आओ तनिक बेठो
बडे व्यस्त जिन्दगी के मालिक
शुक्रगुजार जिन्दगी
तुम्हारी कि तुम मिले
ओर अहोभाग्य पाया
अब नही हर किसी के वश में
पकड जिन्दगी की
कि स्वच्छंदता हो
उसे अपने रूप गढे
अधोगति प्रबल हुई जाती
खिंचाव खूब गुरूत्वाकर्षण सा
व्यक्ति की ऊंचाईयां नही रही
सामर्थ्याधीन
अच्छा लगा तुम व्यस्त रहे
तुम स्वार्थ रस के शौकीन
बेपरवाह हृदय संवेदनहीन महत्वाकांक्षी
गणितज्ञ तुम समय जीते
यही कारण
बहुत उठे हुए ऊँचे लगते
दृष्टि भ्रमित रह जाता मैं
कि तुम हो मानव भी
अधरातलीय
ज्योतिपुञ्ज अलौकिक तुम
आओ वक्त समझ ले
ठीक होगा
अस्वाभाविक ऊँचाईयों से
खतरा घना
मनुष्यता सीढी बनती
सूक्ष्म यात्रा की
ओर तुम्हारा यह फासला अलगाव
बढने लगा आत्मज्ञान से
तुम्हारा यह खिंचाव भौतिकता
देगा अधोगति
सुनने की क्षमता कहां तुम्हारी
समस्त इन्द्रियां भीगी घनी स्थूल रस
छोडो ना
नही हुई आज तक किसी की
ठगी करती चेतना संग
आओ तनिक बेठो
कही आंशिक ही शुष्कता भीतरी भीगे
ओर कुंठित रस स्त्रोत फूटे ।
छगन लाल गर्ग ।

निंदा श्रेष्ठ ।

हो जाता कभी ना चाहते भी
किसी का अपयश
अपनी श्रेष्ठता ऊँची रखने निमित्त
योग्य को ठहराना पड़ता मामूली सा
उसकी खोई विख्यात कमजोरी
लानी होती हैं याद
चाहे अतीत की भारी गर्द जमी हो
समय की अनेकानेक परते
ढक चुकी हो
पर माहरत के धनी हम
कठोर इरादों से
साबित करते जाते लघुता
कि वर्तमान उसका
झुठलाया जा सके ओर
हमारे इरादे
ले सके नया रंग
बडे सावधान हम
अपने अहंकार की ऊँचाई का
झंडा
निरंतर लहराता रहे
दूसरों के कंधों पर निगाहे हमारी
हम धनी प्रतिमा के
निंदा रस के पारखी
हमारे बकायदा मजबूत समुदाय
ओर कार्यकर्ता
रखते अपने मुखबिर केवल
इज्जत के मोल
ओर गूँथते रहते जाल
समर्थकों निमित्त
अच्छा चल रहा आबरूदार धंधा
सम्मान के हकदार हम
तांता लगता हमारे कृपा पाने
असल हम आधुनिक साधु
तुरंत चमत्कारी
भक्तों की हर पीड़ा की
एक ही दवा
निंदा रस पिलाते आराम देते
हर्षोल्लाश मे मद भरा भक्त स्वतः
बन जाता मुरीद हमारा
अब कुछ भी कहो तुम
हम
स्वभाव से बाधित ओर
यह जीवन
अपनी नाकाबलियत नहीं मानता
अहंकार का छाया अंधकार बन
सोखता जाता जीवन रस ।
छगन लाल गर्ग ।

Tuesday, April 26, 2016

जीवन सूत्र ।

कहां हैं जीवन सूत्र
आदमी की असंभव चाह
बन जाती जीवन का असंतुलन
आदर मान का इच्छुक व्यक्ति
नही पाता अपना अस्तित्व
अपनेपन की चाह हो जाती बलवती
ओर हम मिटने लगते भीतर भीतर
क्यों आती दशा बलिष्ठ तन
हार जाता बाजी व्यक्ति मन के हाथ
यौवन का उन्माद चाहता घनी छांव
विश्रांति भरी
आंधी अंधड मिलकर तांडव चाहते
ओर फिर शिथिल विश्रांति
नही कसूरवार मूल्यांकन पश्चात
आवश्यकता बन जाती
आसरा चाहती ख्वाहिश अधोगति
प्रवाहित होने उत्सुक ऊर्जा
गेर विपरीत
नही कहना खेल यह
जिंदगी बिखर जाती एक बोल
ओर नही भाते फिर
अपने आप को घर बिरादरी
जिनके बल अहमियत पायी जिन्दगी
मिला अख्तियार
अपनेपन का एक हिस्सा बने अस्तित्व
परिवार समाज
ओर यह पल का नशा तोड देता
निर्ममता से निस्वार्थी रिश्तो को
कास पल पकड मे आता
ओर जिन्दगी इतनी स्वार्थी ना होती ।
छगन लाल गर्ग ।

विकल व्यथा ।

बहने दो आँसू
विकल व्यथा घनीभूत हुई
द्रव्य बन बह जाने दो
जानना चाहते हो तुम अज्ञात
भीतरी रहस्य
ओर निवृत्ति राह अदृश्य की ओर
करूणामय जीवन लिए चलना चाहते
चैतन्य रश्मियाँ आच्छादित
संभावना तुम जान लो यह तुम्हारे हाथ
भीतर अतिशय वेदना का दरिया
बहना चाहता अति सौभाग्य हमारा
बहने दो आँसू बन
हृदय होता जाता खाली रिक्त होने दो
आ रही जीवन में प्रभात बेला
समग्र शून्यकाल घेरता जीवन
आह बहुत मधुर मादक रश्मियाँ
अज्ञात अनजान राहो का दीदार देती
बहुत चकाचौंध नही निर्मल शांत भरा भरा
हर जिज्ञासा का समाधान देता
नीरव काल
अस्तित्व अंतिम रहस्य देता सा
जीवन मुक्त असीम यात्रा का पथ प्रदर्शन
केवल यही पल निर्मल जीवन कारण बना ।
छगन लाल गर्ग ।   

सबूत हूँ मैं ।


एक क्षण
पहले तक का
अतीत बन चुका मैं
अनंत अनंत क्षणों का
संग्रहण बन चुका जीवन मेरा
असंख्य विचार भाव ओर उद्गार
जी चुका हूँ  मैं
तब बना हूँ आज
कहीं अच्छा तो कहीं बुरा
हर क्षण रहा मेरी बदौलत
एक अनकही पुष्टता का अहसास
आता जाता पर
नहीं रह पाता स्थिर
अतीत का बिखरा हुआ जोड़
बना हूँ मैं
ओर यह अचेतन का दाग
उभर उभर कर
दग्ध करता जाता मुझे
जीवंत क्षण
अज्ञात उल्कापात झेल कर
घना झुलसा हूँ मैं
भीतर की नीरह अबोधता ने
झेले जख्म अनेक
जलती अग्नि की भीषणता के
हर कोमल अंश अस्तित्व का
जला चुका
विभत्सता का बिम्ब हूँ  मैं
मेरे अतीत का भाग्य ओर
कर्मों का जोड़ हैं मेरा जीवंत क्षण
अतीत ओर वर्तमान का
सम्मिश्रण ओर विश्रृंखल समय का
सबूत हूँ मैं ।
छगन लाल गर्ग ।

जीवन राग।

यही जीवन राग मेरा
संलग्न रहने लेता हूँ श्वासें
इस तरह मत देखो
घायल चित जी नही सकूंगा
मोहिनी हो तुम
मेरे श्वास राग तुमसे लेते तरंग
आबद्ध रहना अच्छा लगता
तुम्हें करीब से जानना चाहता
आशक्ति फिर होती प्रबल
इन्कार तुम्हारा अंगडाई बढाता
अवरोध फासले अब नही मान्य
गया वह सब दुस्वप्न
होने दो अब
शामिल ख्याल हमारे तुम्हारे
अडचन बनते हर विचार
तिरोहित कर चाहता विलय
भाव अछूयें आज बहने दो
बहुत रह गया बाकी जीना
अब तक कहां रहा स्नेहिल बंधन
कि आबद्ध नही रहा
कभी भावनाओं के झुलों मे
नही केवल स्वप्नमय रहा जीवन
आधार कहां रहा स्पर्श का
बहुत ख्वाहिश हो चुकी संग्रहित
जज्बात जिज्ञासु हुए हो रहे
ज्वलनशील ऊर्जा ठंडक चाहती
मत रोको अब
नही अब रोकना पाप ना हो जाए
फिर जीवन नही ख्वाहिश अधूरी
ओर कोहरा घुला जीवन
मृत्यु से बदतर
आशान्वित रहना चाहता
रहने दो ना
आओ जी ले एक दुनिया प्यार भरी
फिर नही भरोसा कल हो ना हो ।
छगन लाल गर्ग ।


Monday, April 25, 2016

कहते ठीक ।


कहते ठीक
मन करता सुनू तुम्हें
पर इससे क्षणिक भुलावा स्वयं को
बलात झुकने का अभ्यास करता
तुम्हारी संवेदना के साथ
गांठ तनिक पीघल सके तुम्हारी संवेदना
आह तपिस आने दो कसक भरी
शब्द नहीं उबलता बहाव पीर नीर बनता
सरकता आँखों की भाषा बना
हृदय अति गहरे
आलोडित होता भावों का समन्दर
भिन्नता का यह आलिंगन
हो उठता हलचल भरा द्वेत
समझ की स्वप्नवत परछाईयां घेरती
आलोडित झंझावत सा बहाव
हो जाता घुलनशील दो विपरीत छोर
यह मंथन तात्विक विचार संक्रमण
ओर अंकुर लेने लगता
स्थूल सूक्ष्म मिल नवाकार
असंतुलन हमारा देता घनीभूत पीडा
ओर हम सत्य असत्य का सार मिले बिना
चाहते भुलावा जीवन से
दुर्गति का जाल गुँथता नित्य हमारा स्व
अकर्ता हम बन जाते कर्ता
ओर जीवन का यह दारूण बहाव
अंतोत्गत्वा डूबाता रहता हमें अंधी कंदरा
यही सच जीवन तुम कहो कहते ठीक ।
छगन लाल गर्ग ।

हमराही ।

सामान्य धरातल का राही
भयभीत हो उठता
जब पाता राह की उठान ओर उतराई
नही तजुर्बा नये रास्तों का
चाहत होती मिले कोई साथ
ओर हो सके राजी चलने निमित्त
आगे की यात्रा का हमराही बनकर
सत्य यह भी कि चढाई का बल पूर्ववत
नही बढा घटा साथी के सहारे से
या हमराह बनने से
केवल एक अदृश्य आस्था ठहरी गहरे
कि ओर भी
मेरी तरह अनभिज्ञ रास्तों में
उठाता जोखिम आगे बढने की
असहज नही रह पाता मन
असुरक्षित मनोभाव लेते राहत
पर यह यात्रा स्थूल शरीर तक सीमित
एक चढाई रह जाती रहस्यमय
त्याग करना होता स्थूल
सूक्ष्म की यात्रा निमित्त
नही काम आता हमराह
चलना होता अकेले हर अज्ञात कदम
नही धरातलीय अनुभव की जरूरत
अच्छे कर्मो के छाये हर कदम चलते साथ
बचाने निमित्त हर आपदा अज्ञात से
स्थूल जीवन सूक्ष्म तैयारी निमित्त
इसी धरातल उठाने होंगे कदम
विश्वास स्थिर रहे
प्रभु दिशा उठे कदम व्यर्थ नही जाते ।
छगन लाल गर्ग ।

शब्द मेरे ।

कहते तुम कि
मैं अस्पष्ट असमझस भरा
शब्द मेरे नही सार्थक
उलझे उलझे खुद से खुद मे
ओर यही कारण
कि कई बार भीतर भीतर अहसास करता
कह दिया जो अनुभूति मे आया
शब्द मेरे हुए सहयोगी कि नही
शायद नही भिज्ञ स्वयं
भाव बडे प्रबल अचेतन जमे
परत दर परत
आघात होने पर ही तनिक करवट लेते
ओर वही देने लगता भाव शब्दो को
नही समर्थ शब्द कि
सत्य संभाल सके  पर
बनना होता वाहक भावो का
केवल शब्दो को
नही कोई ओर उपाय शब्दो के अतिरिक्त
ओर शब्दो में भी रहती गहराईयाँ
यह गहराई बढती तभी
जब व्यक्ति डूबता उतरता गहराईयों में
ओर महसूस करता जब होता यह
शब्द बनने लगते तीर
ओर चीरते अपने भावो की तपिश से
हृदय मेरा
नही रहती आवश्यकता
शब्द मीमांसा की
स्वतः प्रकट होते जाते रहस्य अनकहे ।
छगन लाल गर्ग ।



मंगल चाह ।

मंगल की चाह मन रखता
जीने की करता जाता कोशिश
नही हो पाता जीना मेरा
मूढता मानक बन जाता ओरों में
जानते करते परेशान
ओर बडी अजीब दशा गुजरता
जब चिढाने निमित्त
घेरे करते मूढता का प्रदर्शन पशुतुल्य
बहुत दूर निकल चुकी मानव से मानवता
अचंभित सा नवयुग का देखता हूँ दृश्य
उठती मूढता की लहरें मेरे आसपास  
ओर जानता हूँ मैं
जगत मे कोई भी कार्य निष्परिणाम नही
अति सूक्ष्म तरंगे फैलती चारों और
वातायन अनुसार
दोनो राहें उर्ध्व भी अधो भी
अब हम जगत को देते क्या इस तरह
मंगल या कि अमंगल
मनन चिन्तन के पदाधिकारी क्या सोचेंगे
इस तनिक मामूली बात पर
विनती मेरी मानवीयता कारण ।
छगन लाल गर्ग । 

खोलो ना कपाट ।

खोलो ना कपाट दिल के
बाहर छायी धूप प्रखर
ज्ञान का विस्तृत प्रकाश फैलाये
सूखता प्रतिपल स्नेह स्त्रोत
खोलो ना कपाट दिल के
बाहर सारे ज्ञान पीपाशु
भर भर गठरी ज्ञान बांधते
उठे बोझ से शिथिल हुए फिर
बिना चाह बौझ मुझ पर लादते
क्षण भर ज्ञान झेल नही पाता
खोलो ना कपाट दिल के
हम सब अज्ञानी नासमझी जीते
पर पूरी अकड से जीते
समझ आती कैसे बंद कपाट मे
तनिक ना कपाट खुला रखते
समझ के पंछी आना चाहे
अहंकार कपाट मजबूत बनाये
केवल कपाट प्रेम का खुला
अहंकार जहां विलुप्त हो जाता
समझ बन जाती प्रेम सरिता
हृदय समतल फिर बहने लगती
ओर पीयूष स्त्रोत मानव मन भरती
अब खोलो ना कपाट दिल के
बहना चाहती स्नेहिल सरिता ।
छगन लाल गर्ग ।

Sunday, April 24, 2016

प्रसिद्धि ।

नहीं ले सकता मैं
निजी मानवीय सद्भावना से
अपना सम्मान
आवश्यक होते मेरे ऊँचाई निमित्त
नीतिगत कमाई के अलावा
अपने परिश्रम से शैतानी कर
कमाई दौलत पर बने
ऊँचे उठे मकान
असल मे इन्हीं की बदौलत
मेरी बढ़ती ख्याली ऊँचाई
बहुमंजिली इमारत की वजह
अधिकांश जानते मुझे
ओर युग का सत्य भी
नेक नियत नहीं कारण इज्जत का
कि बढ़ा सके व्यक्ति का कद
हम ऊँचे पद से हैं रिटायर
अतीत देता रहा ऊँचाईयां हमें
पद की बदोलत
पर अब पद तो रहा नहीं
ऊंचा खिताब मिले कैसे
आलिशान आवासीय
बंगला वजह
यही दिलाता याद अतीत ऊँचाईयां
ओर वर्तमान का वजूद बनाये रखता
मात्र यह बंगला
दोनों ही अवस्थाओ का सच
खुला खुला साफ साफ दिखता
केवल अतीत वर्तमान
सत्य केवल एक
पहले पद जीते रहे
अब बाकी जीना रहा बंगला
नहीं मिला समय
खुद को समझकर जीना
कहीं नहीं अपना पन
जिस पर करना पड़े फख्र
व्यक्तित्व नहीं झलकता
विगत का पद ओर
वर्तमान का विशाल भवन
मात्र इसी कारण मेहरबानी
कि चर्चित रहते मित्रों मे
ओर इधर
निरंतर प्रगति मे
रात दिन अग्रसर काबिल संताने
राजनीति मे पहुँच काबलियत
ओर दिमागी कौऐ मे
अच्छी सांठगांठ आजकल
घनी प्रतिभा उजागर करते जाते
ओर आकार बढता वर्चस्व
बंगले शोषण करते नित्य
व्यक्ति की प्रतिभा ओर
इन्सानियत के संवेदनशील हृदय को
फासला बढ़ता जाता
आम ओर खास बीच
सत्य यही प्रत्यक्ष होता जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।

विसंगति ।

विसंगति वहन करता
जीने लगा
अस्मिता के लिए पहनना
सीख चुका मुखौटा
नही पकड सकता कोई
सच्चाई की जड
अनेकानेक जडे रखता
नही पकड सकते सत्य की अदृश्य जड
आसपास पुष्ट हुई फैली हैं कई
जीवन दायिनी नकली जडें
असलियत पर आवरण डाले
जागरूक रहता हर पल अपने स्वार्थ
पर साधुवाद के साथ
हर शैली में पारंगत विशिष्ट दर्जा
तुम्हारी कोई तरकीब नही पाती
मेरी असली टोह
बडा मुश्किल हैं मेरे व्यक्तित्व की पहचान
मैं स्वयं भ्रमित क्या जीने लगा हूँ मैं
साक्षात नही
अतृप्ति की वासना जीता हूँ मैं
भरसक करता जाता प्रयास
दिनभर हर कीमत पर चाहता पाना
मेरे स्वप्न मेरी  आकांक्षा
प्यासा हूँ भटकता भी पाना चाहता
सब कुछ जो हैं मेरी चाहत
ओर यही कारण बैचेनी जीता
चैतन्य दिन भर
ओर अचेतन अवस्था में
रात को स्वप्नमय निन्द्रा के साथ
पर यह सब भीतरी बात
बाहर बाहर हूँ घना इज्जतदार
संयमी सज्जन पुरुष
कैसे जान पाओगे मुझे
मुखौटों की दुनिया में ।
छगन लाल गर्ग ।

संसार चक्र ।

संतुलित चलता रहता 
संसार का चक्र 
यहां निमित्त बना संसार भी
परमात्मा प्राप्ति कारण
संसार रूपी रथ के पहिए हम
सारथी ले चला मन हमें
आश्वासन देता फुसलाकर राग लय मे
अनंत सुख का भरोसा देता नित्य 
सूर्य की तरह 
जीवन अंधेरे हटाने का आश्वासन देता
खिंचता जाता जीवन रथ
हमे जा रहे खिंचे हुए बंधे हुए 
यह रथ चलता रहेगा 
सूरज चाँद तारे सभी 
आयेंगे जायेंगे 
होता रहा इसी तरह युगों से
सत्य यही 
पृथ्वी पर हरियाली खिलेंगी
पक्षी कलरव करेंगे प्रेम मय
लेकिन हमे  इसी तरह 
अंधेरों मे खोये 
भौतिक माया मे फसे बंधे बंधाये
रथ के पहिए बन घिसते रहेंगे 
मन का दमन किये बगैर 
कैसे बन सकती आत्मा हमारी 
रथ की सारथी 
ओर तब तक मुश्किल हमारी 
परमात्मा तक रथ हांकने की 
मन के भरोसे संभव नही ।
छगन लाल गर्ग ।

बडप्पन ।

बडप्पन ही  बन चुका
लक्ष्य मेरा
ओर यही जीवन मूल्य
करता जाता हर काम
जिससे युग पहचान बने
संघर्ष जीवन
इसी निमित्त हर पल
विभिन्न आयामों में उत्सुक
पाना अस्तित्व
अपना प्रवेश दौडता मानव
लगातार अथक रहती प्रतिस्पर्द्धा
ओर आशक्ति का यह खेल
चलता रहता
यही संसार यही मोह यही माया
अहंकार निमित्त जीवन
अर्पित कर देता अपना सर्वस्व
 विष सम अहंकारी सर्प के शरण
श्याम विषेला सर्प देता दंश
विष पाया
व्यक्ति नही रह पाता सरल
बनने लगता शैतान
ईश्वरीय मार्ग से भटकता
प्रवेश करता
पाशविकता के संसार
जहां हृदय नही
शैतानी शक्ति का राज
ओर वही तय होता भाग्य
बडप्पन तामसिक प्रवृति का सम्राट
नही रह सकता मानव
अहंकार हीन व्यक्ति सरलतम ही
सरिता बन बहता सागर तक
ओर पाता विलय
सागर मे अपने अस्तित्व संग ।
छगन लाल गर्ग ।


बेअर्थ ।

हर्ज क्या किसी को
यदि मैं कह देता बेअर्थ
तुम्हारा सच
जो जी चुका पूर्ववत तुम्हारे संग
आज हो चुका निर्लिप्त तुमसे भी
तुम्हारे अतीत से भी
पर सचेत करना जरूरी
संभलकर चलने वालो को सुनाता
बेअर्थ बोल हमारे
जहां उलझन बचाव निमित्त
झूठ जीये
आधुनिक कला ओर फेशन की तरह
सत्य से किनारा कर असत्य को दिये
रंगीनियत के जज्बात
उल्टे लटके चित्र की आधुनिकता के नाम
नासमझी का सौन्दर्य व्यक्तव्य देते रहे
हम तुम गहरी तन्द्रा जीते रहे
पर आज शब्द नही देते वही अर्थ
अधिकतर शब्दो की सार्थकता रही नही
हमारे कारणवश
सत्य व शब्द मध्य बढाते रहते
हम प्रति सृजन घना अंतराल
नही लगता सत्य शब्दमय हो सके।
छगन लाल गर्ग ।

मेरे तनय ।

चल दिये मेरे सहारे
ममत्व त्याग कर
मेरे शरीर के अंश नही तुम केवल
निवासी थे मेरी आत्मा के भी
नही माना नही भाया
साथ मेरा तुम्हारा
ओर देखा कैसे मंझधार छोड
चल दिये अगली यात्रा निमित्त
अनंत तुम
ओर यह देह नही रहे
जिस पर मेरे ममत्व का हक
नही रहे तुम चल दिये बहाने बना कर
रूप अस्तित्व अस्वीकार कर
पंच तत्व विलय कर
चैतन्य परम निस्पृह सूक्ष्म तुम
नही शरीर नही तुम
अब तक मात्र आभासित रहे
बन मेरे तनय शरीर
शायद यह सबक मेरे लिए
तुम्हारा
मेरे आत्मज्ञान निमित्त
कि नही मनुष्य शरीर
चैतन्य  आत्मा मात्र
ओर तुम देखते सर्वज्ञ व्यापक
असंग हो तुम
कैसे रहते शरीर संग
पिता शरीर तुम्हारा अपात्र
ओर शायद यही कारण
चल दिये तुम
पंच तत्व शरीर त्याग
अनंत यात्रा निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।

Saturday, April 23, 2016

ऊडो ना ।

ऊडों ना थोड़े प्राण मेरे
उडता तुम्हें देख तो लूँ
तब नहीं रहेगा चेतन
ख्वाब सुखे भाव रूखे
विकल व्याकुल हुआ तब
परमेश्वर से उन्मुख होना
बात करना सीख तो लूँ
हृदय हारी चेतना से
बोध केवल शास्त्र रहता
पाप पुण्य परोपकार का
हिसाब किताब लेकर रहता
नहीं रे प्राण राग ध्वनि
आकूल श्याम श्याम कहती
नहीं रे नेह की सरिता
पावन मंथर सागर बहती
पल निमिष भर प्राण मेरे
उडने का अभ्यास देख लूँ
ऊडों ना थोड़े प्राण मेरे
उडता हुआ तुम्हें देख तो लूँ
अंधेरे घने क्या जाओगे तुम
रूप अंधला काल बनकर
अनगिनत अवरोध आखिर
पार परम पराक्रम होंगे
ओर भीतर चेतना तब
भूल भ्रम भारी कहेगी
हो सके तो प्राण मेरे
अनभिज्ञ अनहोनी अंत कह दो
चेतना मे आते नहीं तुम
केवल थोड़ा अभ्यास कह दो
ऊडो ना थोड़े प्राण मेरे
उडता हुआ तुम्हें देख तो लूँ ।
छगन लाल गर्ग।

कहने दो ।

कहने दो
अंतरमन की कसक
काल कलवित वेदना यह
बहाव चाहती
मत रोको
विडंबना का राज शायद
उकेरने निमित्त
उठती भीतर की हूक
हुई जाती घनी प्रबल
शब्द नहीं देते साथ
हुई घनी द्रवीभूत
पाये कैसे आकार पीडा सा
राग स्वर वेदना व्यथित
हुआ जाता अस्तित्व मेरा
व्यञ्जन शक्ति नहीं सार्थक
अभिव्यक्ति निमित्त
क्या हो निशब्द चलने दो
विरह राग प्रवाह होने दो
निर्मल मन
अतिसार हुआ जाता अब
विदेह मिलन
अबाध निरंतर आते हो तुम
कर देते क्षुब्ध व्यथित हृदय मेरा
अपार शिथिल शान्त व्यथा
कर जाते लघु
अब पहचानने लग गया तुम्हें
अदृश्य रूप भी तुम्हारा
होने लगा अहसास
ओर भी नाना रूप लेते
करते रहते क्रीड़ा घनी तुम
मेरे अपने
नहीं दे पाये ना तुम
धोखा मुझे
कोई भी रूप करो धारण
हर रूप तुम्हारा लुभाता मुझे
कभी सुरभि बन फैलते वायु संग
कभी दुर्गंध बन जाते मौत की
वाह अब तो
आ गये तुम मेरे घर
मेरे आंगन मेरी कोख
आह कैसी यह परीक्षा मेरी
मेरे अदृश्य इतराने लायक
भाग्य दिया मुझे
कि समझा तूने मुझे
परीक्षा लायक ।
छगन लाल गर्ग ।

भीतर प्रवेश ।


तुम हो क्या थोड़ा ठहरों
अपने भीतर
शायद संभावना बने
मनुष्यता का कोई अंश कहीं
तडपता ढूँढता राह अंधेरो बीच
मिल सके तुम्हें
अच्छा होगा पहचान लो अपनत्व
वहीं असल में हो तुम
बहुत कम अस्तित्व पर सर्वांग पूर्ण
नहीं हो पाती पहचान
अपनी अपने से जीवन काल
ओर चलता भ्रमित भटकाव
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे गीरजाघर
कहां नही ढूँढना होता
हारा थका करता जाता शास्त्रीय चेष्टा
तुम्हें समझने जानने की
एक अटूट भटकन भरी उलझन
पाता जीता रहा असत्य
अब लौटना चाहता मूल में
साक्षी बन देखना चाहता मेरे अस्तित्व
निकलना चाहता थोड़ा बाहर
शरीर से बाहर
ओर मिलना चाहता अदृश्य चेतन से
संचालन  शक्ति की ऊर्जा
घनीभूत होकर करती नव सृजन
पहचान की चेष्टा अब अंतिम निर्णय
ओर इसी निमित्त शरीर से बाहर
पर आत्म तत्व भीतर करना होगा प्रवेश
तभी संभव होगा जानना स्व को ।
छगन लाल गर्ग ।

बिखरता धैर्य ।


बहुत हो गया
आज मनुष्य तुरंत चाहता
अपने किये का फल
नहीं रहा धैर्य
अब संयम सीमा रही नहीं
धैर्य अच्छा गुण
पर एक सीमा बंधा
फिर स्वतः आक्रोश छा जाता
जब घनी मेहनत बाद भी
नहीं पाता चाहा
अपने ही प्रयास की विफलता पर
खुद से खुद के प्रति आत्म ग्लानि
घेरती बना देती कुंठित ओर दोषी
बिना किसी अपराध
दुर्भाग्यपूर्ण घड़ी जीवन की
जब आशाओं की अतिशयता में
करते जाते अथक प्रयास
क्षमता की अंतिम सीमा तक
ओर यह सबके होने पर भी
नहीं मिलता
परिणाम का रतिभर भी अंश
सच कहता वहीं वहीं यह जीवन
मनुष्य होने का अहंकार
ओर क्षमताओं का यथार्थ
हो जाते नग्न
अपनी यथार्थ कुत्चित प्रवृत्ति
ओर घृणित भद्देपन के साथ
असल मे यही जन्म लेता
आत्म निन्दा का भाव
मानव की त्रासदी का सच
अहं मिटे बिना यह समय
जीवन की आत्म हत्या का
बनता अंतिम विकल्प
पर आस्था मय व्यक्ति
जीवन सत्य का राही
संयम का साक्षी
मनुष्य देता हैं परीक्षा
धैर्य की जीवन रहने तक
उसी उत्साह उसी विश्वास
उसी आस्था से भरा
ओर वहीं पाता
असलियत का परम साक्षात्कार
वहीं धन्य वहीं परम जीवन का पारखी
अच्छा हो हम निर्लिप्त वासनामय
समर्पित रहना सीखे समय के शरण ।
छगन लाल गर्ग ।

मत कहो ऐसा ।


ऐसा मत कहो
बढ जाती हैं पीड़ा
होता हैं हर घर
अपने लिए करना किसे नहीं
लगता अच्छा
अब देखो सब दिखता
जो कभी नहीं पा सके हम
अच्छा खाना पीना
अच्छा बिस्तर खाट
सुनती हो सपना था पाला
हम दोनों ने
उस समय संचय नहीं रहा कभी
कि हम अछूत रह जायेंगे
अपने ही बच्चों से
ओर बाहर टूटी खाट पर
बतियाते रहने पर लगेगी फटकार
जरा धीरे बोलो
बहू बड़ी कडक हैं बेटे से
ख्याल नहीं आता
बेटा कभी बोला हो
उससे ऊँची आवाज
अपना नसीब
कि अभी हम दोनों हैं जिंदा
सच कहूँ
तुम फिर भी सहन कर लेती हो
फटकार
मैं नहीं कर पाता
मर भी नहीं सकता तुम्हारे कारण
देखो वादा करो
मरना मैं चाहता हूँ पहले
तुम्हारे बिना यह नरक
मुझे ना मिले
करोगी ना दुआँ मेरे लिए
वृद्धा पत्नी का हाथ बढकर
ढक लेता हैं मेरा मुँह
अस्फूट स्वर बहुत दूर से आते सुनता
ऐसा मत कहो बढ जाती हैं पीड़ा ।
छगन लाल गर्ग ।

मजबूरियाँ।

सुनना पडता अनचाहा भी
समाज व समुदाय में
मूल्य स्थापित हो सके
करता अस्वभाविक भी
रखनी होती
सज्जनता भरी धैर्य शालीन छबि
प्राकृत न होते भी
बन जाता हूँ बनावट लिपटा
पाखण्डमयी पावन शालीन व्यक्तित्व
जानता हूँ भीतर सामने साक्षात
व स्वयं का असलीपन
भीतर का खेल सब
युग का यह रहस्य वाद
बहुत अनुसंधान की जरूरत
बहुत भविष्य की उज्ज्वलता
तनिक रहस्यमय पर सार्थक
परिणाम देय वरदान तुल्य
समझना होगा युग का रहस्य
केवल इसी बहाने
बिना प्रतिभा करणीय प्रतिभा
मायिक मृगतृष्णा का स्थूल वैभव
चतुराई काग समान स्थिर कर
पायी जा सके गरिमा
कारण मात्र यही
अन्यथा आक्रोश मय आवेग
घना प्रबल
दबाता भीतर अति चेतना के जोर
भविष्य निर्माण अवसर निखरता
ऐसे ही समन्वय द्वारा
रखना होता नालायकों को भी
ऊँचे व्यक्तित्व का वजूद देकर
कि बना रहे संतुलन अच्छाई बुराई का
सुनो नहीं पर यह ज़रूरी
दिखते रहो एकाग्रता से सुनने मे मग्न
ओर तभी हो सकेगा
अधिकांश जीना हमारा शान्तिमय
जितना हम भीतर मरते जाते
उतना ही बाहर का विस्तार मिलता
ओर इस युग बहुत आवश्यक
भीतर के विस्तार से
बाहर के वैभव का विस्तार
युग सत्य के ताप फ॔सी हुई
सत्ता की कुँजी भी
आज कल बंधती छूटती
तडप भरती जीती
आम जिन्दगी की तरह ।
छगन लाल गर्ग ।

स्नेहिल क्षण।

निभाने होते
अतीत के स्नेहिल रिश्ते
घने अंतराल मे
 वक्त भी विस्मृत हुआ
स्नेह की नमनीय
 रश्मि ढूँढ पकडता बार बार
ना हो जाये फिर धूमिल
ओर इसी अहसास
निकल आया
अलौकिक अनुभूति भरने
रिक्त हृदय
मेरे स्नेही यह प्यार तुम्हारा
धरोहर मेरा
गरिमा भरा
ओजस्वी निखर जाता
निर्मल स्नेह धार नहला जाती
जीया हूँ मित्र तुम्हें मेरी तरह
नहीं रखा विभाव अलगाव का
इसी अहसास आ पहुँचा
तेरे रोशन धाम
आह घनेरे प्रेमी
 प्रिय जनो का यह मेला
कुछ ओहदेदार
 कुछ विगत झेल चुके ऊँचाईयाँ
सब चमकदार कोहीनूर
इर्द गिर्द तुम्हारे
 नहीं भूलना चाहता
मेरा मोह
 उन चमकीले क्षणों को देखना
ओर स्वर्ग सा आनंद देते जब
लगाया गले मुझे
 सच कहूँ यह क्षण
जीवन का अमोलक गहना मेरा
नही रोक सके मुझे
अच्छा किया
हीनता भाव आखिर
कोई कब तक
अपना हृदय सोखे
चलो चलता हूँ यादो को लिए
सहारा बनेगी अवशेष का ।
छगन लाल गर्ग ।

जाना नही ।

क्या जाना कभी
अपनत्व का कोष
नहीं शायद
अस्मिता का आकलन सजगता देता
ओर निरंतर सचेत रहता
निभाता जाता वफादारी
 विराट काल  दूत प्रभुत्व धारी
असूर अस्तित्व विस्तृत जाल घेरे
नमित हुआ काल की कालिमा घूला
व्यथित विकल देखता राह रश्मि जाल
सुकोमल गात बीच विकसता जाता
सूर सौन्दर्य नूर विनाश निमित्त
समय का पहिया ले रहा निरंतर गति
सुकाल की अस्मिता निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।

भय मुक्त जीवन ।

खूब डराया  आज तक
शास्त्र  ओर विद्वानों ने लगातार
यह निश्चित
मृत्यु आहिस्ता आहिस्ता आती हैं पास
कैसे झुठलायें हम
हर रोज मरता हैं कोई
कैसे भूल जाऊँ
मुझे भी मरना हैं एक दिन
ओर बहुत रह गया बाकी
आज तक का किया सारा का सारा अनकिया
ओर लगता है देह पडी मरण शैया
ओर अपने चाहते जलाना
बदलाव पाता यह मन पल प्रति पल
अब जीना चाहता
ओर जब मुश्किल फसा मांग करता
मौत की
नही है भरोसे लायक मेरा मन
मौत की अनिवार्यता
समझनी होगी  ओर इसी स्मरण
व्यतीत करना होगा
भय रहित परहित कार्यो मे अवशेष समय
यही तरीका दिला सकता
मानव को भय मुक्त जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।


गूढ जीवन ।


अधिक चिंतन तो नहीं चाहता
विवशता छा जाती
गूढ जीवन
देने लगता अपने होने का अर्थ
ओर यह अनायास घेरता भाव
शांत जीवन में हलचल भर देता
लगता हृदय सागर मे
विचारों के अनगिनत फैके जाते
कंकर कि उछल जाती लहरें
तरंग बनी भावों की
चारों ओर के वृतुल घेरने लगते
शांत निश्छल विचारों को
ओर उथल पुथल मच जाती
फस जाता विचारों के भंवर
बड़ा मुश्किल होता बचना चेतन का
ओर मंथन की गति ओर होती तेज
नहीं पाता संतुलन
अस्तित्व ओर विचारों बीच
एक सूत्र देता जाता विश्वास
दृढ़ता भरा
विपरीत चिंतन हैं संतुलन
बहुत गहरे यही सूत्र जीवन का
असंतुलन की विपरीतता जीवंत रखती
स्थिर रहो भीतर
होने दो इर्द गिर्द विचारों का भंवर
ठीक बवंडर की तरह
रिक्त रह जाती धूरी जहां से शक्ति मिलती
घूमने की तीव्रता से उत्पात की
असल मे स्थित रहता चाक
जिस पर गति लेता वाहन का पहिया
सत्य यही
असंतुलन मिटता केवल विपरीत दशा में।
छगन लाल गर्ग ।

लाचारी।


कहां कहां लेते रहे लाचारी
बहुत मुश्किल हैं जीवन जीना भी
परेशान करते नित्य सेवाओं मे लगे
कर्मचारी अधिकारी
नहीं सुनते बिना सिफारिश
ओर नेता नहीं पाते आश्वासन से छुटकारा
फसे फसाये कार्यकर्ता व आम को
देते रहते आश्वासन का पुख्ता सबूत
ओर  निकलता जाता समय यूँ ही
बिना कुछ पाये करे
अब देखो ना जगह जगह टूटता जर्जर
बिजली का खंभा
टूटते दुसरे खंभो के आसरे खडा
देता जाता चुनौती किसी अनहोनी की
ओर अर्ज लिखित मौखिक करते
गुजर चुका एक पंचक
सिफारिश भी भीडवाई अफसर को
अफसर से
नतीजन देखा करा बदलने का मिलता
आज तक आश्वासन
सुनते हैं अबकी बार दबंग हैं अफसर
नहीं मानता नेताओ का
व्यक्तिश निवेदन कर चुका
आश्वासन की जगह डाँट खाया
धमकी भी
आइन्दा मत आना
हम अपने काम को प्राथमिकता से
करेंगे पूरा
आपका नंबर नहीं आ सकता इस वर्ष
लाचारी हैं ईश्वरीय दीपक जलाता
मांगता हूँ भीख
बच जाय मेरा परिवार किसी अनहोनी से।
छगन लाल गर्ग ।

Friday, April 22, 2016

हकीकत ।

कैसे कहूँ हकीकत
आखिर अपनी लज्जा का सवाल
आडंबर का रंगीन आवरण
ढकता रहता हूँ
लोग अपने ही करते रहते चर्चा
काल्पनिक अनुमान से
भीतरी मर्म हर बार हो जाता रहस्य
कारण जानता हूँ मैं
अधिकांश का जीवन ठीक मेरी तरह
ओर हुबहू वहीं करते जाते
जो इज्जत बढ़ाने निमित्त करता हूँ मैं
बाहर बाहर टीम टाम
ठीक शरीर की तरह बनना संवरना
ओर बनावट का प्रदर्शन
ओर भीतर भीतर होता रहता जर्जर
उधारी के कर्ज डूबा साहूकार
ठीक शरीर के कंकाल की तरह
ओढता पहनता रहता चमकती पौशाक
यह दोगलापन जीता बन चुका
प्रख्यात इज्जतदार धनी
ओर प्रजातंत्रीय व्यवस्था का नहीं रहा
अब केवल मैं
हम बन चूके बहुमत हमारा
हम ही से चलता प्रशासन सत्ता
ओर बढाते रहते प्रत्येक कदम हम
शानो शौकत मातृभूमि तेरी
बोलते जाते मुँह धोने से पहले गुणगान मे
भारतीय गणतंत्र व भारत माता की जय ।
छगन लाल गर्ग ।

एकांत ।


एकांत बोलना चाहता
एकांत बाहरी भी
नहीं हुआ अदृश्य मुझसे
अब करता हलचल
ओर अधिक प्रबल गति लिए
नहीं बाहरी स्त्रोत कि पाता हो ऊर्जा
अदृश्य तानाबाना गूँथता जाता
अतीत संग
ओर वहीं रमता खेलता बोलता हंसता
स्वप्नवत
बाहरी एकांत नीरव शांत गंभीर
पर क्यों नहीं होता प्रभाव
बाहर का भीतर
जबकि हलचली बाहर अभी भी मौजूद
नहीं छोडता पीछा
सत्य यह शायद सार भरा
एकांत बाहर से नहीं देता प्रभाव
जब तक भीतर की भीड़ संसारी
अतीत भोगी
नहीं हो जाती विनष्ट जलकर खाक
यह भीतरी एकांत भी
घीरा रहता अतीत के छाये
ओर नव रश्मि चुक जाती
भीतर रोशनी देने में ।
छगन लाल गर्ग ।

आमंत्रण ।


सुगंध भरा जहां
आह अलौकिक रसभरी
झलक उसकी शायद
उतरी जमीं पर
आकाशीय मार्ग खुला खुला
आह अनंत
मुस्कान संकेत नभ करता बुलाता
अपनी ओर
उन्नत अनंत की उड़ान निमित्त
जुटाना चाहता भीतरी ऊर्जा
विचारों के पंख हैं मेरे पास
बुलाओ ना मुझे बार बार
आना चाहता आवाज की रज्जु चढ़ा
बुलाओ आकाश से
दो भाव भरा निमंत्रण अपना अंश जान
उतने ही पंख दिये तूने
कि ले सकूँ उड़ान तुझ तक
भरोसा तो दो कि सक्षम बनूँ
हिम्मत हो
ओर एक बार का भरोसा ही
बन सके अनंत का सार ।
छगन लाल गर्ग ।

चाहत।


होना चाहता समर्पित
अनंत अदृश्य प्रकृति कणों में
यही कहीं तलाश पायेगी
अंतिम सत्य
मंदिर मस्जिद गिरजाघर
बहुत हुआ
तलाश पूरी होती नहीं
अनेकानेक युगों का चक्कर
नहीं हो पाता समाप्त
ओर आता जाता रहा
रूप बदलता
नहीं अंत यात्रा का
आया समझ केवल एक सूत्र
आधा अधूरा पर
मन भावन अपना सा
कि हो सके रूपांतरण
जीवन का
शायद यही
वेदों का सार कुरानों का भी
सारी प्रार्थनायें सारी याचनायें
कि हो जाऊँ समर्पित प्रभु को
अदृश्य अलौकिक को
जो करायेगा करेंगे
भटकायेगा जब तक
भटकते रहेंगे
जिसमें तू राजी
उसी मे हमारी मर्जी
नहीं हमारा तुझसे अलग
कोई इरादा
अब रखो ना मेरे ईश्वर
तेरी शरण ।
छगन लाल गर्ग ।

Thursday, April 21, 2016

नीजता ।


हर किसी को पसंद अपनी नीजता
नही चाहता कोई अवरोध हो
उसके अपने हित
ओर यही कारण कमरों के सिमटते दायरे
ओर बड़ी संकीर्ण हो उठती
श्वासों की रफ्तार हर श्वास दूसरी में
डालती अवरोध ओर जीवन लगता दुर्भर
यह संकरापन केवल दीवारों मे नहीं उभरा
जीवन की हर जरूरत
आदी होने लगी इसी मानक
ओर व्यक्ति की भावना कामना में
आने लगा बनावटी पन जरूरत लायक
हो चुके संबंध अब नहीं लगता
असली नकली मे नहीं ज्यादा संचय
वहीं हो जाता असली जो बनता सहारा
यह तब्दीली अंतिम नहीं पर निरंतर सक्रिय
लेने लगी आकार प्रगति बन
शायद इसी कारण मानव से परिष्कृत
हम सभी आज बन चुके सभ्य ओर यांत्रिक
धरातलीय महक त्याग कर लेने लगे
मंगलीय श्वास
ओर दलित पीछडो की छाती पर चढ़े
करते जाते तकनीकी डिजिटल तरक्की
स्मार्ट लोगों हित स्मार्ट सीटी का निर्माण
अच्छा हैं तरक्की नीजता विस्तार ले
ओर देश बनता रहे विश्व गुरु ।
छगन लाल गर्ग ।

ओर हुआ ।

ओर  हुआ यह
नहीं चाहते भी विद्धवता के भरोसे
ओछे ज्ञान का अहसास खुद का
यह एक निश्चय स्वयं के अधूरेपन का
मेरा अपना स्व बोध निम्न 
ओर इसी कारण
कई बार साध लेता मौन 
जहाँ देते प्रवचन उच्च पदस्थ डिग्री धारी
पर आज शिक्षा जगत की ऊँची हस्ती
शब्दों के प्रयोग को जिस अंदाज मे
ले जाते अपने अहंकार निमित्त 
ओर मतलब आपूर्ति उच्च सम्पन्न वर्ग 
अपनी मानसिक क्षमता की उच्चता पर
नहीं पा सकता अर्थ कोई 
लगता ऐसा अपनी तरह भाषा को भी
बनाना चाहते जटिल अपनी तरह
जहाँ नहीं मिले कोई अर्थ भाषा को
ओर मौलिक अभिव्यक्ति का हक
छीना जा सके क्षमता की बलिवेदी पर
यही होना चाहता आज प्रबुद्धों से
समय रहते जरूरत आ चुकी सोचने की ।
छगन लाल गर्ग ।

मेरे व्यतीत ।

आये तुम मेरे व्यतीत
अनहोनी नहीं होनी यह
कैसे तुम जा सकते
मुझे छोड
मेरी हर आह ने बार बार
पुकारा तुम्हें
कैसे हो सकते तुम पराये
सुलगते अंगारे पीघल पीघल बहे
आँसू बनकर
विलुप्त होंगे कैसे
तुम हो उन आँसूओं की पीर
 लेते आकार मूर्त हुए
रूप नव अंकुर लेकर
विभूषित करते मुझे विनोद से
आह भार जीवन हरण कर्ता बन
ईश्वरीय कृपा रूप बदला
तुम मे संपूर्ण मूर्त हुआ
सौभाग्य मेरा
अब बहुत संतोष मुझे
तुम देना अंतिम सहारा
मेरे व्यतीत अब आये तुम
नव भव मेरे बनकर
वादा कहां अब सत्य बने तुम
सब मिला मुझे
एकाकार हुआ अब सफल भव मेरा।
छगन लाल गर्ग।

आकांक्षा ।

बड़ी रहती आँकाक्षा
मेरी मिले मौका
बता सकूँ अपना संचित
ढूँढता अवसर हर समय
नहीं चुकता मौका
यदि मिलता
बताता जाता अपना ज्ञान
बिना आवश्यकता बिना पूछे
उथला हूँ घना
पूर्णता नहीं आई अभी
कारण यही कि रहता हूँ हर समय
लालायित प्रकट होने
बताना भी स्व को बड़ा खतरा
पर लेता हूँ जोखिम
ओर करता जाता अधूरेपन का प्रदर्शन
बार बार पाता हूँ संतुष्टि
बहुत गहरे जानता हूँ मैं
बहुत गहरे तक पसरा मेरे भीतर
अज्ञान का अंधकार
ओर यही कारण शायद
इस अभाव की प्रतिक्रिया का मूर्त
स्थूल बन चूका हूँ मैं
पाखण्ड युक्त ज्ञान सुना सुनाया
बिना प्रमाणित
केवल हल्के स्पर्श से स्पंदित हुआ
करने लगा
भावनाओं का विश्लेषण
शाब्दिक समझदारी मे उलझा हुआ
गूँथा मेरा व्यक्तित्व
बौझिल हो चुका अपनी ही मार
अच्छा हो शब्द राग बने
स्वर बन लहर बने
ओर विलय हो सके अमूर्त प्रकृति
पवन की संगीत ध्वनि बन
प्रार्थना राग पहुँच सके प्रभु द्वार ।
छगन लाल गर्ग ।

अलौकिक क्षण।

बीत अतीत के स्वप्न प्रभात नव झलक दे दी
नभ नव सागर उल्टा हुआ रीत रहा जल भेदी
तारों लगी चुनर झीनी मुग्धा ने मुस्कान दे दी
अरूण अंचल हटा मुख उषा नेह झलक दे दी
पखेरू मृदु हवा में उडने लगे
कपोल वायु संग डोलने लगे
नव अंकुर डाल से फूटने लगे
लतिका नवल भ्रमर उडने लगे ।
कलियाँ सौंदर्य रस परिपक्व हुई
नवल मधुर मुकूल गागर गात हुई
रस मादक बन हिलोरे उफान हुई
लावण्य तन रस समर्पित काम हुई ।
उन्माद उन्मुक्त उमंग उछाल छा गया
अधराधर नव कपोल बन भाता गया
आह अमंद अमृत आल्हाद पीता गया
आच्छादित आनंद अलकों आता गया।
आह जीवन मिलन का क्षण यह मेरा करो
वैभव अगर तुम देना चाहो जीवन यही करो
स्पर्श रूप रस आनन्दित जीवन नित ही करो
मधु लहरे नित असीम उठे सुख उपाय करो।
छगन लाल गर्ग ।

बदलते रिश्ते ।

बेदर्द हो चुके
समय के साथ
रक्त संबंध रिश्ते
नही कर पाते
बाहरी अहसास
विगत संजोए जर्जर टुकडे
आस्था व सहारा ढूँढते पल
अपनो से
नही मिल सका भीतरी
ममत्व कि संस्कृति बने
ओर नव पीढी
ले सके संस्कारों की सीख
अपने घर से
किताबे नही सार्थक
संसाधनो की क्रांति बीच
अस्तित्व अपूर्ण सा
नही टटोली जाती
विधालय  शिक्षा अतिरिक्त
कही ओर
अनजान त्रासदी झेलता युग
चकाचौंध हुआ
भूलता जाता स्व नीजता
रिश्ते के दर्द
अब मात्र दिखावा
भीतर बहुत गहरे विभत्स घृणा
धूमिल करता व्यक्तित्व
नफरत का दम घौटूं धुँआ
जहर भरता सारे रिश्तो मे
क्या हो चेतना का
रही कहां स्वयं की
आराम पसंदगी सभ्य जीवन
लेता रहता प्रेरणा
टी वी सीरीयल से
जहां यथार्थ के नाम
विघटित परिवार व रिश्तों की
अतिशयोक्ति भरती स्वार्थ की जेब
स्वता बिना यह तरक्की
नित्य डरावनी लगती
पहचाना होगा अपने बूते
समय का सच ।
छगन लाल गर्ग ।

फासला ।

खूबसूरती करती मोहित
आशक्त हूँ मैं
नशीला रूप मादक यौवन
सुरभि बिखेरता तन तुम्हारा
मधु हलाहल का हिलोर लेता
असीम गहरा दरिया
खो गया संपूर्ण अस्तित्व
नहीं रहा मैं
समर्पित मन वासना गंध से
उतेजित उन्मादित
बहुत विशाल सृजन का स्वामित्व
मन करता जाता सवारी
सौन्दर्य के अथाह घनत्व पर
पर कहीं हल्की सी खरांच
उभरती दर्द की जलती लकीर
दागती जाती हृदय का कोमल अंश
करती घात आत्मा पर
नहीं शरीर सौन्दर्य से नाता
आत्मा का
अनंत फासला
आत्मा ओर शरीर बीच
सौन्दर्य शरीर केवल
झरोखा बना
असलियत की झलक का
मत समझना इसे सर्वांग
अतुलनीय दुराव
आत्मा व शरीर बीच
पाटना असंभव
मत रूको इसी सौन्दर्य
सीढ़ी केवल यह
संकेत करती
परम का
मत रूको मेरे प्राण
शरीर सौन्दर्य
रहोगे क्या पास बूझते भी
शरीर का सामीप्य बनाता
आत्मा से फासला
ओर सत्य
तरसता प्राण चाहता
परमानंद परमात्मा तुल्य
रहो ना समीप आत्मा के
हो सकोगे
दूर तन सौन्दर्य
स्वतः अलगाव ओर परिणाम
सघन चिर आनंद आत्म सौन्दर्य
मेरे प्राण
नहीं चाहता संसारी छलभरा
सौन्दर्य  जो देता तृष्णा रस केवल क्षणिक ।
छगन लाल गर्ग ।

अस्मिता का प्रश्न ।

नीचे फैंका कचरा
बिगड़ती जिन्दगी का सच
सार्वजनिक स्थलों पर
हमारी समझदारी का
सबूत हैं पसरी गंदगी
ओर हमारे शुद्र
सेवा मे सलंग्न प्रतिदिन होते
रूबरू सभ्य जानलेवा
व्याधियों से
नहीं कीमत का ओचित्य
उनकी जिन्दगी
उपर उठता हुआ झाडू संग
संग्रहित करती कचरे का ढेर
सुबह सुबह हरीजन नारी
अपनी ड्यूटी का साक्षी बनी
बंधा हुआ यौवन
लावण्यमय विनयशील
चेहरे का भौलापन
मुँह मे पान दबाये अनवरत कार्यरत
झुकी झुकी
करती जा रही सड़क सफाई
सुबह की चाय के शौकिन युवा
होटलो पर चुसकी संग
कसते जाते फब्तियाँ
काम की तलाश में झुंड के झुंड बैठे
बतियाते आदिवासी युवक युवतियां
ओर नौकरी पैशा जिम्मेदार
बस व टैक्सी की राह खड़े देते जाते
अपशब्दों का तौहफा
धूल के उठते बंवडर से परेशान होकर
बड़ा अजीब माहोल हर कोई व्यस्त
चाय की चुसकी लेते
युवाओं की घूरती नजरे
अपलक ताकती
सफाई करती हरीजन युवती
झेंपती सी बढ़ती जाती अनंत बिखरे
कचरे की ओर
निकल जाता हूँ चुपचाप मैं
सड़क से हटकर
नीचे की कच्ची पगडंडी
सोचता हुआ
मतलबी दुनिया का सच
हर कोई उतारू जीने को
दूसरे की अस्मिता को रौंदता हुआ
मात्र अपने मानसिक स्वार्थ
को लेकर
असंतुलन भरी जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग ।

Wednesday, April 20, 2016

अदृश्य सत्य ।


साक्षात संसार दृष्टिवत
नहीं सत्य
यह दृश्य परिवेश नित्य
परिवर्तनशील
ओर सत्य यह भी
नहीं प्रवृत्ति सत्य
क्षण भंगूर हो सके मूल
सत्य कथन हो अदभूत
पर स्वीकार्य कि
यह जगत मात्र काल्पनिक
दृश्य भी अदृश्य भी
स्वप्नवत
तन्द्रामय अनुभूति में सत्य
जागृति काल बन जाता असत्य
ओर बहुत गहरे केवल सत्य यह
कि मुक्त हैं आत्मा सनातन
संसार को सत्य मानना ही
बन जाता आत्मा का बंधन
भ्रांतिमय बंधन
जब तक
दृश्यमान संसार तब तक
ओर आज का युग
केवल संसार जीता
विज्ञान से
ओर निष्कर्ष बहुत गंभीर
अंतिम ओर हीन दशा
इंसानियत आ पहुँची
नहीं लगता अति भौतिकता से
बच सकेगी मानवता
सोचना होगा सत्य का राह
भारतीय मनीषा मूल्यों मे ही
जीवन का सार
ज्ञात से अज्ञात की
यात्रा करनी ही होगी समय रहते ।
छगन लाल गर्ग ।



एकरस नहीं ।


नहीं रही एकरसता
जीवन मे उठते रहते
बेसुरें सुर
जीवन वीणा के तार
होड़ करते रहते अपने ही
सुरों से
नहीं उठता
माधुर्य भरा संगीत
जीवन सुखा सूखा
उजाड़ रस हीन
कारण नहीं आता समझ
जीवन स्वयं समझे बिना
ज्ञानी महापुरुषों का
अनुकरणीय जीवन
नहीं आता समझ
फिर
युग साम्यता का अभाव
पढ़ें पढाये चरित्र मे
विश्वास दृढ़ता नहीं
हर आचरण की
तुलना आज से
संदेह अंकुर गहराते जाते
क्या हो
कहते वह कहां करते
बड़ी अजीब हैं आज की जिन्दगी
विश्वास श्रृद्धा प्रेम हर स्थल पर
केवल संदेह
नहीं
भीतर की वीणा के स्वर
सुनने होगे
आत्मीय रस से ही
एकरसता का संगीत ऊठने दो
रहने दो तुम्हारा
भ्रमित खुद ज्ञान विज्ञान ।
छगन लाल गर्ग ।

Tuesday, April 19, 2016

केवल वाकपटुता ।

ठीक कहते अब
हमारे  विचारक अनुभूति बिना
विचार शक्ति सामर्थ्य से
हर शिक्षित प्रभुत्व व्यक्ति
समझ बूझ भरी शब्दावली
परिमार्जित
संतुलित जटिल नापतोल
शब्दों को देते
अपनी गरज का पहनावा
कि लगने लगे
अपरिमित शब्दों के धनी
ओर शब्द आये काम वस्त्रों की तरह
जहां जेसी निखार की आवश्यकता
उसी अनुरूप रहे पहनावा
शब्दों का
भई वाह बड़े करामती शब्दों के धनी
कितना खिला खिला शब्द सामर्थ्य
नेता अभिनेताओं के
अभिनय से अनंत ऊँचा
तुम्हारा प्रवचन आकाशवाणी
अदृश्य की
अवतरित होकर
स्थूल आकार नकारती
बनाती तुम्हें
निराकार आकार भ्रमित
असमंजस तुम्हें नहीं
श्रोताओं को होता
तुम्हारी वाकपटुता
नहीं देती रास्ता
कि निकलना हो सके
चमत्कारी हो तुम
फसता रहता हर कोई
तुम्हारी सामर्थ्य क्षमता पर
सच यह तुम हो
प्रवीणता के धनी ईश्वर तुल्य
आवरण का घूँघट खुलने तक
ओर वह
तुम्हारी व्यूह रचना के रहते
नहीं संभव ओर खेलते रहो
असलियत का नाटक यही
तुम्हारी जीत
ओर इसी भ्रम
युगों का सत्य
असत्य की गठरी बांधा गया
ओर यहीं
आवरण की गठरी
अब बन चुकी सत्य
अनंत की
ओर उड़ान भरती
ऊँचाईयों मे
आज
असलियत अनदेखी
उदास मौन जर्जर
मरणासन्न उपेक्षित होती
नित हमारे से ।
छगन लाल गर्ग ।

समय सत्य ।

अनंत आकाश सिमट कर
परछाई बना
साथ ही
गुलमोहर के ताजा
लालिमा देते
फूलों को संग लेकर
उतर आया
आज सुबह
मेरे चाय की कटोरी मे
सरकती चाय के
हर घूँट मे
पीने लगा हूँ आकाश
अनंत
अच्छा अहसास होता
गरिमा की
अनंत ऊँचाई चढा
आज मेरा व्यक्तित्व
सोचने लगा हूँ
शायद यही तरीका रह गया
अब
अरमान पूर्ण करने का
सिखना होगा जीना
परछाईयों के साथ
आम आदमी के अच्छे सपने
उसके अच्छे दिन
उसका यथार्थ
इसी तरह
परछाईयों से होता जीना
आज के युग
हकीकत यही
अब भीड़ के नेतृत्व मे
समा गयी
ओर हर भीड़ बेचारी
सुख छलावे की
आकाशिय परछाई के
नेतृत्व से कर लेती समझोता
अपना मताधिकार देकर
ओर फिर परिणाम यही
कि बिना दूध की चाय मे
उतर आता
अनंत ऊँचाईयां देता
आकाश
गरिमा युक्त छल
भोगते इसी को
बुझानी होती
पेट की भूख
या कि स्वाभिमान बैचते
मजबूर होते जीने
देशी कुत्तों सी जिन्दगी
चलो यही ठीक
आत्मनिर्भर देश मे होता
थोड़ा सा
गर्व करो ओर कहो
भारत माता की जय
अहोभाग्य हिंदुस्तानी हो
मत भरो निश्वास
आयेगा समय करों इंतजार
तब तक मानो सत्य छलावा
हर अभाव ईश्वरीय
विवशता तुम्हारी भाग्य का छलवा
यही तकदीर यहीं सत्य इस युग का ।
छगन लाल गर्ग ।

मोह ।

नही रहा मोह
भीतर की अनंत इच्छायें
अभिलाषाऐं
स्वयं स्वभाव स्वच्छन्दता का
आशक्त करता
नहीं रहा मोह अब
आना चाहता बहुत दूर से
अदृश्य आसक्ति देता
निर्विकार चेतन रश्मि पुँज
मेरी ओर
अचंभित चित करना चाहे
अज्ञात का स्वागत
अलौकिक रश्मि का
निर्मलता का आभास भीतर
अहसास करता
दृष्टि होती जाती निरावरण
नहीं परदा नहीं आवरण
भीतरी मोह फलित अभिप्शा का
अति दूर का दृश्य
दिखने लगता साफ साफ
सीधा सीधा
अब लगता जाता
नहीं रही मन की कोई अपनी इच्छा
कि देखूँ मन का कि ऐसा कि वेसा
नहीं नहीं आवरण हट चुका
मिथ्या का असार का
देखने लगा हूँ साफ साफ
सुंदर भी असुंदर भी बिल्कुल सीधा सा
विभ्रम का सुंदर जाल
अब भी चारों ओर घेरता मुझे
असलियत जाना फिर माया बना
आशक्त करता भी यह हर पल
पर डसता नहीं अब
कास इस मर्म ज्ञान जानकर
अंगी कृत करता हर कोई
जीवन तभी पाता पावनता ओर
संघर्ष परिवर्तित हो पाता प्रेम में ।
छगन लाल गर्ग ।

असंतुलित जिन्दगी ।

नीचे फैंका कचरा
बिगड़ती जिन्दगी का सच
सार्वजनिक स्थलों पर
हमारी समझदारी का
सबूत हैं पसरी गंदगी
ओर हमारे शुद्र
सेवा मे सलंग्न प्रतिदिन होते
रूबरू सभ्य जानलेवा
व्याधियों से
नहीं कीमत का ओचित्य
उनकी जिन्दगी
उपर उठता हुआ झाडू संग
संग्रहित करती कचरे का ढेर
सुबह सुबह हरीजन नारी
अपनी ड्यूटी का साक्षी बनी
बंधा हुआ यौवन
लावण्यमय विनयशील
चेहरे का भौलापन
मुँह मे पान दबाये अनवरत कार्यरत
झुकी झुकी
करती जा रही सड़क सफाई
सुबह की चाय के शौकिन युवा
होटलो पर चुसकी संग
कसते जाते फब्तियाँ
काम की तलाश में झुंड के झुंड बैठे
बतियाते आदिवासी युवक युवतियां
ओर नौकरी पैशा जिम्मेदार
बस व टैक्सी की राह खड़े देते जाते
अपशब्दों का तौहफा
धूल के उठते बंवडर से परेशान होकर
बड़ा अजीब माहोल हर कोई व्यस्त
चाय की चुसकी लेते
युवाओं की घूरती नजरे
अपलक ताकती
सफाई करती हरीजन युवती
झेंपती सी बढ़ती जाती अनंत बिखरे
कचरे की ओर
निकल जाता हूँ चुपचाप मैं
सड़क से हटकर
नीचे की कच्ची पगडंडी
सोचता हुआ
मतलबी दुनिया का सच
हर कोई उतारू जीने को
दूसरे की अस्मिता को रौंदता हुआ
मात्र अपने मानसिक स्वार्थ
को लेकर
असंतुलन भरी जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग ।

बढिया सजावट ।

बहुत बढ़िया
सजावट बाहरी बाहरी
भीतरी सत्य ढका ढका
सूक्ष्मतम अभिव्यंजना
झलक देती तुम्हारे सौम्य
चरित्र की
बड़ा सुंदर व्यक्तित्व से मेल खाता
पहनावा तुम्हारा आधुनिक प्रबुद्ध
शिष्ट सभ्य आचरण
मंजा हुआ अतुलनीय
ओर भाषा गरिमा भरी
उदघोष गरजता प्रभुत्व भरा
एकाधिकार मेरे शिल्पी
हर अदृश्य कृत्रिम हुनर पर
शब्द घबराते से
तुम्हारे व्यक्तित्व से भयभीत
करते सजावट अपनी
विवशता में आपा खोते
मिटते अस्तित्व देते सहारा
मित्र सम अंग्रेजी के शब्द
वाह कितना उदात्त दृश्य
सुंदर तारतम्य भाषाओं का
अजीब हुनर पा चुके शब्द भी
मेरे प्रबुद्ध वक्ता
हर कण हर क्षण
तुम्हारा भोगा जाना
तुम गहनतम जटिलतम
प्राणांत समय के दूसरे ईश्वर
व्याधियों के वैध
मेरे  विचारक
तुम लिखते तब समझ आता
प्रकृति का स्वरूप
हवाओं का बहना
फूलों का खिलना
बादलों का गरजना भी
बरसना भी
साक्षात से भी अतिसुंदर होती
तुम्हारी भाषण अभिव्यक्ति
यह प्रकृति का रूठना
ओर फिर लौटना सौंदर्य में
कहां देख पाता किसान
अपना खेत
कवि की कविता में भी
कहां हैं सौंधी गंध
तुम्हारे कथनानुसार
सच्चे पारखी मेरे अन्वेषक
केवल तुम
मिलती मिट्टी गंध
ओर किसान का
श्रम बसता तुम्हारे किये अन्वेषण में
कितने तरकीब बता देते शब्दों से
असल में नही तुम्हें किसान से
लेना देना
ना फूलों से ना प्रकृति से
ओर ना अभाव झेलते लोगों से
नाम लेते रहो इन सबका
करते रहो भाषणों में
नित जख्म छूते शब्दों से दोस्ती
गरज रहने तक
सौंदर्य सत्य ओर खोज का
शब्दों के सुरभित हार लेकर
पिरोया करो
अपनी राजनीति की विजय माल
असल मे तुम
अपनी भीतरी वासना के सताये
यही कारण
सुंदर शब्द देकर सत्ता सुख में
जीना चाहते ।
छगन लाल गर्ग ।

सीखना होगा ।

 व्यक्ति रहना

सीखना होगा

अनंत प्रवाह बहती धार

जीवन नदी की

ओर हर प्रवाह छल भरा

नही होता आत्म सात

जिन्दगी की जरूरत

उभरती ज्वाला सी

निरंतर विशालकाय

ओर घबराहट लिए

नित्य बढता जाता

शान्त दमित करने

नही हो पाता यह

क्षमताओ का दंभ मात्र

नही हकीकत

कि कार सकूं समाधान

नित्य  उठती बाधाओ का

जटिलताओ का दौर लिए

टूटता जर्जर हुआ

अब बन  गया समन्वयक

लडखडाता

 संभलता करता हूँ कोशिश

जिन्दगी प्रवाह को

मिल सके  सहारा

विवशता वस

हर सबल से निभाता

विनयशिलता का ढोंग

बन जाता हूँ

 जीने लायक व्यक्ति

ओर उग्र हुए अहंकार से

विनय हुआ

लेता जाता छूट मानवता की

ओर स्व त्याग का

ढोंग कर

पाता रहता

 अहंकार रस भी

स्पष्ट ही नही

रहा व्यक्ति मैं

सीखना नही  आया

व्यक्ति बन जीना

केवल दौहराता हूँ

व्यक्ति होने का नाटक ।

छगनलाल गर्ग ।

नमन तुझे ।

अंततः नमन तुझे
मेरे  मर्यादा पुरुषोत्तम राम
स्वीकार मुझे
मानवीय स्थूल देह तुम्हारी
कृत्य नही रहे मानवीय
पर असीम क्षमता मानव चित
देती रश्मि जो चीरती तम
अहसास ईश्वरीय तुम्हारा
नही त्यागना चाहता मेरे राम
अमानवीय दिव्यता कहां रखा पाती
हमारे समान
नही कह सकता तुम्हें मानव
तुम भगवान मेरे
संस्कृति संरक्षण निमित्त
मूल्य प्रतिष्ठित समाज
नूतन चाह पुकार उठी आज
विश्रृंखलित मानव मूल्य
धरा जीवन असंतुलित आज
विवेक बना अहं मात्र
शुष्कता व्याप्त मन चाहता वैभव गर्त
मानव मंथन सार बोध भ्रमित
नही कोई रसायन जो राम बने
आनंद निर्झर पृथ्वी पर केवल
राम नाम तुम्हारा
केवल यही रस बहता
सत्य भी यही रस भी यही
यह अमृत रस पान करे हर कोई
मेरे राम तेरे नाम की
निर्झर बन बहती शराब
बहती करती मदमस्त
राम नाम की सरिता
पावन स्त्रोत सरिता का
रमण कर लो तन मन संग
रमने दो चित राममय सरिता
चित रम गया मेरे राम वही
मेरे उद्धारक वही
नाम राम
प्रतीक बना परमात्मा
प्रेम रस दरिया हुआ
आज राममय
राम नवमी तो एक स्तंभ बना
मेरे राम भगवान का ।
छगन लाल गर्ग ।


ब्राह्मणत्व ।

ब्रह्मत्व सत्य चाहता
शास्त्र ज्ञान नही सत्य
केवल संग्रहण
अनुकूलता रहने तक
तन तप बिना संग्रहण नकारात्मक
सत्य हो सत्यकाम लिए
लघुता प्रकटीकरण की क्षमता
सरलतम प्रवृति
विकृत पृष्ठभूमि का दुर्भाग्य
नही अशुद्ध कर पाता ब्राह्मणत्व
 सत्य वीर जाबाल की तरह
वैश्या माता से जन्मा
सत्यकाम जाबाल
गुरूश्रेष्ठ से सिद्ध हुआ
ब्राह्मणत्व
सत्य कहने का सामर्थ्य केवल
ब्राह्मण पुत्र मे निहित
जो सत्य राहो का अन्वेषक
वही  असली ब्राह्मण ।
छगनलाल गर्ग ।

अर्थ युग ।

अर्थ शास्त्री युग यह
हर क्षण महत्वपूर्ण केवल
अर्थाजन निमित्त
ओर अन्य सहयोगी कार्य
केवल बनावट जीवन की
नही  उपादेयता कोई
खरीददारी हो सकती तमाम सुख
भौतिक तृष्णाओ का उपचार संभव
केवल धन सामर्थ्य पर
बिकता हर भाव हर विचार
ओर जीवन के अतिरेक क्षण भी
जिन्हे जीना होता भावमय
वह भी चकाचौंध भरी ऐश्वर्य चमक मे
खोते जा रहे हम निरंतर
पशुतुल्य शक्ति मद अहंकार के धनी
बनने में श्रेष्ठता साबित हमारी
संवेदनशीलता हीन पशुता का जीना
आज का सत्य
दृश्यमान मानव दिखते हम
पर नही रहे मानवीय ।
छगन लाल गर्ग ।



Monday, April 18, 2016

अपूर्णता रही।

जानता हूँ यह
पूर्णता नहीं
जमीन व्याप्त सौन्दर्य
केवल अंश ओर वह भी
उधार पाया
ससीम भी लघु भी
अलौकिक सौन्दर्य सागर
परमात्मा से
आत्मा कहां पाती तुष्टता
स्नेह सागर सी
केवल तन तुष्टि तृष्णामय मोह
देखता जमीन का सौन्दर्य
सत्य ओर होगा
आता रहता अहसासों में
बिजली वेग से
झलक निरखते ही
अनुपम सा
हृदय में जगमगाहट देता
खो जाता अचेतन
ओर अतृप्त नयनों का नूर
तलाशता रहता
जमीन पर बिखरे
मनमोहक सौन्दर्य बीच
अनुभूति का सौन्दर्य
कहते तुम
अजीब अभिव्यक्ति देते
धरातलीय सौन्दर्य पहुँचा देते
आसमान तक
चाँद तारों तक
कहो तुम तुम्हारी विवशता
नारी कुसुम का महकता तन
गुलाब या कमल
ओर भी देते रहो
केवल उपमा अद्वितीय
इससे होगा क्या
मन बहलेगा तुम्हारा
या कि जिसे सुनाते तुम
यह सब अचेतन अनुभूति की
छाया मात्र
असलियत कहां
फिर होना पडता सारोबार
समय की करवटो के साथ
आत्म ग्लानि से द्रवित
ओर तब
समय पंछी की यात्रा का
आखिरी पड़ाव
मांगता हिसाब
जीवन जीने का
सौन्दर्य हीन भ्रमित अतीत
नहीं रख सका कुछ संचित
देने योग्य
मंजिल की सीढ़ीयां पर
थिरकते कदम
पश्चाताप का जप करते
बढ़ते पर पाएँगे क्या
संचय सौन्दर्य जीवन सार
अलौकिक सौन्दर्य की झलक
केवल आभासित देती गति
वहां जहां बिखरा घना
शांत गंभीर शीतल ओर
आत्मलीन स्नेहिल सौन्दर्य
बुलाता अनंत की ओर ।
छगन लाल गर्ग ।

कहने दो।

कहने दो
अंतरमन की कसक
काल कलवित वेदना यह
बहाव चाहती
मत रोको
विडंबना का राज शायद
उकेरने निमित्त
उठती भीतर की हूक
हुई जाती घनी प्रबल
शब्द नहीं देते साथ
हुई घनी द्रवीभूत
पाये कैसे आकार पीडा सा
राग स्वर वेदना व्यथित
हुआ जाता अस्तित्व मेरा
व्यञ्जन शक्ति नहीं सार्थक
अभिव्यक्ति निमित्त
क्या हो निशब्द चलने दो
विरह राग प्रवाह होने दो
निर्मल मन
अतिसार हुआ जाता अब
विदेह मिलन
अबाध निरंतर आते हो तुम
कर देते क्षुब्ध व्यथित हृदय मेरा
अपार शिथिल शान्त व्यथा
कर जाते लघु
अब पहचानने लग गया तुम्हें
अदृश्य रूप भी तुम्हारा
होने लगा अहसास
ओर भी नाना रूप लेते
करते रहते क्रीड़ा घनी तुम
मेरे अपने
नहीं दे पाये ना तुम
धोखा मुझे
कोई भी रूप करो धारण
हर रूप तुम्हारा लुभाता मुझे
कभी सुरभि बन फैलते वायु संग
कभी दुर्गंध बन जाते मौत की
वाह अब तो
आ गये तुम मेरे घर
मेरे आंगन मेरी कोख
आह कैसी यह परीक्षा मेरी
मेरे अदृश्य इतराने लायक
भाग्य दिया मुझे
कि समझा तूने मुझे
परीक्षा लायक ।
छगन लाल गर्ग ।

पास हो लें ।


आओ ना कुछ पल पास हो ले
प्रेम प्यास हम मिल बाँट ले
सघन कुँज गहरी छाँव ले
देखो ना हमे बुलाये
मिलकर दोनों एक श्वास हो ले
आओ ना कुछ पल पास हो ले
उदासी जीते हम दोनों जीवन लम्हें
आओ मिल ले पल रंगीन लम्हें
संतप्त जीवन तपन की उष्मा
आओ हम तुम अदल बदल ले
आओ ना कुछ पल पास हो ले
शून्य स्वप्न हीन ज्वरमय आँखें
तरस रही सौन्दर्य रस सुरभि
उखड़ गये उजडे जीवन मे
मधुमास मोहक अंदाज बसा ले
नहीं भरोसा फिर मिल पाये
जीवन काल घना अधूरा
आओ ना सौभाग्य पलो का
घड़ी दो घड़ी जश्न मना ले
आओ ना कुछ पल पास हो ले ।
छगन लाल गर्ग ।

खोलो कपाट।


अब खोलो नेह द्वार कपाट
अंतर करूण व्यथा घनी भ्रमित
मिलता नहीं हृदय द्वार स्नेहिल
करती करूणामय रूदन पुकार
अब खोलो नेह द्वार कपाट
कलियां बगियां खिलने बेकरार
भंवरों ने गूँथी मर्मर स्वर गूँजार
दुख विमुख होने हृदय बेकरार
कोयल भरती मधुमय राग श्रृंगार
अब खोलो ना नेह द्वार कपाट
लालिमा छायी पश्चिम निखार
लज्जित सौन्दर्य परत मुख दीदार
धुंधलके संग करते मिलन अभिसार
अनगिनत लम्हें चाहे अमंद विहार
अब खोलो ना नेह द्वार कपाट ।
छगन लाल गर्ग ।

उतरार्द्ध ।


आशा किरण उतरार्द्ध
अकेलापन
पारिवारिक भीड़ बीच
नहीं पाता कोई मेरा अपना
महसूस होता सत्य
नितान्त हो चुका अकेला रिक्त
बुढ़ापा लगा घेरने
होता प्रतिपल रिक्त प्रेम से
पसंदीदा अब नहीं किसी का
यही सार अब जीवन तेरा
मोह भ्रम बादल अब छंटते
परम अदृश्य के सपने जगते
सुंदर शीतल एकाकीपन मेरा
भर लाता सीपी मे सागर
आह रमणीय मधु भाव अनंत भर
हृदय राग उर्ध्व बन उठते
कैवल्य असीम चित सागर बसता
सीढ़ी बन जाता एकाकीपन
अदृश्य अलौकिक परमेश्वर तक
उडता उन्मादित अलौकिक रमता
आह यह उतरार्द्ध काल बहुमोल
जीवन भर की उपलब्धि भर देता ।
छगन लाल गर्ग ।

सहारा दो ।



दोस्त मेरे सहारा दो
डूब रहा विडंबना ताल
वक्त घाव देता जाता
औषधि बनकर छाया दो
नहीं आये काम सब
जिनके लिए विलग हुआ
कुटुम्ब त्याग परिवार बना
जीवन लांछित किया
आज वहीं औलाद मेरी
धन जोड़ धनवान हुई
नहीं गरज अब सखा मेरे
ममता शर्मसार हुई
रिश्तों का मापदंड नहीं रहा
धन तुला रिश्ते तुले
अहसास फर्ज नहीं रहा
दोस्त मेरे सहारा दो
मोहाशक्त नहीं अब सखा मेरे
सम्बल दो तुम खड़ा रहूँ
हर कर्म पर नेह दो
ममत्व चाहता अपनत्व से
हर व्यवहार कसक घनी
घाव रिसते हैं घने
औषधि स्नेह लेकर घाव
भरो ना सखा मेरे
रिक्त ममत्व हृदय सुखा
धरातल चटक ना जाय
मेरे हमदम सहारा बनो
प्रेम के जीवंत क्षणों
आओ ना बरस शीतल करो
परिवार तुम सहारा बनो
पारावार नेह का
पावन हो तुम मोह दो
बनो तुम फिर एक बार
सेतु अंतिम बार तर सकूँ
स्नेह गूँथे अनगिनत सपने
अपनों से पूर्ण कर सकूँ
ओलाद सुख नहीं तो क्या
दोस्त मेरे सहारा बनो
नही  पाई आज तक
स्वच्छन्द रमणियता
अदृश्य अंकुश नित्य रहा
संतुलन  जीवन व्यतीत रहा
बीच मझधार डूबा हूँ आज
छोड मझधार अपने गये
छलना के सुंदर जाल घीरा
मानवीय संवेदना रही नहीं
सखा नही भाई मेरे उबार लो
दोस्त मेरे सहारा दो ।
छगन लाल गर्ग ।

अवक्तव्य अनुभूति ।


अवक्तव्य रह जाती अनुभूति
पीडा भरी गहन व्याकुलता
अनुकूल शब्द नहीं पाती
व्यक्त अपूर्ण असार रह जाता
तहे कुरेदता रहता
विकल दारूण जिन्दगी की
ओर हम झूठ के छाये
करते कोशिश
तलाश करते कोई बहाना जीने का
अनुभूति दर्द हमारा अपना
असत्य की वैशाखी का सहारा पाया
गुजारता जाता नीरस जिन्दगी
नहीं यह छल बौद्धिकता नहीं
केवल अहसास
नीरसता मे बनावट रस पाने का
केवल बाहरी उपक्रम
अहंकार के नीरस छाये का सत्य
ओर यही रह गया आज
अनुभूति की निश्छलता का रहस्य
कृत्रिम युग का वक्तव्य नहीं रहा
विश्वास देय सरस अनुभूतिमय जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।



Sunday, April 17, 2016

धारणा का सच ।


धारणा का सत्य
बदल देता जिन्दगी
अचानक नहीं होता पाना
इच्छित
देखना होता भावना के धरातल
आस्था अटूट
समझ आये सर्वांग
नहीं आवश्यक
कोई आंशिक गुणवत्ता
लानी होती धारणा में
ओर यह देखना पदार्थ में नहीं
चेतना के स्तर पर हो अदृश्य
दृष्टि समर्थता
बड़ा अजीब सत्य जिन्दगी का
वही पाते हम
जिसे सुरक्षित रखने की जगह देते
हृदय के किसी कोने को
रिक्त रखते धारणा में
संजोये सत्य निमित्त
अलौकिक ईश का
आस्थामय स्वागत
तभी होगा जब
सत्कारमयी दीदार की
होगी प्रबलता
ओर हृदय
होगा साफ सुथरा प्रभु योग्य
महान परमेश्वर आता हैं
भाव जगत मे स्वागतीय सिंहासन
निर्मलता से सारोबार रहें ।
छगन लाल गर्ग ।


धुंधला आकाश ।


प्रभाव डालता धुंधलका
नभ घीरा
हवा के धक्के होते महसूस
धूल भरे
देते चुभन तन के नाजुक अंश
होने लगते जख्मी
आँखों मे खटकती धक्केदार हवा
स्व क्षमता रोशनी होती जाती
एकमेव धुंधलके मे घुलकर
कालिमा का हल्का सा नशा चढता जाता
नभ उज्ज्वल सूर्य रश्मियों पर
ओर मदहोश उजाला घीर जाता
कालिमा की उन्माद पूर्ण नशीली बाहों मे
बहुत कम बच पाता अस्तित्व
स्वयं की अस्मिता खोई खोई
कभी कभार कालिमा की करवट लेते
अंगडाई की अल्हडता बीच
रश्मि पूंञ्ज का होता हल्का सा दीदार
बड़ा अदभूत क्षण प्रकृति रमण
उजाले ओर अंधेरे बीच
दो विपरीत अस्तित्व आशक्ति मय
करते जाते प्रेमालाप कौतुहलमय ।
छगन लाल गर्ग ।

मंजिलें ।


बढ़ती विशालकाय मंजिले
रोकती जाती
मुक्त पवन निर्धनों की
कि नहीं ले पाये श्वास
ओर छीना जा सके
प्रकृति प्रदत हक मानव का
गगन स्पर्श चाह लेती मंजिले
लोलुप स्वार्थी
व्यक्ति की भावनाओं का बिम्ब देती
कहती जाती हैसियत का हिसाब
ओर क्रूर दानवता की भावना
कई झरोखो से देखती
मामूली दुनिया को
रेंगती हुई जमीन पर
ओर मीठे अहसास भरती
अहंकार की ऊँचाई
ठीक निर्जीव आत्मा की
कालिमा उभरती
दौडने लगती विनाशक आँधी सम
उजडते जाते कच्चे घौसले
कच्ची दीवारें
उजडने की शर्त पर
पनपता तुम्हारा अस्तित्व
मंजिलो की पृष्ठभूमि करूण
पर विध्वंस स्वर लिए
देती आवाज
अनेकों बेगुनाहों के बलिदान की
मर्म वेदना लिपटी सिसकिया
ओर अनेकों कुमल्हाये कुसुम
भरते चित्कार
आह यह मर्म भेदी स्वर
बहरे कानों नहीं सुनते तुम
या कि जडवत हो चुके प्राण रहित
तुम्हारा अतीत ओर वर्तमान दोनों
अमानवीय तृष्णा से लिप्त
अहंकार के बिम्ब तुम्हारे महल
दास्तान देते बर्बर इतिहास की ।
छगन लाल गर्ग ।


गुलमोहर का कीडा ।


कीड़ों ने बना दिया
तने के बीचों बीच गड्ढा
गोलाकार भीतरी गहराई
बढ़ती निरंतर
लगता कुतरता जाता कीडा
विनाशक भाव बन
मानवता को
गुलमोहर का सुंदर वृक्ष
अब नहीं रहा
अपने सामर्थ्य को संजोकर
भीतर की ऊर्जा
नहीं कर पाया स्फूरित
ओर यही कारण
कीड़ों का
कुतरने को मिलता रहा धरातल
पर हाँ जीजीविषा का सत्य
नहीं मरा अभी
कीड़ों के रहते भी
यही वह सूक्ष्म चिंगारी
जलाती रहती नित
कीड़ों की बीमार अस्मिता
देखता हूँ नित्य गुलमोहर तुम्हें
पुष्ट बनाने का बाहरी इंतजाम मात्र
मेरा सामर्थ्य
तुम्हें नहीं देख सकता
कीडो के हाथ मरते
आज के स्वार्थमयी
मानवता कुतरते कीड़ों की तरह
जो मिटा देना चाहते
खिलते सौरभ मयी
कुसुमों का सौन्दर्य
मेरे गुलमोहर संजोते रहो
ऊर्जा स्त्रोत
भीतरी भरा अलौकिक अदृश्य
बाहरी इंतजाम केवल दिखावे
असलियत तुम्हारी
अपनी अनुभूति मे समायी
संघर्ष ओर सत्य असली पूँजी
अहसास करो फिर लडो कीड़ों से ।
छगन लाल गर्ग ।


Saturday, April 16, 2016

चाहत का जख्म ।


घनत्व चाहत घीरा
सामर्थ्य ससीम रहते
असंभव कामना पूर्ति
कुंठित पूर्वाग्रह
भटकन शिथिल जर्जर तन
अभिशप्त हुआ जीवन
रश्मि जलन देती
अंधकार अपना अपनत्व देता
नहीं अब हिम्मत
प्रकाश किरणों का कर पाऊँ सामना
नहीं रहा नूर नयनों में
नहीं जीवंत पल वक्त लाता
कि जागे चित विश्वास लेकर
लगता यही सत्य
सुख चुका दरिया हलचल भरा
पल भार युक्त हो चुके
दमन होता जाता वक्त के साथ
ख्वाब कामना का
शायद सूत्रात्मक हूँ मैं
नहीं हो पाया सरलीकरण मेरा
जिता रहा जटिलता अहंकार मोह
करता रहा अति विद्ववता से मोह
ओर होता रहा अवाचनीय पृष्ठ
फिर बोधता से होता रहा
उपेक्षित बार बार
समझ लायक अपनों से
सरल शब्दों से नहीं कह पाया
तुम मत करो अपेक्षा मुझसे
नमनीयता शब्द नहीं ले पाये
कि बहने लगूँगा फिर धरातल
हिम खण्ड सा जड़ तनाव भरा
नहीं पहुँच पाती चेतन किरण
कि तपिश पाकर पीघल सकूँ
अंधेरे अब मकसद बने
विश्रान्त मौन गहरी खाई निमित्त
भरो ना अतिशय अंधकार
तुम दो ना कोई कालिमा गहन
लिपटा लूँ अस्तित्व मेरा
कि ना देख पाये चैतन्य मुझे
विरह विकल ना पास आये
समझ बेबूझ बन जाय
मत डराओ मुझे चेतना राक्षस आता
हो जाता हूँ ओट दीवारों के
अहसास भ्रम नहीं बाहर आये
गिरता हूँ हर बार चेतन बन
उड़ान भरता असीम नभ
हताशा मत आओ घाव भरते नहीं
जडवत जीवन जख्मी घना
ठीक हूँ मूल प्राकृत बना
रहने दो उसी दशा शायद श्वास ले सकूँ ।
छगन लाल गर्ग ।

बुढ़ापे का खोफ ।


जर्जर छत से
गिरने लगती
सीमेंट निर्मित परते
ओर दिखने लगे
बीच के सरीये
खतरा अब बढने लगा
दिनोंदिन
ओर भाव बताते कारीगर
रिपेयर का ओकात से बड़ा
भरता हूँ हाँ पर
नहीं आते शायद
विश्वास नहीं कर पाते
मेरी हालात जान
इंतजार करते थक चूका
नहीं आते
लडखडाते कृश तन का
अब नहीं भरोसा
जिन्दगी कब क्या बहाना ले जाने का
ओर ऐसे में
मन बैठी दहशत नहीं होती
किसी को कहने लायक
लडना समझाना होता
अपने को अपनत्व से
जीजीविषा ओर गहरी होती
जिन्दगी सडती जाती पर
लगती किमती
हारा थका निरंतर
तलाशता हूँ कारीगर रिपेयर का
कोई मिले जानकार
भरोसे वाला
सोते हुए सहम जाता हूँ
हवा देते पंखे से
भीषण गर्मी मे हवा देता पंखा
हवा से ज्यादा डराने लगा अब
शायद कमजोर छत ढहाने निमित्त
लेता तेज रफ्तार
नहीं आता भरोसा
हवा देने की हो रफ्तार अति
दूसरे पंखों से ज्यादा तेज
गति नियंत्रण नहीं करता काम
बडा संकट काल उतरार्द्ध काल भी
समस्त प्रकृति मानो
सक्रिय हुई जाती
मुझे मिटा देने निमित्त
आह कितना खोफ भरा बुढ़ापा ।
छगन लाल गर्ग ।

समीक्षा ।


क्या होगा कभी
ऐसा
तुम ना रहो मोहताज
अपनी अभिव्यक्ति सत्यता जाँच
समीक्षकों से करवाने
ओर समीक्षक बिना परवाह
सामान्य जनो के हित देखे
अपने विचार प्रवाह का अहं
समीक्षा पर चढाने लगे
तुम्हारी अभिव्यक्ति पर
अनेकों चौंचे इकजाई होकर
लगे मूल संवेदना को कुतरने
ओर तुम भारी विडंबना झेलते
उतर आओ बगावत पर
यह बगावत तुम्हें
कर देगी कुंठित मूढ
ओर सत्य चाह का एक राही
झूठे सत्य का आवरण ओढकर
होता रहेगा पथभ्रष्ट
नहीं जरूरत सत्य अभिव्यक्ति को
समीक्षा की
वह स्वयं रास्ते बनाती उजाले देती
मोडती जाती जीवन
ओर समीक्षा केवल
पैकेट के पेकेज का हिस्सा
जिससे सत्य ढकने का
होता बन्धोवस्त पूरा
अपनी भीतरी अभिव्यक्ति का सच
केवल तुम्हारा अपना बोध
ओर वही दे सकता सच्ची समीक्षा
छोड़ो बनावट का यह छल
मत रहो अभिव्यक्ति की समीक्षा मिस
मोहताज अन्यों पर
अन्य सृजन नहीं विचारों की विकृति
का उठाते रस इज्जत तुम्हारी पाकर ।
छगन लाल गर्ग ।

बदलती अभिव्यक्ति ।


अच्छा कहते तुम
बार बार वहीं भाव
बदल जाते मात्र शब्द
पर
शब्दों की हेरा फेरी नहीं
बदल पाती तथ्य
वहीं प्रकटता चाहे
कहो ऊँचे जटिल शब्दों
या काम चलाऊ
हाँ यह जरूर समझ का
भाव धारा मे अडचन आती
जब तुम चाहते हो कहना
सर्व मान्य
परिभाषित अकाट्य तर्को से
स्लीप चिपकाई पृष्ठ वार
ग्रंथ प्रमाणित प्रेम की व्याख्या
हताश हो जाता हूँ मैं
प्रेम समझना नहीं होता
ओर न ही समझाना
कि तुम देते रहते हो आकार
ऊँचाई स्थित चाँद तारों से
यह ठीक कि भाती हैं ऊँचाई
पर यह अपना सच कहां
हाँ अभिव्यक्त करो
शायद प्रेम ऊँचाई पाये
अगर उसमें भी
तुम्हारी भीतरी भाव दशा
ऊँचाई पाये तभी
स्थूल नहीं हैं प्रेम
मत करो गलती अहसास मे
स्थूल कभी ऊँचा नहीं हो सकता
पर अगर जुडता
उसमे भावों का दरिया
उठने लगती हिलोरे
अनंत करती जाती स्पर्श
साक्षात हो उठता अनंत
इसी शुद्र जीवन मे
ओर प्यार बन जाता प्रार्थनामय
विद्ववता ओर सत्य दो विपरीत ध्रुव
सत्य समझने मे नहीं आवश्यकता
विश्वविद्यालय की डाक्टरेक्ट डिग्री ।
छगन लाल गर्ग ।

मंथन।


लोभ
खींचतान करता
जीवन गति होती रहती
असंतुलित
करता प्रयास संतुलन का
शांति पाठ सुबह शाम
पूजा स्थल घर भीतर चलता
खर्च होता नित्य
प्रसाद बंटती
पर टलता कहां असंतुलन
अनजान सी मूर्च्छा जीने लगा
नहीं हूँ संतुष्ट स्वयं से
हर कार्य नहीं भर पाता
अरमानो की झोली
परिणाम असंतुलन
कभी अधभरी सी तो कभी बिल्कुल खाली
नहीं पता
क्या रहस्य अमीरी का
समझना चाहता एकान्त में
ना सुने कोई अन्य कहीं वह
हक भी छीन ले ओर
हंसाई भी हो
नहीं तनिक भी धैर्य अब
जब देखता रातों रात लोगों को
बनते जाते अमीर
याद आने लगा अब रहस्य
पढ़ी कथा का
देव दानवों का संमुद्र मंथन
जहर के बाद निकलता अमृत
ओर मेरे जीवन का जहर लोभ
करना होगा मंथन
तभी संभवतः पाऊंगा संतुलन
ओर होगा फिर अमृत सा
यह जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।


Friday, April 15, 2016

अलौकिक क्षण ।


दे दो प्रिये मुझे अब
मृदु रागिनी स्वर
आह्लाद भरा तन
रसिक मन तंरगित नाद
विकल प्राण बने
वियोग विरल राग
अकेलेपन का विकल विशाद
बहना चाहे प्रिय तेरी ओर
हुआ कमनीय गात
दो ना प्रिय अब
कोई संयोग रागिनी स्वर
मन भ्रमित भार
मृदुल रस स्वाद पान
आह यह
शब्द कलिका की मार
स्पंदित करती विरह घाव अपार
तंरगित वीणा से तार विरल
भरते कानों से
मधुमय रस शब्द सार
गूँज उठते
अलौकिक नाद अपार
स्वप्नवत पवनमय
अदृश्य जीवन संसार
प्रिय खोजूं कहां
भटकी पवन किरण
विवर शून्य हुआ रे
अब सहलाता नहीं
स्मृति राग विकल
घने करूण भार बने
आह यह जीवन
मरू धरा शुष्क तन रहा
अचेतन मुस्कान व्योम
तुम्हारी रश्मि बनी
अपलक नयन
स्थितप्रज्ञ बन जड मेरे हुए
भेजो पवन मिस संदेश राग
विरह जलन अब अस्तित्व जला रही
दे दो वहीं से अधर मुस्कान सार
या कि भेजो
कोई रागिनी स्वर
महाविलय क्षण
संकेत नभ दे रहा
प्राण राग द्रव्य हुआ
रश्मि संग बह रहा
अनंत का यह संयोग सार
आओ ना प्रिये उर पहन हार
लक्षण अलौकिक
आभामय नभ ने दिये
संयोग महामिलन अलौकिक क्षण
पुकार नभ आभामंडल बनी ।
छगन लाल गर्ग ।

मंत्र।


अलौकिक सत्ता
वितरण करती आंशिक
अपनी सृजन सत्ता
मानव की सर्वोच्च ऊर्जा
प्रस्फूटन लेती प्राण तत्व
ओर अदृश्य
मानव चेतना से विमुख हुई
ऊर्जा अवतरित पुँञ्ज बन
भीतर अति गहरे अंतर
ओर तब चेतन प्राण
एकाग्रता चाहता
अंतर की ऊर्जा का संकुल
अदृश्य आभा प्राण पाता
ओर लक्ष्य होता निर्धारित
प्रभुत्व सत्ता अलौकिक
अंश अदृश्य को हलचल देता
सिद्धि की परमावस्था
समर्पित होती अलौकिक संप्रति
अकथनीय
आभा का वर्तुल होकर बहता
लक्षित दिशा वस्तु
ओर तभी घटता साक्षात्कार
आराध्य आराधक बीच
मंत्रों का सूत्र
बीज शब्द बनते
ओर लक्ष्य भेद देते
भक्ति रस
आराध्य शरणो मे
बहुत सार्थक होते
मंत्रोच्चारण
सत्य यह कि मंत्र
अतुलनीय वरदान ईश्वर का
अपने निश्छल भक्त को ।
छगन लाल गर्ग ।