घटने लगे
फासलों के अहसास
वक्त के धरातलीय ढलान पर
लडखडाता संभलता सा
कदमों के अंतराल मे
लुढकने लगे कदम स्वतः
अपनत्व कदम चिन्ह पहचानते
शायद
अनुभव पाठ जटिल हुआ
नहीं पढ़ने लायक आगे
या कि
मानवीय संवेदना करती बाधित
अनुभव के छाये बिखराव पाकर
हो चुके हो
विकल अवसाद भरे
अन्य कारणो के
झौंके बवंडर से
घेरने लगे अंधकार बनकर
तब चढान का
भ्रम देता संदेश
अपनों के
अस्तित्व मिटाकर
पराजय पाई चढान
चिढाती
स्वयं को गहरे तक
ओर संसार उठाता
पैनी नजरें
चुभती चीरती जाती जिगर
समझ के बादल हटे
ओर निखरा
उजला अपनत्व का मर्म
आह विभोर हुआ
इस अहोभाव
लौटने लगा हूँ
अपने घर की ओर
मिलन होता अब
अपने अस्तित्व संग।
छगन लाल गर्ग ।