Saturday, April 23, 2016

भय मुक्त जीवन ।

खूब डराया  आज तक
शास्त्र  ओर विद्वानों ने लगातार
यह निश्चित
मृत्यु आहिस्ता आहिस्ता आती हैं पास
कैसे झुठलायें हम
हर रोज मरता हैं कोई
कैसे भूल जाऊँ
मुझे भी मरना हैं एक दिन
ओर बहुत रह गया बाकी
आज तक का किया सारा का सारा अनकिया
ओर लगता है देह पडी मरण शैया
ओर अपने चाहते जलाना
बदलाव पाता यह मन पल प्रति पल
अब जीना चाहता
ओर जब मुश्किल फसा मांग करता
मौत की
नही है भरोसे लायक मेरा मन
मौत की अनिवार्यता
समझनी होगी  ओर इसी स्मरण
व्यतीत करना होगा
भय रहित परहित कार्यो मे अवशेष समय
यही तरीका दिला सकता
मानव को भय मुक्त जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।