Sunday, April 3, 2016

कठपुतली ।


जरूरी जीने के लिए
संतुलन
नहीं पर बिगड़ जाता भव
मनुष्य का
अटल सत्य भोगा
ओर पाया उन्हें
जो नहीं समझ सके बहुत थोड़ा
किन्तु अनिवार्य सत्य
संतुलित जिन्दगी का
तुला बना जीवन
समझने लायक
अधिकार कर्तव्य संतुलन चाहता
बेडौलता तनिक सी
रोक देती श्वास सुख की
फिर अहं का पिटारा खुलता
ओर विडंबनाओ का घेराव
रोक देते रास्ते प्रगति के
सुनो घनी शलाघा अपनी
हमें कर जाती असंतुलित
बेचैनी का यह दौर खुशी कम
संदेह भर देता अस्तित्व
असलियत को तन्द्रा डूबो देती
भ्रम सागर
तब मनुष्य नहीं होते
केवल कठपुतली
किसी की प्रशंसा से संचालित
स्व पहचान खोये असंतुलित
विद्रूप जीवन के स्वामी ।
छगन लाल गर्ग।