Monday, April 11, 2016

सत्य बोध ।


सत्य एक अहसास
भीतर की शुद्धतम दशा
शायद अव्यवहारिक
आज के संदर्भ
कुछ प्रकट सा
अधिक अप्रकट सा
भीतर पसंदीदा बाहर कम
तोलता रहता स्वयं का कर्म
अधिकांश झूठ भरी जिन्दगी
नहीं चल सकती
श्वास हमारी बिना झूठ
रहता आवश्यकतानुसार
ओर कभी तो बचाता हमें
हर असंतुलित दशा
जीवन स्थूलता सूक्ष्मता बीच
समन्वयक
अहं आवश्यक प्रवृत्ति पोषक
असामान्य जीवन साक्षी
बनावट दिखावे का पुजारी
उच्च कोटि का झूठ
नहीं लगता मुझे
बिना इसके शोहरत संभव
केवल मान्यवर ही नहीं
श्रृद्धेय भी होते भ्रमित
झूठ निर्मित अपनी प्रतिभा
एक पक्ष जीवन का सत्य
बहुत कम हल्की सी झलक
कभी कभार
अनजाने स्वाभाविक
रश्मि सी आभा का कतरा
सरलता से व्यक्त हो जाता
झूठी अभिव्यक्ति बीच
ओर अपनी प्रभा से
रोशन हो जाता सारा व्यक्तित्व
ओर करिश्मा यह भी
आचरण किया
समूचे झूठ का अस्तित्व
साकार हुआ
भीतर का कचरा जल जाता
हल्की सत्य की
प्रस्फुटित चिगारी से
आह सत्य
उतरो ना हर जीवन झूठ बीच
चिंगारी की तरह
जले वासना का अधजला धुआँ
प्रकटे पावनता व्यक्ति
बन सके हर मानव स्वाभाविक
हर अतिशयता त्याग बन संतुलन हो
मेरे सत्य आओ ना दो जीवन
मानवता भरा निर्लिप्त जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।