Sunday, April 10, 2016

त्रासदी ।


अचंभित करता
सज्जन का कृत्य
राक्षसी कदाचार
ओर यह जब करता
प्रसिद्ध चरित्र वान तभी
विश्वास का अंत होता
बड़ा समय ओर डर लगता
ओर नहीं पक्का
फिर दुबारा हो पाये विश्वास
सत्ता मद की अकड
स्वाभाविक चेतन का करती दमन
समझ आता सर्वोच्च मैं
ओर अहं रस सागर
नहीं रखता विवेक
जिनकी पृष्ठभूमि पर
सिंहासन पाया
फिर होती शुरुआत
उन्हीं की जड़ कटाई
घिनोना कृत्य
पूर्वाग्रह की कुंठित दशा
नहीं आता समझ चरित्र
सत्ता गलियारों का
ससीम समयावधि में
जहर का धुआँ
असीम मानवता की भावना
सोख देता ओर
भर देता त्रासदी
बीज बन जाते विकृत
सर्व विनाशक
नहीं लगता कि तब
मनुष्य जीता जिन्दगी
किंवदंती दानवों की साक्षात ।
छगन लाल गर्ग ।