Thursday, April 21, 2016

आकांक्षा ।

बड़ी रहती आँकाक्षा
मेरी मिले मौका
बता सकूँ अपना संचित
ढूँढता अवसर हर समय
नहीं चुकता मौका
यदि मिलता
बताता जाता अपना ज्ञान
बिना आवश्यकता बिना पूछे
उथला हूँ घना
पूर्णता नहीं आई अभी
कारण यही कि रहता हूँ हर समय
लालायित प्रकट होने
बताना भी स्व को बड़ा खतरा
पर लेता हूँ जोखिम
ओर करता जाता अधूरेपन का प्रदर्शन
बार बार पाता हूँ संतुष्टि
बहुत गहरे जानता हूँ मैं
बहुत गहरे तक पसरा मेरे भीतर
अज्ञान का अंधकार
ओर यही कारण शायद
इस अभाव की प्रतिक्रिया का मूर्त
स्थूल बन चूका हूँ मैं
पाखण्ड युक्त ज्ञान सुना सुनाया
बिना प्रमाणित
केवल हल्के स्पर्श से स्पंदित हुआ
करने लगा
भावनाओं का विश्लेषण
शाब्दिक समझदारी मे उलझा हुआ
गूँथा मेरा व्यक्तित्व
बौझिल हो चुका अपनी ही मार
अच्छा हो शब्द राग बने
स्वर बन लहर बने
ओर विलय हो सके अमूर्त प्रकृति
पवन की संगीत ध्वनि बन
प्रार्थना राग पहुँच सके प्रभु द्वार ।
छगन लाल गर्ग ।