अवक्तव्य रह जाती अनुभूति
पीडा भरी गहन व्याकुलता
अनुकूल शब्द नहीं पाती
व्यक्त अपूर्ण असार रह जाता
तहे कुरेदता रहता
विकल दारूण जिन्दगी की
ओर हम झूठ के छाये
करते कोशिश
तलाश करते कोई बहाना जीने का
अनुभूति दर्द हमारा अपना
असत्य की वैशाखी का सहारा पाया
गुजारता जाता नीरस जिन्दगी
नहीं यह छल बौद्धिकता नहीं
केवल अहसास
नीरसता मे बनावट रस पाने का
केवल बाहरी उपक्रम
अहंकार के नीरस छाये का सत्य
ओर यही रह गया आज
अनुभूति की निश्छलता का रहस्य
कृत्रिम युग का वक्तव्य नहीं रहा
विश्वास देय सरस अनुभूतिमय जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।