Tuesday, April 5, 2016

जजबात।


जजबात बेमिसाल जन्म पाते
मोहाशक्त सौन्दर्य नूर पाकर
दिल भरता उड़ान
बिना पंख बिना सामर्थ्य
भीतरी धुआँ रोकता श्वास
पाने महक की आस
नादानी नहीं आती गुफ्तगू करते
अंतर जमे पावन पैनी मारक वेदना
लेती मंजे शब्दों की शक्ल
ओर तब बन जाता
मोहाशक्त गुलदस्ता मोहब्बत का
बोलता गरज करता पैगाम देता
ओर शबनमी प्रेम पीघलता
स्वाभाविक स्नेह ओस बनकर
भावनाओं मिश्रित ओस मोती
देते चमक पावन इजहार भरी
ओर होता रहता विकसित
इस धरा प्यार का बेहिसाब दरिया
करता जाता आमंत्रित
नये खूबसूरत गुलसन सृजन निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।