सक्षम नहीं अभिव्यक्ति
हर बार भावानुरूप
कर सके जीवंत क्षणों का
बिम्ब शब्द चित्र प्रस्तुत
पर हर साहित्यज्ञ देता
कौशल विशेषता
बड़ा कठिन पर
यह दावा
कि सक्षम हूँ मैं
शब्द शिल्पी
तरासता हूँ बिम्ब
चित्र शब्दों से
अपनी
कुशल अभिव्यक्ति बनाती
भावानुरूप शब्द चित्र
संचय मेरा
कथन सत्य कैसे हो
शब्द विशेष़ज्ञों का
नहीं स्वीकार्य
भावों शब्दों बीच
प्राकृतिक फासला
शब्द स्थूल आकार
देते पहचान
ओर भाव सूक्ष्म
अदृश्य
अनुभूति मे विचरण
कभी घनी काली घटा घीरे
अस्तित्व विलय होते
कभी सौन्दर्य सुरभि मे
विलय हुए
इठलाते रसलीन रहते
आश्वस्त नहीं होता मैं
मेरे शिल्पी
अतिरेक तुम्हारा वाजिब
इसी से अस्तित्व तुम्हारा
अन्यथा कि स्थिति
साधारण जन
विलय तुम्हारा।
छगन लाल गर्ग ।