कहते ठीक
मन करता सुनू तुम्हें
पर इससे क्षणिक भुलावा स्वयं को
बलात झुकने का अभ्यास करता
तुम्हारी संवेदना के साथ
गांठ तनिक पीघल सके तुम्हारी संवेदना
आह तपिस आने दो कसक भरी
शब्द नहीं उबलता बहाव पीर नीर बनता
सरकता आँखों की भाषा बना
हृदय अति गहरे
आलोडित होता भावों का समन्दर
भिन्नता का यह आलिंगन
हो उठता हलचल भरा द्वेत
समझ की स्वप्नवत परछाईयां घेरती
आलोडित झंझावत सा बहाव
हो जाता घुलनशील दो विपरीत छोर
यह मंथन तात्विक विचार संक्रमण
ओर अंकुर लेने लगता
स्थूल सूक्ष्म मिल नवाकार
असंतुलन हमारा देता घनीभूत पीडा
ओर हम सत्य असत्य का सार मिले बिना
चाहते भुलावा जीवन से
दुर्गति का जाल गुँथता नित्य हमारा स्व
अकर्ता हम बन जाते कर्ता
ओर जीवन का यह दारूण बहाव
अंतोत्गत्वा डूबाता रहता हमें अंधी कंदरा
यही सच जीवन तुम कहो कहते ठीक ।
छगन लाल गर्ग ।