अंधकार सत्य
प्रत्यक्ष छितरा पडा
मेरे भीतर
युगों से विलय हुआ
मेरे तन मन मोहपाश प्रबल
त्यागना परिणाम
सर्वांग मृत्यु चेतन अचेतन
अनुभूति मर्म महीन किरण
नहीं पाती तनिक सार
पहुँचते ही करती विनाश
अभेद्य रह जाता अंधकार
दुख रजनी सा परम सत्य
नहीं अंगीकार तो क्या
नहीं आता अंतर वर्चस्व
करता वहीं जो प्रकृतिस्थ
कालिमा मय मादक श्रृंगार पायी
मध्या नायिका सी रात्रि
अचेतन का मादक नशा
भरती जाती नायिका
कौतुहलमयी रमण विभोर तन
बहने लगती मदिरा नस नस मेरी
आह इसे नाम दूँ सुख
या कि मृगतृष्णा सा अहसास दुख
नहीं हो पाया निर्णय
पर यह हो चुका निर्णय
जीवन का अर्द्ध सत्य अटल
कि बेझिझक कहता फिर फिर
अंधकार सत्य ।
छगन लाल गर्ग ।