समझ नही पाया
आज तक
जीवन लक्ष्य
साहित्य साक्षात
नही आया
जीवित रहने मे काम
आवश्यकता होने पर
विलुप्त हो जाता
किताबी ज्ञान
बदलता हैं हर पल
नये अंदाज लिए
विवेक गडबडा जाता
अंधेरों के घने छाये
रोकते हैं रोशनी
बाहरी ओर भीतरी
ऐसे मे मेरे चेतन
आत्मीय रहो ओर छुओं मेरी
अंधेरे की दुनिया
महसूस करो मुझे
मेरा पात्र खाली घना
स्व उत्पन्न विचारधारा
टेढे मेढे रास्तों सी
नही चला जाता
इस गति बढती लंबी दूरी
कैसे होगी पार
मिलेगी मंजिल संदेह अटल
नही जीया जाता खामोशी
ओर शब्द नही होते समर्थ
विश्वास दे सकूँ जिन्दगी तुझे
शब्दों से
एक गुमनाम गली बन चुकी
जिन्दगी
ओर सहारे सभी व्यवहारिक
जिससे चलता रहता
व्यवसाय जीवन का
अंत शून्य भरता जाता
अंतहीन जिज्ञासाओं का झोला
केवल सत्य सार मिथ्या जीवन तेरा
खूब कहो पलायन वादी मुझे
अच्छा है
कुछ कहने लायक बनने मे
पात्रता तो हो ।
छगन लाल गर्ग ।
आज तक
जीवन लक्ष्य
साहित्य साक्षात
नही आया
जीवित रहने मे काम
आवश्यकता होने पर
विलुप्त हो जाता
किताबी ज्ञान
बदलता हैं हर पल
नये अंदाज लिए
विवेक गडबडा जाता
अंधेरों के घने छाये
रोकते हैं रोशनी
बाहरी ओर भीतरी
ऐसे मे मेरे चेतन
आत्मीय रहो ओर छुओं मेरी
अंधेरे की दुनिया
महसूस करो मुझे
मेरा पात्र खाली घना
स्व उत्पन्न विचारधारा
टेढे मेढे रास्तों सी
नही चला जाता
इस गति बढती लंबी दूरी
कैसे होगी पार
मिलेगी मंजिल संदेह अटल
नही जीया जाता खामोशी
ओर शब्द नही होते समर्थ
विश्वास दे सकूँ जिन्दगी तुझे
शब्दों से
एक गुमनाम गली बन चुकी
जिन्दगी
ओर सहारे सभी व्यवहारिक
जिससे चलता रहता
व्यवसाय जीवन का
अंत शून्य भरता जाता
अंतहीन जिज्ञासाओं का झोला
केवल सत्य सार मिथ्या जीवन तेरा
खूब कहो पलायन वादी मुझे
अच्छा है
कुछ कहने लायक बनने मे
पात्रता तो हो ।
छगन लाल गर्ग ।