Thursday, April 14, 2016

मेरी चाह ।

संतुलित रहने की
मेरी चाह
बढती जाती ओर
नही हो पाता यह
उबड खाबड घनी
जीवन राहें
हर कदम देता असंतुलन
धरातल का सत्य
जोडता जाता मुझे अपने से
ओर मैं बन जाता वही
जैसाकि धरातल
लगने लगता जुड चूका मैं
संपूर्ण विराट से
जुड गया हूँ चाँद तारों की
शीतल रोशनी से
छिपते दिखते तारों की
प्रभा बीच
मेरी भी
एक चेतना की किरण
हाँ मिल चुका
मेरा अंश रश्मि बन
पक्षियों के कलरव मे
राग झरता मेरा भी
तुम देते चौट मुझे
पत्थर बनकर
होता घायल पत्थर भी
मेरी तरह
ओर वह भी भयभीत
मुझमे बसने लगता
जडता से बचने निमित्त
पत्थर भी
हो जाता चेतन मुझ सा
हर मनुष्य आस पास  का
बंधा हुआ मुझसे
मेरी प्रसन्नता हिलोरे लेती
संपूर्ण सृष्टि
अस्तित्व होता झंकृत
नही भिन्नता मुझमे
सृष्टि की
तभी रह पाता संतुलन
जब
सृष्टि देना चाहती
घुलनशील हो चुकी
मेरी चाह
विराट अस्तित्व संग ।
छगन लाल गर्ग ।