Saturday, April 23, 2016

मजबूरियाँ।

सुनना पडता अनचाहा भी
समाज व समुदाय में
मूल्य स्थापित हो सके
करता अस्वभाविक भी
रखनी होती
सज्जनता भरी धैर्य शालीन छबि
प्राकृत न होते भी
बन जाता हूँ बनावट लिपटा
पाखण्डमयी पावन शालीन व्यक्तित्व
जानता हूँ भीतर सामने साक्षात
व स्वयं का असलीपन
भीतर का खेल सब
युग का यह रहस्य वाद
बहुत अनुसंधान की जरूरत
बहुत भविष्य की उज्ज्वलता
तनिक रहस्यमय पर सार्थक
परिणाम देय वरदान तुल्य
समझना होगा युग का रहस्य
केवल इसी बहाने
बिना प्रतिभा करणीय प्रतिभा
मायिक मृगतृष्णा का स्थूल वैभव
चतुराई काग समान स्थिर कर
पायी जा सके गरिमा
कारण मात्र यही
अन्यथा आक्रोश मय आवेग
घना प्रबल
दबाता भीतर अति चेतना के जोर
भविष्य निर्माण अवसर निखरता
ऐसे ही समन्वय द्वारा
रखना होता नालायकों को भी
ऊँचे व्यक्तित्व का वजूद देकर
कि बना रहे संतुलन अच्छाई बुराई का
सुनो नहीं पर यह ज़रूरी
दिखते रहो एकाग्रता से सुनने मे मग्न
ओर तभी हो सकेगा
अधिकांश जीना हमारा शान्तिमय
जितना हम भीतर मरते जाते
उतना ही बाहर का विस्तार मिलता
ओर इस युग बहुत आवश्यक
भीतर के विस्तार से
बाहर के वैभव का विस्तार
युग सत्य के ताप फ॔सी हुई
सत्ता की कुँजी भी
आज कल बंधती छूटती
तडप भरती जीती
आम जिन्दगी की तरह ।
छगन लाल गर्ग ।