ओर हुआ यह
नहीं चाहते भी विद्धवता के भरोसे
ओछे ज्ञान का अहसास खुद का
यह एक निश्चय स्वयं के अधूरेपन का
मेरा अपना स्व बोध निम्न
ओर इसी कारण
कई बार साध लेता मौन
जहाँ देते प्रवचन उच्च पदस्थ डिग्री धारी
पर आज शिक्षा जगत की ऊँची हस्ती
शब्दों के प्रयोग को जिस अंदाज मे
ले जाते अपने अहंकार निमित्त
ओर मतलब आपूर्ति उच्च सम्पन्न वर्ग
अपनी मानसिक क्षमता की उच्चता पर
नहीं पा सकता अर्थ कोई
लगता ऐसा अपनी तरह भाषा को भी
बनाना चाहते जटिल अपनी तरह
जहाँ नहीं मिले कोई अर्थ भाषा को
ओर मौलिक अभिव्यक्ति का हक
छीना जा सके क्षमता की बलिवेदी पर
यही होना चाहता आज प्रबुद्धों से
समय रहते जरूरत आ चुकी सोचने की ।
छगन लाल गर्ग ।