Thursday, April 21, 2016

अस्मिता का प्रश्न ।

नीचे फैंका कचरा
बिगड़ती जिन्दगी का सच
सार्वजनिक स्थलों पर
हमारी समझदारी का
सबूत हैं पसरी गंदगी
ओर हमारे शुद्र
सेवा मे सलंग्न प्रतिदिन होते
रूबरू सभ्य जानलेवा
व्याधियों से
नहीं कीमत का ओचित्य
उनकी जिन्दगी
उपर उठता हुआ झाडू संग
संग्रहित करती कचरे का ढेर
सुबह सुबह हरीजन नारी
अपनी ड्यूटी का साक्षी बनी
बंधा हुआ यौवन
लावण्यमय विनयशील
चेहरे का भौलापन
मुँह मे पान दबाये अनवरत कार्यरत
झुकी झुकी
करती जा रही सड़क सफाई
सुबह की चाय के शौकिन युवा
होटलो पर चुसकी संग
कसते जाते फब्तियाँ
काम की तलाश में झुंड के झुंड बैठे
बतियाते आदिवासी युवक युवतियां
ओर नौकरी पैशा जिम्मेदार
बस व टैक्सी की राह खड़े देते जाते
अपशब्दों का तौहफा
धूल के उठते बंवडर से परेशान होकर
बड़ा अजीब माहोल हर कोई व्यस्त
चाय की चुसकी लेते
युवाओं की घूरती नजरे
अपलक ताकती
सफाई करती हरीजन युवती
झेंपती सी बढ़ती जाती अनंत बिखरे
कचरे की ओर
निकल जाता हूँ चुपचाप मैं
सड़क से हटकर
नीचे की कच्ची पगडंडी
सोचता हुआ
मतलबी दुनिया का सच
हर कोई उतारू जीने को
दूसरे की अस्मिता को रौंदता हुआ
मात्र अपने मानसिक स्वार्थ
को लेकर
असंतुलन भरी जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग ।