Wednesday, April 27, 2016

दिक्कत ।

दिक्कत तो होती हैं
जब तुम जीते हो इंसानियत
इस युग बनते जब दकियानुसी
हर प्रतिष्ठित मेहनत से बना अमीर
ओर मेहनत
निर्बल को हौशियारी से गिराने की
उसी की छाती पर निर्भर तरक्की
तुम अपने हो इससे कहता
आशाऐं जुड़ी तुमसे
ओर तुम
असलियत बन गये मेरे ही विरुद्ध
भाई यह तो भीषण छल तुम्हारा
कैसे कर सकते तुम यह सब
जरा सोचों
नन्हे बच्चे तुम्हारे
बिना मेरे सहारे ले पायेंगे शिक्षा
प्राइवेट स्कूलों में
ओर सरकारी स्कूल कहां हैं शिक्षक
ओर जो हैं वे सरकारी योजनाओं में
प्रतिनियुक्ति पर
स्कूलें बिना शिक्षकों के
सुनो समझो छोडो नाटक ईमानदारी का
अपनाओ मुझे मैं हूँ बेईमान
मजे करो ओर कराओ
थोड़ी सा समर्पण नेताजी के प्रति
जिन्दगी बना देगा
अरे फायदा उठाओ तुम पढ़ें हो
अनपढ साक्षर मंत्री बने
क्या बिना समर्पण के
अकड ईमानदारी छोड़ो
जीना सीखो दुनियादारी
शून्य कर दो विचार सहृदयता ना रहे
केवल दिखावा हो मानवता का
ओर वो तुम हो
आकार शरीर देता सूचना
तुम्हारे मानव होने की
बाकी छोड़ दो मुझ पर
विश्वास करो मुझ बुराई पर
आखिर आशाऐ पूरी मैं ही करती
जीवन का सुखद सार
बांटती अपनत्व देती
अब मनन चिन्तन का नहीं युग
जिन्दगी जीने का संघर्ष मात्र
ओर बिना बेईमान हुऐ जीओगे कैसे
फैसला तुम्हारा
कि किसे तुम कहते उर्ध्व गमन
ओर किसे अधोगमन ।
छगन लाल गर्ग ।