Saturday, April 9, 2016

आराध्य निमित्त ।


यह थाल देह का
नहीं हो जाये कलुषित
समय के लंबे अंतराल
बांसीपन का घना भय
लेता जन्म प्राणों मे
कैसे रख पाऊँगा नवल मृदु
काल ताप से मुरझा ना जाये
फिर आत्म ग्लानि की पीड़ा भरा
यह तन श्रृंगार सुरभित
ना रह पाये लायक करने अर्पित
आरती निमित्त
सजाया संवारा
नहीं वश मे किस भाँति पहुँच पाऊँ
तेरे समीप
अनंत आशाओ का सार यह थाल
नहीं कर पाता अर्पित
पहले मेरा
विश्वास श्रद्धा भरा अनुग्रही
बढाता कदम तेरी ओर
सांसारिक आशाओं का सिलसिला
नहीं रूका चलता रहा
ओर मैं निरंतर खोता रहा अस्तित्व
शून्य होने से पहले
आना चाहूँगा तेज कदमों तेरी ओर
आने दोगे मुझे भीड़ बीच
निकल पहचान पाना विरान राह
बहुत मुश्किल पर नहीं असंभव
एक रोशनी कतरा आने दो मेरी ओर
कि चीर कर भीड़ पहुँच सकूँ
तेरी राह जहाँ पसरा शून्य का सन्नाटा
कोलाहल रहित सुखद छांव
आने दो मेरे आराध्य
कि हो सके साकार प्राण राग विलय
तेरे राग सागर
ओर यह देह थाल कर सकूँ अर्पित
तेरा तेरे ताल ।
छगन लाल गर्ग ।