Monday, April 25, 2016

शब्द मेरे ।

कहते तुम कि
मैं अस्पष्ट असमझस भरा
शब्द मेरे नही सार्थक
उलझे उलझे खुद से खुद मे
ओर यही कारण
कि कई बार भीतर भीतर अहसास करता
कह दिया जो अनुभूति मे आया
शब्द मेरे हुए सहयोगी कि नही
शायद नही भिज्ञ स्वयं
भाव बडे प्रबल अचेतन जमे
परत दर परत
आघात होने पर ही तनिक करवट लेते
ओर वही देने लगता भाव शब्दो को
नही समर्थ शब्द कि
सत्य संभाल सके  पर
बनना होता वाहक भावो का
केवल शब्दो को
नही कोई ओर उपाय शब्दो के अतिरिक्त
ओर शब्दो में भी रहती गहराईयाँ
यह गहराई बढती तभी
जब व्यक्ति डूबता उतरता गहराईयों में
ओर महसूस करता जब होता यह
शब्द बनने लगते तीर
ओर चीरते अपने भावो की तपिश से
हृदय मेरा
नही रहती आवश्यकता
शब्द मीमांसा की
स्वतः प्रकट होते जाते रहस्य अनकहे ।
छगन लाल गर्ग ।