बहुत हो गया
आज मनुष्य तुरंत चाहता
अपने किये का फल
नहीं रहा धैर्य
अब संयम सीमा रही नहीं
धैर्य अच्छा गुण
पर एक सीमा बंधा
फिर स्वतः आक्रोश छा जाता
जब घनी मेहनत बाद भी
नहीं पाता चाहा
अपने ही प्रयास की विफलता पर
खुद से खुद के प्रति आत्म ग्लानि
घेरती बना देती कुंठित ओर दोषी
बिना किसी अपराध
दुर्भाग्यपूर्ण घड़ी जीवन की
जब आशाओं की अतिशयता में
करते जाते अथक प्रयास
क्षमता की अंतिम सीमा तक
ओर यह सबके होने पर भी
नहीं मिलता
परिणाम का रतिभर भी अंश
सच कहता वहीं वहीं यह जीवन
मनुष्य होने का अहंकार
ओर क्षमताओं का यथार्थ
हो जाते नग्न
अपनी यथार्थ कुत्चित प्रवृत्ति
ओर घृणित भद्देपन के साथ
असल मे यही जन्म लेता
आत्म निन्दा का भाव
मानव की त्रासदी का सच
अहं मिटे बिना यह समय
जीवन की आत्म हत्या का
बनता अंतिम विकल्प
पर आस्था मय व्यक्ति
जीवन सत्य का राही
संयम का साक्षी
मनुष्य देता हैं परीक्षा
धैर्य की जीवन रहने तक
उसी उत्साह उसी विश्वास
उसी आस्था से भरा
ओर वहीं पाता
असलियत का परम साक्षात्कार
वहीं धन्य वहीं परम जीवन का पारखी
अच्छा हो हम निर्लिप्त वासनामय
समर्पित रहना सीखे समय के शरण ।
छगन लाल गर्ग ।