Thursday, April 21, 2016

फासला ।

खूबसूरती करती मोहित
आशक्त हूँ मैं
नशीला रूप मादक यौवन
सुरभि बिखेरता तन तुम्हारा
मधु हलाहल का हिलोर लेता
असीम गहरा दरिया
खो गया संपूर्ण अस्तित्व
नहीं रहा मैं
समर्पित मन वासना गंध से
उतेजित उन्मादित
बहुत विशाल सृजन का स्वामित्व
मन करता जाता सवारी
सौन्दर्य के अथाह घनत्व पर
पर कहीं हल्की सी खरांच
उभरती दर्द की जलती लकीर
दागती जाती हृदय का कोमल अंश
करती घात आत्मा पर
नहीं शरीर सौन्दर्य से नाता
आत्मा का
अनंत फासला
आत्मा ओर शरीर बीच
सौन्दर्य शरीर केवल
झरोखा बना
असलियत की झलक का
मत समझना इसे सर्वांग
अतुलनीय दुराव
आत्मा व शरीर बीच
पाटना असंभव
मत रूको इसी सौन्दर्य
सीढ़ी केवल यह
संकेत करती
परम का
मत रूको मेरे प्राण
शरीर सौन्दर्य
रहोगे क्या पास बूझते भी
शरीर का सामीप्य बनाता
आत्मा से फासला
ओर सत्य
तरसता प्राण चाहता
परमानंद परमात्मा तुल्य
रहो ना समीप आत्मा के
हो सकोगे
दूर तन सौन्दर्य
स्वतः अलगाव ओर परिणाम
सघन चिर आनंद आत्म सौन्दर्य
मेरे प्राण
नहीं चाहता संसारी छलभरा
सौन्दर्य  जो देता तृष्णा रस केवल क्षणिक ।
छगन लाल गर्ग ।