अटक जाती नजरें
वहीं जहाँ पहले कभी
वट वृक्ष की
विशाल समतल घेरती छाया
सघन ठंडक से करती
आकर्षित
कैसे रूकूँ अब यहाँ
बिना अपनत्व
अब केवल घेरती जाती
यादें अतीत देती सिरहन
उभरता कसक का
जलाता उफान
लंबा चला यह दौर
छाया के साथ खूब रहा
तमाम उम्र
परन्तु अब नहीं रही
घहराई छाया
झुरम्मट डालियों ओर पतो का
नहीं रहा अब
हरियाली खा गया मानव
अपनी भूख
काट दी विशाल शाखाऐं
सौन्दर्य मयी सघनता की दौलत
अब नहीं रही
नहीं कूकती कोयल डालियों पर
सूखे तने का ठूँठ बन चुका
मेरा आसियाना
लगता उम्र साथ हो चुका मुझसा
अंतर केवल इतना सा
मुझे काटा जर्जर किया अपनों ने
ओर मेरे साथी वटवृक्ष को परायों ने ।
छगन लाल गर्ग ।