ऐसा मत कहो
बढ जाती हैं पीड़ा
होता हैं हर घर
अपने लिए करना किसे नहीं
लगता अच्छा
अब देखो सब दिखता
जो कभी नहीं पा सके हम
अच्छा खाना पीना
अच्छा बिस्तर खाट
सुनती हो सपना था पाला
हम दोनों ने
उस समय संचय नहीं रहा कभी
कि हम अछूत रह जायेंगे
अपने ही बच्चों से
ओर बाहर टूटी खाट पर
बतियाते रहने पर लगेगी फटकार
जरा धीरे बोलो
बहू बड़ी कडक हैं बेटे से
ख्याल नहीं आता
बेटा कभी बोला हो
उससे ऊँची आवाज
अपना नसीब
कि अभी हम दोनों हैं जिंदा
सच कहूँ
तुम फिर भी सहन कर लेती हो
फटकार
मैं नहीं कर पाता
मर भी नहीं सकता तुम्हारे कारण
देखो वादा करो
मरना मैं चाहता हूँ पहले
तुम्हारे बिना यह नरक
मुझे ना मिले
करोगी ना दुआँ मेरे लिए
वृद्धा पत्नी का हाथ बढकर
ढक लेता हैं मेरा मुँह
अस्फूट स्वर बहुत दूर से आते सुनता
ऐसा मत कहो बढ जाती हैं पीड़ा ।
छगन लाल गर्ग ।