Tuesday, April 19, 2016

मोह ।

नही रहा मोह
भीतर की अनंत इच्छायें
अभिलाषाऐं
स्वयं स्वभाव स्वच्छन्दता का
आशक्त करता
नहीं रहा मोह अब
आना चाहता बहुत दूर से
अदृश्य आसक्ति देता
निर्विकार चेतन रश्मि पुँज
मेरी ओर
अचंभित चित करना चाहे
अज्ञात का स्वागत
अलौकिक रश्मि का
निर्मलता का आभास भीतर
अहसास करता
दृष्टि होती जाती निरावरण
नहीं परदा नहीं आवरण
भीतरी मोह फलित अभिप्शा का
अति दूर का दृश्य
दिखने लगता साफ साफ
सीधा सीधा
अब लगता जाता
नहीं रही मन की कोई अपनी इच्छा
कि देखूँ मन का कि ऐसा कि वेसा
नहीं नहीं आवरण हट चुका
मिथ्या का असार का
देखने लगा हूँ साफ साफ
सुंदर भी असुंदर भी बिल्कुल सीधा सा
विभ्रम का सुंदर जाल
अब भी चारों ओर घेरता मुझे
असलियत जाना फिर माया बना
आशक्त करता भी यह हर पल
पर डसता नहीं अब
कास इस मर्म ज्ञान जानकर
अंगी कृत करता हर कोई
जीवन तभी पाता पावनता ओर
संघर्ष परिवर्तित हो पाता प्रेम में ।
छगन लाल गर्ग ।