Monday, April 18, 2016

कहने दो।

कहने दो
अंतरमन की कसक
काल कलवित वेदना यह
बहाव चाहती
मत रोको
विडंबना का राज शायद
उकेरने निमित्त
उठती भीतर की हूक
हुई जाती घनी प्रबल
शब्द नहीं देते साथ
हुई घनी द्रवीभूत
पाये कैसे आकार पीडा सा
राग स्वर वेदना व्यथित
हुआ जाता अस्तित्व मेरा
व्यञ्जन शक्ति नहीं सार्थक
अभिव्यक्ति निमित्त
क्या हो निशब्द चलने दो
विरह राग प्रवाह होने दो
निर्मल मन
अतिसार हुआ जाता अब
विदेह मिलन
अबाध निरंतर आते हो तुम
कर देते क्षुब्ध व्यथित हृदय मेरा
अपार शिथिल शान्त व्यथा
कर जाते लघु
अब पहचानने लग गया तुम्हें
अदृश्य रूप भी तुम्हारा
होने लगा अहसास
ओर भी नाना रूप लेते
करते रहते क्रीड़ा घनी तुम
मेरे अपने
नहीं दे पाये ना तुम
धोखा मुझे
कोई भी रूप करो धारण
हर रूप तुम्हारा लुभाता मुझे
कभी सुरभि बन फैलते वायु संग
कभी दुर्गंध बन जाते मौत की
वाह अब तो
आ गये तुम मेरे घर
मेरे आंगन मेरी कोख
आह कैसी यह परीक्षा मेरी
मेरे अदृश्य इतराने लायक
भाग्य दिया मुझे
कि समझा तूने मुझे
परीक्षा लायक ।
छगन लाल गर्ग ।