कुण्डलियां छंद ।
असमंजस घनी घीरा , अकाल पडा विकास ।
स्वीकृति स्वहित काज,जनहित बना विनाश ।
जनहित बना विनाश, सुशासन भरता दावा ।
खिल रहा फूल कमल, विरोध पर करे धावा ।
पलटन भक्त लूटो, अधिकार सबसे बलवस।
शासन धनिक मद से , करो चुकाना समंजस ।।
दुर्दिन निर्धन जानकर , हम पर है विश्वास ।
अच्छे दिन की आस मे, वोट दिये अधिकांश।
वोट दिये अधिकांश, भाषण खूब बरसाये।
नोट बंदी कारनामा, निर्धन जन को सताये।
सुशासन अहंकार ,खूब प्रचारित नित दिन ।
अवसर सुंदर हाथ, सुधरे घर मिटे दुर्दिन ।।
छगन लाल गर्ग ।
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असमंजस घनी घीरा , अकाल पडा विकास ।
स्वीकृति स्वहित काज,जनहित बना विनाश ।
जनहित बना विनाश, सुशासन भरता दावा ।
खिल रहा फूल कमल, विरोध पर करे धावा ।
पलटन भक्त लूटो, अधिकार सबसे बलवस।
शासन धनिक मद से , करो चुकाना समंजस ।।
दुर्दिन निर्धन जानकर , हम पर है विश्वास ।
अच्छे दिन की आस मे, वोट दिये अधिकांश।
वोट दिये अधिकांश, भाषण खूब बरसाये।
नोट बंदी कारनामा, निर्धन जन को सताये।
सुशासन अहंकार ,खूब प्रचारित नित दिन ।
अवसर सुंदर हाथ, सुधरे घर मिटे दुर्दिन ।।
छगन लाल गर्ग ।
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