Monday, February 29, 2016

चाहत ।

अकेले रहना
चैतन्य की अंतिम दशा
एक नहीं हैं
सामान्य क्रिया
नहीं रह पाते
 हम अकेले
ओर
चाहत भी नहीं
कि भाता हैं
अकेलापन
ओर स्नेहिल रिस्ते
बुलाते जाते
 पास पास
सामिप्य पाने को
होते रहते
आतुर अपनत्व लिए
जुडाव की चाहत
समय के साथ
बदलती करवट
नवल
 यौवन उन्माद क्षण
समय के अंतराल से
भावना की आस्था में
करते जाते
 अलौकिक
स्नेह का अहसास
लौकिक नेह पा जाता
 प्रार्थना का राग
ओर चाहत हो जाती
पावन
विशुद्ध बन
उठती साधना सी
अंकुर हो जाता
अकेलेपन मे पल्लवित
रागमय  स्वर
हृदय की वीणा सम
तंरग भरे
कामना भरे
चाहत का यह क्षण
बन जाता
चेतन तंत्र
फिर नहीं कहता
प्रेम रहता स्थूल
पहुँच जाता
सूक्ष्म बन
परमेश्वर की प्रार्थना तक ।
छगन लाल गर्ग ।

अधूरी यात्रा ।

स्पष्ट अहसास नहीं
जीवन हैं कहां
अपने आवास देह मे
या कि विचारों के गुंफन में
नहीं स्पष्ट आभास मुझे
अपना भी कि जीता हूँ इसे मैं
या कि जीना मजबूरी
रह रहकर झेलता अपना ही विरोध
हर बात पर
झगडता हूँ अपने से
साबित करता हूँ अच्छा बुरा
अपने स्तर पर अपने लिए
जीवन मे भोगने निमित्त
नहीं पाता भीतरी तुला का सत्य
दुविधा मे भावों के आसरे
जीने लगता हूँ जिन्दगी
अनजानी अनदेखी जिन्दगी
करता जाता अफसोस भी
जब मेरे स्वार्थ होता
दूसरों का बुरा
पर संभलता नहीं फिर
लाभ का मोह खीचता जाता
मतलब की राह
अब बन चुका अपने आकार के साथ
जीवन भी बेडोल
नहीं मापदंड मानवता के
रखता पास
ओर अपने से भी जीवन से भी
नित्य बिछुड गया
नहीं जान पाया स्वत्व भी
जगत व्यवस्था भी
अब लगता यह कि जीवन
मात्र बेमतलब अधूरी यात्रा ।
छगन लाल गर्ग ।

Sunday, February 28, 2016

स्मृति नही चेतन ।

स्मृति  नही  चेतन
अनुभूति  की  त्वरित   उपज
स्मृति पूर्व भुगता अनुभव
जिसका होता मात्र दोहरान
एक  पुराना  सत्य  भोगा
जो तत्कालीन उपज चेतन की
ओर गत्यात्मक समय
बदल देता हर पल का सत्य
कल  अब नही
वह बन चुका अतीत व्यतीत
नही  उपादेय तत्काल क्षण का अंश
बदल चुकी समय  की सच्चाई
हर पल बदल देता अतीत का सच
बदल जाता जीवन
उसके  विचार उसकी राहें
जीवन हर  दिन से रहता असंगत
संगत मानव केवल अतीत
आओ जीवन को संगत नही
असंगत बनाये
हर नव बोध स्वगत करें।
छगनलाल गर्ग ।



पकड ।

बडप्पन का आग्रह
अब नही मांगता अपना हिसाब
शायद भयभीत हुआ जाता
अपनी  उम्र के वजन से
नही रही लायकी
अपने से छोटो पर भाई के हक
जताने की
ओर नही  आवश्यकता
सदगुणों का पाठ पढाने की
समझदारी मे बहुत हैं आगे
अपने बाप से भी
ऐसे में बडे भाई का सुझाव
लगता गालीगलौज की तरह
सत्य कहना भी
हो चुका जोखिम
अपने ही घर हम
होते जाते बेगाने
संबधों का विवेक अब
गहरा रहस्य बना
जहां केवल पकड बनी रस्तों की
आपकी संपत्ति
आपका समर्पण छोटो के प्रति
ओर आप विवश हैं
विकल विपदा से लिपटी
जिन्दगी जीने को
बिना किसी प्रतिक्रया के
बडप्पन का आज
यही रह गया मायना
अब पकड बडप्पन की नही
लडकपन की रही ।
छगनलाल गर्ग ।



उडान आमंत्रण ।

हर कदम
बढने से पहले
झिझक जाने दो
अच्छा रहेगा
राह का पूर्वानुमान होना
सुरक्षित व्यवस्था का
अवसर
किनारे से नही मंथन से
होगा
जरूरी हैं विकास की नई यात्रा
एक जोखिम जिन्दगी
नये रास्ते नयी जीवन शैली
बिना खोये का पाना है यह
पुराना त्याग
जो वास्तविक नही कभी
नये से जुडना भी
वास्तविक कहां
एक नीरस का त्याग करना
ओर नवीन रहस्यमय जीवन
अज्ञात असीम
मत रूको किनारे
रूकने के मोह मे ही हार छिपी
ओर नवीन मे
छिपे रहस्य ना भी पा
पर उस हार मे भी
अहसास होगा नवीन जीत का
यह ही है रहस्य भरी
उडान का आमंत्रण ।
छगनलाल गर्ग ।

संतुलन ।

समेटने लगता नित्य
फैलाव का दरिया
घनाकार हुआ जाता वर्चस्व
अतिशय हिलोर लेता
स्थापित करता जाता लकीर
अहंकार भरी
निरंतर अभ्यस्त जिन्दगी
नही चाहती संतोष का विश्राम
बढना चाहती अज्ञात विस्मय
टटोलने श्रेष्ठता के
जहां भराव पाने का मिले
कुछ अहसास
जहां नही लगे जीवन एक नियम
एक अनंत ऊँचाई की ऊडान का
ना मिले अंत
लगातार अथक होता रहे
असीम मे ऊडान
कि दुनिया जान सके अचंभे का राज
मेरे समूल अस्तित्व की अपरिमित
श्रेष्ठता
ओर यही सब पाने निमित
समेटते फैलाव को
नित्य लेता हूँ कसौटी की तरह
कि स्वयं बन सकूं अनंत असीम
जहां कभी ना हो
 संतुलन मानव की तरह
जीवन रहे ना रहे
भावनाओ का उफान
भरता रहे प्राण मे असीम की ऊर्जा
राग अचेतन बनकर ।
छगनलाल गर्ग ।


Saturday, February 27, 2016

कैवल्य ।

नही लगता
अपना कोई भरे घर में
अहसास होता जाता
बहुत दूर हूँ अपनों से
उम्र का संग्रहण
विकार भरा
असमर्थ रह जाता स्वयं
अपने तन से
हर कार्य पर मोहताज हुआ
यह जीवन
एकांत सुहाना लगता
नजारे उठती अनंत की तरफ
बहने लगते है आँसू
ढूँढने लगता हूँ अनंत मे
आशा से भरी रश्मियां
परम सुंदर लगता जाता
यह असीम आलौक
बस यह अकेलापन
अनंत भी विरान भी
नही कोई ओर
ओर अहसास पाता हुआ
स्वयं भी
डूबता होता जाता शून्य
यह बाहर का एकांत
होता जाता
भीतर का एकांत
शायद यही दशा
कैवल्य ।
छगनलाल गर्ग ।

सोच ।

व्यक्ति रहना सीखे मानव बन
संपूर्ण खिले संसार  में जीवन
राजनीतिक भय पर हो बंधन
धर्म राजनीति का न हो बंधन ।
धर्म असीम  व्यक्ति  श्रृद्धा
कर्म ससीम जीवन संपदा
धर्म रास्ता अलौकिक सदा
कर्म माया  मोहिनी संपदा ।
अनुभव कह खुद मनुष्य समझता हुआ
क्षुद्र बातों को लेकर लडने को पैदा हुआ
राजनीति से मत जोड मानव ईश्वर दुआ
धर्म हारता रहा जब वह आरूढ सत्ता हुआ ।।
छगनलाल गर्ग ।

प्रतिक्षा ।

हाँ करता हूँ निरंतर
प्रतिक्षा
अब तक नही हुआ स्पष्ट
पता नही किसकी
हैं प्रतिक्षा
लगता कोई होगा परिवर्तन
व्यवस्था में
ओर खुशहाल होगी जिन्दगी
मेरी भी तुम्हारी भी
आज तक
निराश भी नाराज भी
सोचता हूँ सब बेकार हैं
छोडो आशा
पर आशा छोडे भी
होगा क्या
जो होना था हो गया अब
ओर भी निरंतर
कृत्य घट रहे हैं
पता नही किसके निमित
हल्का सा भी आभास
नही पाया
कि कुछ भला होगा
पीसते जाते दुचक्रो के जाल
आम लोगो का
तुम कहते रहो
अच्छे दिनो का
ओर हम बिना जवाब मांगने का
हक छोड चूके
अब ओर करना भाग्य मे
हम निराधार नागरिको का
संवेदना हक है करते रहना
प्रतिक्षा ।
छगनलाल गर्ग ।


Friday, February 26, 2016

सूर्यास्त ।

समेटने लगता फूल
अपनी पंखुरियां
विकसा  सौंदर्य समेट लेता
अपने मे
नही विलुप्त की दशा
एक शिथिल अलसाई
समय की तरंग
डालती अपनी छाया
प्रकाश रश्मियां
सिमटती जाती वक्त की मार
पर यह गति का क्रम
नही बंधा किसी नियति
एक प्रकृति का संतुलन
नियम बन घेरता जग जीवन
संयमित सचेतन
ठीक मानव चित दशा की तरह
नही है आरोपित संयम
यह सूर्यास्त की तरह
सिमटता आनंद भरा ठहराव
जिसमे छिपा
अन्तर्मन की वीणा का संगीत
एक विधेयक ऊर्जा
जो सूर्यास्त से संचित
प्रबल शक्ति का संचय कर
प्रकट होती
सूर्योदय बनकर
कि फिर नव मधु यौवन लिए
खिल उठे
कोई मदमाती कली
मेरा संयम तत्पर हुआ जाता
पुनः नव निर्माण होकर ।
छगनलाल गर्ग ।





गिरने दो ।

तना हुआ अस्तित्व
ठूँठ सा
खूब जीया
चाहना लिए जोश खरोंच के साथ
पद की गरिमा को
खूब चमकाया
एक धौंस भरा मरू रस
असीम कामना से
अहंकार तृप्ति निमित्त
खूब सताया नेक इन्सानियत
धारित कार्मिकों को
एक उठा हुआ
धुँऑ बना रहा
हर किसी की ऑखों में
देता रहा जलन
बहुत अजीब होता यह भी
सर्वस्व का नशा
वर्चस्व की भूख बढाता जाता
जिन्दगी से होता रहता
बहुत दूर
नहीं पहचान पाता
तना हुआ अस्तित्व
तोलता जाता अतीत
व्यर्थ जिन्दगी के क्षण
हारा बेबुझ
आया अंतिम मुहाने
गिरना चाहता हूँ
गिरने दो मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।

प्रेम मेरा परमेश्वर ।

परमेश्वर मेरे
तेरे हर मंदिर आया
अनंत
 अभिलाषा के साथ
सुना था तू हर लेता
हर कष्ट
सुनाने से तुझे
मिल जाती
संतुष्टि विश्वास भरी
ओर
अचानक ही कृपा सागर
अदृश्य दया का सागर
देता करुणा की लहर
जीवन छा जाती
सुख की छाया
ओर यही पूर्वाग्रह लिए
हर बार आया हूँ
तेरे द्वार
अकारण नहीं
कारणों की
लंबी सूची के साथ
एक एक बांचा हैं प्रभु
हर बार जब भी आया
नहीं मिटी
 आज तक चाह
बढ़ती जिन्दगी के साथ
तृष्णायें भी लेती हैं उम्र
सच कहूँ मेरे परमेश्वर
थक चूका अब
तृष्णाओं का पिटारा
मंदिर लाते लाते
आज आया हूँ खाली
भारहीन अकारण
सहज आनंद की
भावना से
कुछ अनुभूत कहने
कुछ मांगने नहीं
केवल धन्यवाद निमित्त
केवल प्रार्थना के
भार को लिए
केवल प्रेम लिए
कि बहुत दिया तूने मुझे
मेरी पात्रता से अधिक
बहुत ज्यादा
आज अनुभूति से भरा भरा
लगता हैं पहली बार
कि पनपता निर्मल हुआ जाता
प्रेम मेरा परमेश्वर ।
छगन लाल गर्ग ।

Thursday, February 25, 2016

क्रांति ।

हृदय तू क्या होगा
नित्य पावन
या होता रहता तेरा भी
रूपांतरण
अपनत्व का अंकुर  उपजता
तेरे ही भीतर
ओर तब नही करता भरोसा
तेरा कि तू रहेगा निष्पक्ष
नही करता यह
आरोपण
एक व्यवहारिक स्वाभाविक सच
तेरी दुर्बलता का
तेरे अंधकार का
हो जाते तुम तनाव मय
शांत या विश्रांति दशा मात्र
निष्पक्षता से आती
करनी होगी मेरे हृदय अब
क्रांति सच्चाई की
अपने पराये को छोड सत्य की
क्रांति अंकुर लेती है हृदय से
सच्चा क्रांति कारी होता है हृदय
स्थित रहता वह स्व मे
रूपांतरण चाहने वाले भी
आते पास तुम्हारे
ओर यही से रूपांतरित होता
नया युग
नयी जमीन चेतना की ।
छगनलाल गर्ग ।


बहती धारा ।

नही अहसास होती
व्यक्ति की अधिक प्रबुद्धता
अब वह चिंतन मुक्त हुआ
या चिंतनशील
एक प्रवाह शक्तिशाली मौड देता
विद्धान की विद्धवता
चिंतन का मौलिक हक
जरूरी हो जाता जिन्दगी के लिए
स्वाभाविक जीवन के लिए
शक्तिशाली प्रवाह में
तिनके की तरह बहना
सागर विलय का असार समझ
बहती धारा में
विलय का दर्द सहीद होने की
संभव है  अमरता दे जाय
यदि धारा गति का अंदाज
चिंतन का दायरा
जीवन मे भर दे
अमरत्व कही ओर नही
शक्तिशाली धारा का मनोविज्ञान
समझ अभिव्यक्ति देना ही
जीवित  अमरत्व है ।
छगनलाल गर्ग ।


इर्ष्या तुम्हारी ।

चर्मकार खाल उतारता
मरे हुए पशुओं की
जान लेवा दुर्गंध से भरता जाता
श्वास जिन्दगी की
रात दिन वही रहता
हिफाजत करता
कुत्तों जंगली जानवरों से
उसी के बच्चे
पढते  अभावों मे सरकारी स्कूल
विभिन्न घृणित उपेक्षाओ में
हर ओर से झेलते
नफरत के तीर
स्वर्णों की हंसी ठिठोली बीच
होती पढाई इनकी
ऐसे माहौल में भी
मुकाबले में आने लगे कथित
गंदे लोग
ओर देने लगे टक्कर
प्राइवेट स्कूल में पढते स्वर्ण रईस को
संविधान के तहत
उनकी हक का अनुपात
नौकरी धंधे में
मिलता भी है तो नही मेहरबानी
किसी के हिस्से की
उनका हक  उन्हे मिले
यही नियत व साम्यता
मानवाधिकार की
सही प्रजातंत्र हम जीते है
हमे गर्व कि हम हिन्दूस्तानी है
अपरिपक्वता की
इर्ष्या घृणित तुम्हारी ।
छगनलाल गर्ग ।

Wednesday, February 24, 2016

अद्भुत प्याला ।

अदभुत ही ठीक
अन्य कथन नही होगा  ठीक
विस्मृत हुआ सा
अस्तित्व भी व्यक्तित्व भी
खो चुका स्वयं को
कोई नही लौटा सकता मुझे
स्वतः उठ जाते हैं कदम मेरे
उनके दीदार को
हालात मेरे नही है ठीक
शायद उनकी भी
उलझनों की आँधी से भटके है हम
नही भान देह का
एक छाया बन धूप का खेल
बन चूकी जिन्दगी हमारी
यह अल् भूत प्रेम प्याला
केवल एक घूँट
आह गजब निचौड जिन्दगी का
केवल  एक क्षण पाया
संसर्ग का
ओर उन्माद इतना गहरा
इतना रोचक रसिला
यह असफलता मी विरह की
रसमय स्पंदन देती
वाह रे प्रेम
तेरा यह अद्भुत प्याला ।
छगनलाल गर्ग ।

तुम्हें क्या कहूँ ।

तुम्हें क्या कहूँ
मानव आकार हो
परम भी निकृष्ट भी
विपुल दिव्य संभावनाओ से
भरपूर भी रिक्त भी
मानव तुम
अनंत शिखर भी
ओर अंधेरी गहरी खाई भी
पहचान करू भी कैसे
कि कहां हो तुम
एक तरफ तुम्हारा व्यापक
पसरा उजास
सूर्य सम रश्मियां बिखेरता
ओर दुसरी तरफ
खाई का मौत सा मौन सन्नाटा
तुम कहां हो इनमें
ऊपर नीचे
कहां ढूँढू तुम्हें जानूं मी कैसे
कभी तुम राम कभी रावण
असलियत कहो ना
क्या हो तुम
दानव भी मानव भी
फिर मानव नाम की छाप
साबित करो
मानवता की सुनो ना पुकार
बनो बुद्ध कि महावीर
नीचे मत उतरो
अंधेरे की अंतहीन गहराईयां
खा जायेगी तुम्हें
विक्षिप्त नही विमुक्त बनो
मेरे मानव आओं
हम साथ साथ  असीम को चलें।
छगनलाल गर्ग ।


Tuesday, February 23, 2016

प्रार्थना ।

कल सवेरे स्वीकार हुई
प्रार्थना मेरी
साँई राम के मंदिर में
नहीं प्रवेश करता हर दिन
शुक्रवार को छोड़
कल स्थापना दिवस पर
मंदिर के
हुआ था प्रविष्ट मंदिर में
ओर रूंघे गले से
बस इतना सा
भीतर को सुनाते कहा
बड़ी कृपा की
मेरे सद् गुरू
तू आया तो सही इस जगह
इस रूप में
माथा बहुत झूका दिया मैंने
दर्द की चुभती सी लहर
पैर से सिर तक की ऊभरी को
बर्दाश्त कर
दोनों हाथो से दंडवत हुआ था मैं
ओर प्रतिनिधि पुजारी ने
स्वीकार की थी प्रार्थना
शायद पहुँची होगी सांई तुझ तक
आज फिर आ पहुँचा
हमेशा की तरह
कल वाला पुजारी आज फुरसत मे
बाहर ले रहा
चाय की चुस्सकियां
ओर नितांत अकेले में
आज अवसर पाया आया हूँ साक्षात्
प्रमु मेरे स्वीकार करो ना
सीधे ही
मेरे सुख दुख ओर संसार के सुख की प्रार्थना भी
सुनते हो ना
सस्वर कहता हूँ आज
एकान्त पाकर ।
छगन लाल गर्ग ।


अनुग्रह ।

मुझे होने दो
अनुग्रहीत हर अपने के प्रति
भव्य बनने की सीख
देने मे जुटा रहा हर पल
शायद अपनी  असफलता
आक्रोशित हो ढूँढने लगी
अस्तित्व किसी  ओर का
जिसे वह कहता अपना
समझता ओर बनाना चाहता
अपनी अभिलाषाओ का बिम्ब
ओर करता जाता
हर अवरोध मे
भरपूर मददगार बन दीवार सी
पुख्तापन देता जाता मुझे
कि बन सकू एक ऊंची इमारत
जिस पर खडा रह सके
मेरा अपना
अपनी  ऊँचाई बता सके
मेरे कंधे चढकर
रूपांतरण चाहता हर कोई
मेरा अपना
ताकि असफलता का दंश
न दे सके जलन अवशेष जिन्दगी
पर मैं
अनुग्रहीत हूँ प्रत्येक के प्रति ।
छगनलाल गर्ग ।

रूग्ण चित।

  हाँ रूग्ण हूँ मैं
बहुत सी भाव भंगिमा
खूबसूरती की लुभाती मुझे
अनंत प्रेम का आवेग
लेता रहता आकार
अजनबीपन नही पाता सौंदर्य
धडकन नही पूछती कोई पहचान
ओर लब थरथराते कहना कुछ
शब्द  अंकुरित प्रेम से
आ ह भरता रह जाता
अंतर मेरा घना पीडित
जर्जर बना तलाश करता
सौंदर्य तेरी
कभी सुन्दर फूल
सुंदर कभी नदियां सुंदर देहें
कभी चांद तारे
हर सौंदर्य में खोया हूँ मैं
ओर बहुत गहरे
करता हूँ अहसास भी
नही हकीकत मे
हकदार मै
असलियत मैं यह सौन्दर्य
मात्र
परमात्मा हैं तेरा
तू ही बहु रूप लिए झलकता
विभिन्नता धारण किए
सत्य तलाशता
आज बन चुका हूँ मैं
रूग्ण चित ।
छगनलाल गर्ग ।


प्रयोजन ।

हर कार्य अपने कारण से
होता जाता सक्रिय
इसलिए कि
वह मकसद  पूर्णता ले सके
असत्य सत्य से नहीं होता
सक्रियता का संबंध
उसे मात्र चाहिए
अपना निष्कर्ष
कारण का प्रयोजन मात्र
संलग्न रहता
हर क्रियाओं मे
ओर प्राप्ति की हर राह
असत्य से भरी
नहीं हैं खतरा असत्य का
खतरा रहता
प्रयोजन प्राप्ति मे सत्य का
हर सत्य
मन वांछित प्रयोजन प्राप्ति मे
बनता हैं रुकावट
क्यों कि सत्य होता
निश्छल ओर स्वार्थ रहित
जबकि मानव प्रयोजन
केवल कामनाओ का
लंबा जाल
जिसमें लालसाओ का मोह
अनेको सच्चे प्रयोजन
असत्य की बलि चढ़ते
निरंतर
सत्य निखरे हो मानव के प्रयोजन ।
छगन लाल गर्ग ।


तुम जानो ।

मूल्यांकन होगा कैसे
समझ बिना
नही जानता मै भावों का स्पंदन
गहरापन रखता तो हूँ
पर विचारों का
तथ्यों को तर्कसंगत
अभिव्यक्ति देने में
विलक्षण हूँ मैं
पर अब हृदय का सच
नही जान पाता
क्या भावना की अभिव्यंजना
सत  असत
कहां जानता मैं
तुम मत दो मुझे पहचान
अपने होने की
कभी नही पाया अभी तक
जीया पर स्वयं की सुविधा मे
हर कार्य रहा मेरा मेरी गरज
अब छोडो भी
नही  आता मुझे
फैसला देना
सत  असत का
निर्णायक मै नही
ओरो को यह हक
किसी ओर से कहो
जो जीया दुसरो के लिए
शायद मिल जाये
हर बार मुझे तो मिलता रहा
अपमान  अपनो का
जिनके हित
जीया  आज तक
क्या करना क्या हो
मैं नही
तुम जानो ।
छगनलाल गर्ग ।

Monday, February 22, 2016

मूर्च्छा हैं जीवन ।

सच कहूँ जीवन मेरे
लंबे अनुभव के बाद
तुम लोभ वस रहे आजतक
तुम्हारा अस्तित्व
मेरे लिए मात्र इतना
कि तुम भरो रिक्तता
बाप दादो से रही खाली खाई
जूटो भरने मे
ओर जब जब भी तुम
आंशिक ही सही
प्रगति मे दिखे
खूब सराहा गया हैं तुम्हें
हर किसी के द्वारा
केवल तुम तुम्हारी आत्मा
खीचे खींचे उदास रहे
परिवार को नाज हैं तुम पर
कि हर आवश्यकता
तुम्हारे रहते होती हैं पूरी
अब तुम अकेले का संताप
नहीं रखता महत्व
तुम्हारी छांव तले
सपने पलने लगे हैं जीवन के
ओर तुम जूटे हो
पूरे मनोयोग से हर हालात मे
किसी भी तरह
लोभ आपूर्ति मे
अब थके हो शायद
भीतर झंकझोरता हैं तुम्हें
सामर्थ्य का भी अंतर आया
पर लालचा बढती निरंतर
यह मेरा लोभ कहां
अंतर्मन की हैं मूर्च्छा
कैसे कहते कि छोडता
नहीं होगा यह
गलत हैं भाषा छोडना
अब तो टूटना होगा तुम्हें
भीतर से
विचारों से भावों से
झांकना होगा
चेतना की गहराईयो में
मानव होने का अर्थ
यदि समय रहते मिल सके ।
छगन लाल गर्ग ।


करवट ।

वक्त की तरह
भावनाओं का पलटना
आम हुआ
अब नहीं होता विषाद का आलम
गहरा सदमा आने के बाद
नहीं करता संताप
पूर्व की तरह
अब आ गया समझ
अपने सामर्थ्य का सार
झूठी अकड  भी चलती रही
अब तक
शायद चलेगी आगे भी
पर अब समझ की शुरूआत बाद
नहीं लेता सहारा
झूठे ठाठ का
प्रकृति का झटका मात्र
कर जाता सारा अस्तित्व धूमिल
अब नहीं करता बकवास
फालतू बिना पहचान जाने
नहीं लगता अच्छा
अंधेरे का जीवन
भावनाओं की सत्यता केवल
यथार्थ जीने मे
फालतू बकवास का दौर
अब ले चूका करवट
अच्छा हैं अब
लगता जीवन  जीने लगा हूँ ।
छगन लाल गर्ग ।

Sunday, February 21, 2016

बूझे चिराग।

अब हर पल
होता जाता अहसास
चेतना मे
कि बुद्धि के चिराग मेरे
नहीं जले
भीतर पाता हूँ गहनतम अँधेरा
नहीं पढ पाता
जटिलतम ज्ञान से भरी
सार्थक पुस्तकें
जिनमें छिपे हैं अलौकिक
रोशनी के चिराग
कि दुर्लभ हैं कहीं ओर
किसी अन्य साहित्य मे
इतना पैनापन लिए
विस्तृत सत्य शात्विकता लिए
ज्ञान का भंडार
सुनता हूँ ज्ञानियों से
पर प्रयास सारे
पाता हूँ निष्फल
बहुत कोशिश करता हूँ
बूझे रोशन चिरागो को
पुनः जलाना
पर नहीं पाता बाती भी
ओर ग्रंथों मे छिपी
चेतना को भी
मूर्दे हो चूके चिराग
स्तुति पूजा के बल से भी
नहीं जलते
बूझ चूके हैं चेतना के चिराग ।
छगन लाल गर्ग ।

ठीक ढंग ।

हाँ निरंतर व्यतीत होता
हर पल देता आकार
स्वयं को
कि बेहतर हो सके जिन्दगी
सिखता हूँ जीना
जिन्दगी का ठीक ढंग
नहीं पाया समझ
अभी तक
यह ढंग जिसे कहा जाय
यह अटल ठीक
क्या कहूँ समझ का
नहीं निखरी कि बखान हो
मिले भी बिछुडे भी
अच्छे बुरे कहाये व्यक्तियों से
कभी हुए प्रभावित
खिंचते चले स्वयं को
उनकी तरफ
भौथरा जाती चमक
जैसे ही जाते पास
नहीं पाया अच्छेपन का रस
ओर जिसमें होती बुराई
होते रहे विकर्षित
बिना खिंचे
दुर दुर से पायी नीरसता
कहां पकड आया सत्य
जीवन का
दोनों ही तरफ का
आकर्षण विकर्षण
नहीं दे पाया जीवन जीने का
ठीक ढंग
शायद नहीं मिला
इतिहास प्रसिद्ध नायक
नायिका से
असली कामयाब जिन्दगी
का हुनर
ओर नहीं संभव भी
स्वयं को जीये
जब सीख लूँगा
स्वयं से स्वयं का जीना
वहीं होगा शायद
जीवन जीने का
ठीक ढंग ।
छगन लाल गर्ग ।


Saturday, February 20, 2016

तुम हो।

मेरे नसीब
हर पल रहते मेरे साथ
देते जीवन का अहसास
करवाते रहते
मेरी औकात का आभास
कि नहीं रहते हम
मैले कुलेसों गरीबी से सने
गंदे लोगों के साथ
हां कभी कभार
भूलवस कर लेते हैं नादानी
अनभिज्ञ बन
देते हैं केवल एक अवसर
कि उठा सके लाभ
हमारा यदि सचेत रहे
ओर फिर
लगातार करते हैं साथ
अमीरों का
वास्तविक हकदार
नसीब का
गरीब नहीं अमीर ही
सारी व्यवस्थाओ का चक्र
अंतोत्वगत्वा
पहुँचता अमीरों के नसीब
नहीं हैं औकात तुम्हारी
नसीब लायक
अब स्वीकारना ही सत्य
नसीब नहीं तुम्हारे
गरीब तुम हो ।
छगन लाल गर्ग ।

Friday, February 19, 2016

कौन हमारा।

बदल रहा हर पल
नित नये मापदंड लेकर
संस्कार पर होने लगे अब तर्क
विशुद्धता के बदलते जाते पैमाने
नाते रिश्ते ले रहे नव युग बोध
खंखाले जाते रिश्तों की गहराई
आंकनी होती आवश्यकता
ओर सामाजिक जरूरत पर
गहरी संवेदना
फिजूल के नही रहे रिश्ते अब
घनिष्ठ रिश्ते भी लेते आकार
मतलब के मापक पर
कांपने लगे है मजबूत घनिष्ठ रिश्ते भी
घनी हवा में कांपते वृक्ष के पत्तो की तरह
निर्भर नही गहराई पर रिश्ते
नही खुद रखते अपनी पकड
धन दौलत ओर सुख पर निर्भर
बूरे वक्त की तरह
बदलाव लाते
पत्नी का तलाक
सुपुत्र का कुपुत्र होना
ओर शत्रुता की सीमा लांघना
नये युग का प्रगति मय तोहफा
अब यह जीवन
नही पाता कही रिश्तों का विश्वास
सब कुछ होते भी
नही करता विश्वास अब
कौन हमारा ।
छगनलाल गर्ग ।


Thursday, February 18, 2016

हृदय उद्गार।

मत रोको मुझे
कहने दो यह भीतरी राग
आने दो बाहर
बन जाने दो शब्द
चेतनमय प्राणों के नाद
समझ लोगें
सच समाया अंतरतम का
लेने दो इसको स्वर आकार
ठीक रहेगा
सचेत हुए राग स्वर चेतन मे समाये
संगीत मय समा बने
राग लय का विपुल उठाव
झंकृत हुआ
करता जाता अपना विस्तार
स्थूल बना
पहचान देता अति सूक्ष्म की
जहाँ राग तंत्री जुडती जाती
हृदय तंत्री से
सुनते हो अबोध राग
अलौकिक
यही देगा पहचान तुम्हारी
चेतन बन
अचेतन यात्रा की
मेरे चित करो ना
अपना अर्पण
जिसे कह सको अपना
अवसर दुर्लभ पाया
करो ना हृदय
अपने भीतरी स्वरों का
राग उद्गार ।
छगन लाल गर्ग ।

प्रकृति की छाया ।

जुडाव ही तो
चाह हैं
मेरी इस जीवन
प्रकृति तेरी
नहीं रख पाता दुराव
हर पल हर क्षण समन्वय
चाहता तुझसे
कि परिपूर्णता पा सकूँ
निमग्न नहीं घूलनशील हूँ
मिट जाना चाहता
प्रकृति तेरे हर कण मे
गुम होना चाहता
समूचा देह मन प्राण
केवल तुझमे
पोछना चाहता
परत दर परत जमा
मेरे भीतर गहन अहंकार
संवेदना दो मुझे
मेरे सागर मेरे पर्वत
मेरी नदियों
खुली ऑखों देखता
विराट प्राकृत दृश्य
पहचान लो मुझे
मैं तुम्हारा अंश
सागर नदियों की बूँद
पर्वतों का अंश भी
निर्झर भी
नहीं कहीं विलग अस्तित्व
मिटने दो मुझे
विलय हो जाने दो
तुम्हारा ही अमूर्त आकार
प्रकृति की छाया ।
छगन लाल गर्ग ।


Wednesday, February 17, 2016

चले वापस ।

बहुत सुन चुके
यह जरूरतो का सिलसिला
कब रूकता
नहीं सुना हमने
अधिक भार बढता तुलना से
तुम नहीं थक सकते
हृदय से कभी
कि कुछ पाया भी जीवन मे
हर संघर्ष मे
पाया अनपाया महसूस होता
जब देखते ओरो की ओरो की तरफ
यह विडंबना केवल मेरी नहीं
हर व्यक्ति की आशा से जुड़ी
अधिक की पिपाशा
नहीं लेने देती
पाये का सुख
अधिक द्रवित हुआ जाता
मेरी अपनी ही दशा से
कि देखो पाया भी नहीं रहा मेरा
आज
मैं हारा हुआ नितांत असफल
जिन्दगी
दौडता रहा जिंदगी भर
कि भर जाऊं पूरा
अपार दौलत
कुछ हुआ पर पूरा कहां
मैं असफल हूँ जिन्दगी तुझसे
अब नहीं चाहता जीना
अब मेरे दिल
छोड़ो ना यह अतृप्त जीवन
निस्सार हैं यह दुनिया
नहीं कोई सार्थक संग्रह
राममय होने ही चित मेरे
चले वापस ।
छगन लाल गर्ग।




Tuesday, February 16, 2016

अंन्तराल हैं जीवन ।

बड़ा फासला हैं
स्वयं का स्वयं से
बदलते वक्त के साथ
संपूर्ण अस्तित्व लिए
बदल जाता हूँ मैं
हर पल मे वहीं नही
जो क्षण भर पहले रहा
स्मृति का सच
अपनापन देता
पर तनिक दुराव के साथ
नहीं हैं अब वह अस्तित्व का हिस्सा
था एक अतीत
जीया भुगता ओर गया
जीवंत नहीं अब
केवल स्मरण का दौहराना
जीवन नहीं
अंतराल हुआ जाता जीवन
आज व कल की दूरियो वस
नहीं हूँ मैं वहीं व्यक्ति
जो कल था
आया हैं बदलाव मुझमें
भीतर का भी बाहर का भी
भावना व विचारों मे भी
कल कि सोच
आज की सोच से नहीं खाती मैल
नहीं दोहराया जा सकता मुझे
नित रहता हूँ बदलता मैं
जीवन की स्वतंत्रता देती जाती
व्यक्ति को
जीवन का अंतराल असंगतता ।
छगन लाल गर्ग ।


Monday, February 15, 2016

तुम्हारा आगमन।

विभोर होता हूँ मैं
जब सुनता
तुम आने वाले हो
खिल उठता मन विगत की स्मृति से
हर पल हो उठता जीवंत
तुम्हारे न होते भी
भावनाओं घेर लेती मुझे
बाढ़ बनकर
आह जीवन का असलीपन केवल तुम
तुम्हारा संसर्ग मात्र
कितना मादक कितना मदहोश करता
हमारा सामिप्य
अब आ ही रहे हो तो
सजा लूं थोड़ा मन मेरा
कर लूं आत्मसात जीवन का अकेलापन
देखो यह आना जाना
जीवन का शाश्वत सत्य
पहचान कर तो लूं अपनी
कि यह मिलना देता सामिप्य का सुख
जिसमें सत्य आधा अधूरा
कच्चापन भावनाओ का मात्र
राग हृदय तंत्री के एकमेव हो सके
यह करो कुछ मेरे मित
कि तन सामिप्य से ज्यादा
मन का तारतम्य न टूटे
जन्म जन्मो तक
करो ना कच्चे जीवन का कुछ
पक्का बन्धोवस्त
क्या अबकी बार
मेरी भाॅति करोगे ना तैयारी
मना मत करना
तुम्हारा आगमन इस बार
पुर्नरागमन ना हो
यह क्या बार बार का अलगाव
एकत्व प्रेम का विरोधी ना बन जाय
समझते  हो ना मितवा मेरे ।
छगन लाल गर्ग।

धूंधली सांझ।

संध्या का पीलापन
पीडीत हुआ जाता आसमान
चमकता नूर अब लेता जाता
कुछ पीला कुछ श्याम छितकबरा रंग
ओर शनैः शनैः
संध्या का विस्तार फैलता
हो रहा हर प्रकृति का परमाणु कालेपन का शिकार
मेरे कक्ष मे बाहर से अधिक
भरता जाता धुंधलका
शायद कम पाया हूँ समता
कि रख पाऊं रश्मि ऊर्जा
अपने भीतर
चलो आने को आतुर अंधकार
आने दो
शायद यह भी जरूरत हैं मेरी
प्रकृति की तरह
हर रजनी का अस्तित्व स्वीकारती
मिलती घूलती संपूर्ण अस्तित्व
ओर पाती उसी से उसी का विनाश
सूत्र सारवान
कि पुनः हो सके सूर्य का उदय
नये सुख का प्रभात
तानाबाना निर्मित करती जाती प्रकृति
रजनी के गहन भयंकर अंधकार मे
ठीक मिलती जाती सीख
प्रकृति प्रदत
घने रजनी सम दुख मे ही विकसता जाता
सुख जीवन का नवल प्रभात
आओ संध्या स्वागत तुम्हारा ।
छगन लाल गर्ग ।

सुविधा का रस।

बड़ा आनन्दवर्धक सुविधा से प्राप्त
हर परिणाम बिना मेहनत से पाया
अच्छा भी लगता आनन्द भी देता
नहीं करता मन फिर
परिणाम की परवाह
सोचता रहता स्वयं करने से अच्छा
आजकल हर जगह
हर प्रकार की सुविधाओ के बड़े बड़े
लगे रहते  हैं पोस्टर
करने को तत्पर हमारे लिए
सुविधाओं का इन्तजाम
फिर जो चाहे जिस क्षेत्र मे
अपना आकार अपना वर्चस्व बढाना
थोड़ी सी तिकडम से
थोड़ी मिली बाजारू ताम झाम की सुविधा से
क्यों ना हम फहराये
अपना परशम
ओर यही बस यही
चल रहा काव्य मे भी
शब्दों के साथ भावों की जगह
पिरोते हैं किमती हीरो से जज्बाती शब्द
जबकि अहमियत उनकी न अंकुरण मे देखी
न आज की कविता के शब्द श्रृंगार मे
केवल शब्द नहीं दे पाते भाव
कितने ही किमती क्यों ना हो
जब तक कि
उदगम ना हुआ हो हृदय से
बाजार के शब्द करते हैं  आकर्षित
पर भीतर भाव को
स्पंदन देकर नहीं देते संवेदना
यही कारण की सुविधा का रस
नहीं भाता
केवल चमक ही देता आत्मसुख नहीं ।
छगन लाल गर्ग।

Sunday, February 14, 2016

रागिनी तुम ।

यह जीवन पल पल मे
अंगार सा ज्वलन देता
तब हृदय तडप बढती घनी रे
जब तन मन अतिशय जलते रोते
स्वर चेतन मय रागिनी बनकर
पवन संग मिल ऑधी बनकर
मेरी चेतना आती हो
 तभी तुम ठंडक बनकर
घेरती रहती अस्तित्व समूचा
राहत के हिमकण उष्मा बन जाते
मीठी अद्भुत प्रेम मदिरा पीलाकर
मस्त नींद बन आगोश भर लेती
अचेतन मन मे चेतन बनकर
गिरते जीवन मे संबल बनकर
बनती हो मधुरतम लहर सी
नवल रसमयी तरंगों जैसी
अरमानो के पंख बनी सी
पसरी मेरे जीवन ऑगन
ओ आशा की चिन्गारी तुम
मेरे जीवन की हो रागिनी तुम ।
छगन लाल गर्ग।

छूटता मुल्लमा ।

अब चिन्ता तो रहेगी ही
चमकदार परत हटने से
खूब हुआ तिलस्म
आकर्षित करता रहा दुनिया
आवरण की परत से
अब नहीं देती चमक
तो लगता सत्य
शायद धूधला गया
नहीं यह कैसे संभव
सत्य का अस्तित्व
घीसते घीसते परिपक्व बनता
अधिक उजास भरता जीवन
नहीं था सत्य यह
एक मुल्लमा परत चमक की
अधिक घीसते रहे
हुई फीकी
खो चुकी अपनी चमक
सामर्थ्य था उतनी दी चमक
अब नहीं रही चमक
नये मुल्लमो का बाजार
नित बढता
ऐसे मे हर समझदार
खरीद लाता बाजार से नित
नये चमकिले मुल्लमे
हर इन्सान दिखता मुल्लमा पहना
मुखोटो का यह सच
हो उठा आखिर सच
युग का
जहां असली चमक भी
ओर असली असलियत जीना
हो चुका जान लेवा
जब कभी भी चाहता
असलियत बताना
मुल्लमा ओर पकडता मुझे
जीने की गरज
ओर मैं
हताशा मे बेपरवाह हटाने लगा हूँ
अपना मुखौटा
ओर ऐसे मैं स्वयं खिचकता मेरा
छूटता मुल्लमा ।
छगन लाल गर्ग ।


सोचता हूँ तुम्हें ।

 अब नही केवल आशक्त मोह से
कि निहारू तुम्हें अपलक
असीम सौन्दर्य भरा भरा
उठता उठाव का नशा
नहीं लेता अंगडाई
नहीं कहता कि शिथिल हुआ प्रेम
या उसका उन्माद
नहीं बात यह कतई नहीं
बात अब बढ़ चुकी आगे
सौन्दर्य की शात्विक चमक पाने
हुआ हैं  कई बार
केवल रसागार डूबते डूबते
बस बस जाता हूँ
अधमरा हुआ इस रूप सागर
नहीं पाता पूर्णता
अधूरा पड जाता हूँ हर बार
तुम्हारे होते
समूचे सौन्दर्य के होते भी
नहीं मिल पाता चैन
तृष्णा को
 यह सुख का आना जाना
चुनौती बना हैं तुम्हारा रूप
तुम्हारा सौन्दर्य
अब नहीं आता काम
केवल निहारना ओर मोहासक्त होना
अब सोचता हूँ तुम्हें ।
छगन लाल गर्ग।


दर्द देते हो ।

  बार बार प्रिय
अवचेतन मे
समा चुकते
हलचल करते
भाव जगत मे
मेरे बुलाये सुनते कहां तुम
बुलाते बुलाते फिर छुप जाते
हृदय शिराओ के
रक्त प्रवाह मे
अंश तुम्हारी त्वरा ऊर्जा के
चूभते ठहरते
अवरुद्ध हृदय को हर पल
कर देते हो
शापमय जीवन
नित जलता
निष्ठुर स्नेह का
जाप जपता
प्राण हर पल
तुम्हें ही गाता
चेतनामय
राग नित रोता
आओ ना मेरे प्राण रागमय
नहीं संभलता जीवन अब तो
हृदय जलन की ज्वाला घनी रे
आओ मिल कर तपन मे
स्नान ही कर ले
न जिस्म का झंझट
न प्राणो का रोना
पावनता मे दर्द भीगो दे
फिर ना कहूँ मैं
ना तुम भी कहोगे
दर्द देते हो ।
छगन लाल गर्ग ।



अंतिम पराजय।

हाँ शायद यही तक
खिंचाव आवेग सघनता भूला
मर्म अवबोध का राज पाया
फिर वहीं आकार प्रकार
संभावनाओं के तलाशने होंगे
जीवन कहां रूका
शिथिल अवस्था कब जानी
गति का आवेग मंथरता मे बदला
पर राह अधिक सुगम
उजाले लिए
बुलाती रही लुभाती रही
कदम कब रूके कि रूकेगे अब
हर हताशा हर पराजय
मिल बैठ कर लेते सामजस्य
कि मिट मिट जाते हर असत्य
निखरती सार्वजनिक राहे
उजास लिए भीतर का
ओर अबका राही नहीं रहता अज्ञात
राहो का
अनुभव का मर्म अंतिम पराजय का सच
देता रहता दिशा बोध
हर पराजय का सार
नवीन बोध का आगमन
ओर जीवन का  शुद्ध संश्लेषण हैं ।
छगन लाल गर्ग।

Saturday, February 13, 2016

मेरा ज्ञान ।

आज मैं महसूस करता
स्वयं को भरा भरा
हर दिन निरंतर पढता जाता
नवीनतम हर ज्ञान की पुस्तकें
हर पृष्ठ का लिखा कंठस्थ हो चुका
नहीं अब कहीं चूक
हर पृष्ठ दे चुका समर्पण मुझे
ओर यह केवल एक क्षेत्र नहीं
हर ओर का ज्ञान विस्तार
सिमटा समाया है मुझमें
बहुत भर गया इस ज्ञान से
मेरी चाल मेरा व्यवहार
अब नहीं रहा मेरा
मैं जानता हूँ अतिशय अहंकार
समा गया मुझमें
उठ रहा हूँ बहुत ऊँचा
सामान्य नहीं अब मैं
अनवरत अध्ययन से हुआ हूँ शास्त्री
बड़ा भेद हो चुका
मानव की निम्नता से
अमरत्व की यात्रा का ज्ञान भरा हैं मुझमें
क्रिया कर्म जानता भी
पर दिक्कत फसा हूँ
मानव हुए बिना कि ऊँचाई
नहीं देती रास्ता
अनंत का ।
छगन लाल गर्ग।

मौत की तरह।

आये तो सही
ओमेरे परमात्मा तुम रूप बदलकर
अब की बार
मौत की तरह
ओर मैं पहचान गया मेरे प्रभु
कि तुम मेरे मोह पर
कठोर आघात करते
मेरे प्रिय पुत्र के प्राण
मौत बनकर ले गये
ओर देखो मुझे
मेरे प्रभु नहीं करता शिकायत तुमसे
मैं अनंत की कृपा से
सहमत हूँ मेरे प्रभु
तेरा था तुझे अर्पित
मैं बीच का व्यक्ति
कौन होता जो दावा करता
मैं धोखा खा गया
मेरे प्रभु उसे अपना जाना
वह ओर मैं
तेरे ही तो हैं अंश
तू आया तो सही मेरे घर मेरे प्रभु
मौत बनकर
अच्छा हुआ पहचान लिया
धोखा नहीं खाया
मैं राजी हूँ मेरे स्वामी
तेरी खुशी ही मेरी संपदा
अहो मेरे भाग्य
मेरे ईश्वर आये मौत की तरह
मुझे लायक समझा
मेरे घर पदचिन्ह पड़े
तुम आये तो सही
चाहे संकट बनकर भी
फिर फिर नमन मेरे प्रभु ।
छगन लाल गर्ग ।

पढ़ो प्रकृति को ।

एकाग्रता से विमोहित यह जीवन
चाहत लिए अदृश्य को देखना
भटकाव मे बीतता जाता
ओर निरन्तर खोजने लगता हूँ
गहनतम विचारों के जनक
मानव जीवन के मीमाशंक विद्वान
ओर उनकी रचित रचनाएँ
नहीं पाता तुष्टि या कि तृप्ति
विचार लगते ऊबाऊ
बेअर्थ मृत निष्प्राण
नहीं है उष्मा की तपीस
कि जीवन के विचारों को पीघला सके
दे सके आकार जीवन को
नहीं नहीं
छलावा हैं पुस्तकें ज्ञान भरी
कुछ भी नही जीवन दायी
तलाश करनी बाकी रही
अभी तक
शास्त्र ज्ञान दुर्गंध से भरा हैं
पढना होगा गगन
शून्य घीरा अनंत वहीं शास्त्र
वहीं मंत्र
शास्त्रों के शब्द खुद भ्रान्त हैं
भटकाव ओर पागलपन का संमिश्रण
नहीं रहस्यमय विराट का
कोई संकेत
कोई कतरा कोई चमक कहीं चिन्गारी की झलक
नहीं नहीं कुछ भी नहीं
केवल भ्रम सागर मे डूबना
कुछ भी नहीं
इस सब के अतिरिक्त
छेद वाली नाव हैं शास्त्र
काफी हैं अस्तित्व डूबोने मे सहायक
समझना होगा
अस्तित्व का बनना मिटना
जन्म ओर मृत्यु
वहीं कहीं छीपा हैं सार पढने लायक
या कि अमृत का द्वार ।
छगन लाल गर्ग ।

लंबा रहा सपना।

  अनिश्चय के घेरे मे बंधा
स्पंदन अहसास भरता धैर्य
देता आश्वासन
कि जीवंत हो तुम
लक्षण देते साक्षी जिन्दे हो तुम
ओर समझता रहता
देह की क्रियाशील दशा
अनवरत कार्य करते
स्व विवेक कहां
भीड़ का हिस्सा बना
वहीं करता जाता जो कहते करते
अंधबेहोशी का क्रियाकलाप
जागृति यदि यही तो जागा हुआ
ईश्वरीय कृपा का एहसास करता
अन्यो की भान्ति जीता रहा जिन्दगी
आज से पच्चीस वर्ष पूर्व
कहां थे तुम
तुम्हारे ना होने से क्या शिकवा रहा
मुझे मेरी जिन्दगी से
नहीं शायद नहीं
पच्चीस साल तुम रहे
मेरे अपने बने
अंश बने देह के
एक पच्चीस साल का लंबोतरा सपना
देखा भुगता सुख मिला
अब नही हो तुम चेतन मे
चल दिये विवश रहते
अचेतन मे मिलते तो हो
यह क्या कम हैं
असलियत तो हैं अचेतन ही
चेतन तो मात्र भ्रम
जिसे असलियत समझे
कहने लगे जिन्दगी
नहीं हैं जिन्दगी यह
केवल लंबापन लिए एक सपना
जो टूटना ही हैं एक दिन ।
छगन लाल गर्ग।


Friday, February 12, 2016

खोजो तो ।

असीम अभिलाषाओ का ताप
बहुत जलाता
मिलता तनिक हर्ष भी
बदल जाता चिंता पल
अनपायी अभिलाषा हावी बनती
रोकती चूसने लगती
खुशी का हर लम्हा
नहीं पाता कहीं छाया कि रूकू
ले सकूँ विश्राम
अधिक त्वरा लिए
बढता हूँ पाने हर कदम
मजबूत इरादों सने
स्थिर व निर्णायक शक्ति लिए
अब नहीं आता भ्रम का अंधकार
अनवेषण की दृष्टि
अधिक पैनापन लिए बढ़ती जाती
अब नहीं अभिलाषाओ का मोह
सामर्थ्य का परिणाम
केवल मेरा
नहीं छीन पायेगा कोई ओर
खोज निरंतर सत्य की
ताउम्र होने दो ।
छगन लाल गर्ग ।


संबंधित नहीं क्षमता ।

मिथ्या का सत्य
प्रगाढ़ आत्मसात किये
व्यतीत करता हर क्षण अमूल्य
जीवन के
ज्ञान विज्ञान के शास्त्रो को समझा परखा
मान लिया जीवन
ओर अंगीकृत किये जीता हूँ
जिन्दगी तुझे
जबकि नहीं हैं अनिवार्य संबंध
जीवन की सच्चाईयो से
धन ज्ञान यौवन पद
अवस्था के पल
आये कि गये
दी प्रसन्नता भी संग आई गई
क्षमता भी समय से आबद्ध
ओर यह गरूर
एक बार का प्रवेश उसका
जाने पर भी भ्रमित करता
मिथ्या मोह मे
गुजारने को विवश होता जीवन
नहीं सत्य आया गया नहीं
स्थित प्रज्ञा हैं
अलाप क्षमता का
रूग्ण जीवन का संकेत हैं ।
छगन लाल गर्ग ।

खाली हाथ ।

तमाम जिन्दगी का सम्हाला
अनुभव भी ज्ञान भी
भर भरा कर बन गया अति विकट
जीवन को देता जाता आयाम
कभी रहस्यमय बनाता
कभी संघर्ष मय
हर भावना ओर सिद्धांत आरोपित करता
जीवन को समझता भी
अन्य जिज्ञाशाओ को समझाता भी
ऊपर ऊपर देता हूँ अर्थ
जीवन को
अपने ज्ञान की पूर्ण ऊर्जा के साथ
नहीं हुआ तनिक भी खाली
अपनी विद्वता से
पर जब कभी निहारने लगता हूँ
चाँदनी रात
महक भरी हवाऐ
घूला घूला आसमान
बहुत भाता उसके खालीपन के कारण
नीरह पावन स्वच्छ साफ सत्य
नहीं कही बोझ
विचार व भावों भरा
उन्मत स्वच्छन्द विराट विशाल अस्तित्व लिए
आह विस्मृति घेरती मुझे
न विचार बचता
न भाव बचता
हो जाता हूँ मैं खाली
हाँ खाली हाथ
उसी रूप गढ जाता
जिस रूप मे भेजा परम ने मुझे
यही पाता हूँ सार जीवन
खालीपन ही मूल सार
अंतिम सत्य जीवन का।
छगन लाल गर्ग ।

Thursday, February 11, 2016

मोह ।

बंध जाता जीवन
एक अहसास मे
अपनत्व पाता परिवेश का मोह
अति सम्पर्क का नहीं आगाज
कि बने रहे साथ साथ
अदृश्य रिस्ता लेता जन्म
भावों का घनत्व अणु संग बिखरता
पाता ठावस अपनत्व के भाव
लगते स्वयं के जीवन अंश
बहुत गहन हो जाता जुड़ाव
तन मन का यह एकरस लगाव
बन जाता ऑखो का तारा
अति रमणीय मन भावन
यह मोह का असीम रूप
बन उभरता शात्विक
तो बन जाता नेह
असीम की देने लगता झलक ससीम जीवन मे
प्रथम सौपान बन जाता मोह भी
पावन हृदय के साथ
जहाँ नहीं जन्म लेता स्वार्थ
उत्सर्ग होने की
परम अनुभूति लिए मिटना चाहता
दूसरों के हित
नहीं यहाँ संकीर्णता
विचारों ओर कर्मो मे
उत्सर्जन का भाव नहीं देता
संकीर्ण जीवन
नहीं कह पाता तब केवल मोह
अति शुद्ध  हुआ मोह ही
बनता निर्मल पावन परिमल स्नेह
ईश्वरीय अलौकिक नैसर्गिक रमणीय।
छगन लाल गर्ग।

अस्मिता का प्रश्न ।

यह जीवन असमझस का प्रवाह
विचारों ओर क्रियाओं की विसंगतियों से घीरा
समन्वय की गुन्जाईश तले
अपनत्व का अपूर्ण संचय जीता
नहीं कामयाब
कि सत्य का आग्रह अपना कहता
साबित करे जीवन की अस्मिता
कि लो यह रहा सत्य जीवन
जीओ इसे
पाओ सार जिन्दगी
नहीं ऐसे
हर व्यक्ति कहता अपना सत्य
जीया उसने अनुभूति मे पाया
वहीं रहा सत्य उसका
उसकी अपनी अस्मिता
उसी सत्य का सार पाती
अपने जीवन
नहीं करता आग्रह मेरी अनुभूति का
कि तुम असत्य जीये
ओर मैं सत्य
नहीं होगा यह ठीक पहचान
जीवन की
हर व्यक्ति की जिन्दगी पाती
अपनी समझ
ओर जीवन का असली अर्थ
सत्य का सार
केवल अनाग्रह
सभी की अस्मिता मे समाया
असली जीवन
ढूँढना नित्य बाकी
जीवन रहता पर सत्य सार नहीं ।
छगन लाल गर्ग।

समन्वय ।

जीवन नहीं अपनत्व की लकीर
कि चलता रहे अबाध गति
सरल सीधी रेखा
नहीं होती राह की कदम ना थके
मंजिल पहुँच तक
उबड खाबड रास्ते
ओर अनचाहे गर्त अंधेरे मे घेरते
हो जाता कठोर तनाव
जीवन मृत्यु बीच
चलता जाता संघर्ष का छाया
प्रति राह हर मंजिल तलाश मे
क्या यही मान चले
जीवन सत्य
जहाँ हताशा निराशा ओर उपेक्षा
नित विश्राम लेती जीवन की राह
नहीं पा सकता
जिन्दगी गुजारा का खर्चा
सपने अधर नहीं कहते
हृदय नहीं सुनते
अजीब सन्नाटा जीने लगा हूँ जिन्दगी तुझे
जिम्मेदार हूँ
अपनो का परिवार का ओर मित्रो का
सभी कामना करते
उतम राह पाऊ
चल पडू गति मय बाधाओं को चीरता
शायद यही विचार थे अबतक मेरे भी
पर अनुभव से पाया
सिखने को आया
हर बाधा संघर्ष नहीं मागती
चाहती है समन्वय
कि एकरसता हो विपरीत के साथ भी
सम विषम मिलकर
पूर्ण आकार पाती हैं जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग ।



बड्डपन ।

उम्र का गणित
यह करता हिदायत
रखो बड्डपन
बच्चे तुम्हारे होते
अगर नहीं लेते जिम्मेदारी तो
समझो तुम्हारा मान
तुम्हारे होते क्यों पड़े
भार तले
अभी से स्वच्छन्द रहने दो
घूमे फिरे मोज करें
संभालो तुम बडे हो
अब करोगे ही
किसी पराये का तो किया नहीं
भाई हैं तुम्हारे
कर्जा चुकाना फर्ज हैं बडे जो हो
देंगे तुम्हें भी
थके दिनों मे
सिखो इन्तजार करना भी
रखो बड्डपन ओर सहो
तुम्हारे अपने हैं आखिर
क्या फर्क पडता
यदि न भी करे पूरा वापस
आखिर तुम बड़े हो किस बात के
सीखो थोड़ा बड़े हो तो
बड्डपन भी ।
छगन लाल गर्ग।

वसीयत।

अच्छा रहा मरने से पहले
याद रहा
वसीयत लिखवाना
अब जिन्दगी का कमाया
आज तक बेहिसाब रहा
ऊपर ऊपर देखते देखते
लगने लगा
दोस्तों को कमाया जमा
कोई वसीयत लायक दिखता नहीं
पर हिसाब हो जाय
साफ साफ झगड़ा टंटा ना रहे
औलाद मे
चलो आज हो जाय बंटवारा
इकाई को तोड़ना बाँटना
अभी तक के अनुभव मे
आया नहीं
बुलाता हूँ आसपास के पंच समझदार
करते है हिस्सा
पूरा पूरा
मुझे व मेरे खाट को छोडकर
खाट मेहतर को
ओर तन मेरा अग्नि को
बाकी सब मेरी ऑखो के सामने
हो चुका बँटवारा
जिन्दा रहने तक
किसके हिस्से रहूँगा मैं
अनिर्णित छोडा गया हूँ
नहीं लायक
वसीयत की तरह ।
छगन लाल गर्ग।

Wednesday, February 10, 2016

वहम मोहब्बत ।


अच्छा लगता
जब सोचता हूँ तुम्हें
गुजरते वक्त का
 नहीं रहता माप
कब आया कि गया
ख्याल खोता
ख्वाब भाता तुम्हारा
एक अजीब शमा
बंधता निरंतर
तुम्हारी खुशबू देती
रूपमय बिम्ब तुम्हारा
कि मदहोशी जीता जाता
केवल  ख्यालो की दुनिया
देखते ही होता अधीर
पाने तुझे कि हमसफर बने
नहीं धुऑ पर उठता भीतर
ऑशंकाओ का धुऑ
खालिश मे अभी मोहब्बत का
दर्द आया कहां हैं
अनहोनी का दौर अभी बाकी
मोहब्बत अभी दर्द दौर
गुजरनी बाकी हैं
मैं ओर तू का भेद गहराया हैं
जिस्म से ज्यादा
दिल का इम्तहान अभी बाकी हैं
अब रहने दे इश्क के परवाने
अभी वहमे मोहब्बत
सुबह ओर शाम मेरा हर कदम
की ठावस बाकी हैं ।
छगन लाल गर्ग।

मत कहना।

आपदा लगातार आती
घेरती जाती
हर क्षेत्र नही रखती स्थान
कि टिक सके कही
कतरा भर लम्हा खुशी
बडी संपत्ति नही
केवल जीवन लायक
मानव कहला सकू
इसी आशा
जीता जाता जिन्दगी के कडवे दिन
कि पाऊँगा किनारा
खुशहाल जीवन का
पर आज तक नही हो पाया
कि कोई कहे
बस बहुत हुआ
खूब देखे दुर्दिन
अब आओ पाओ पुरूस्कार
कुछ प्रसाद स्वरूप
ओर लो स्वाद
चीख पाओ तो चीख लो
यह रही जिन्दगी का अमृत
खुशिया
कुछ कतरे है तुम्हारे भी
जीने लायक
कह सको खुद को मानव
प्रकृति की सम्पत्ति के भागीदार
नही  आ पाया  अवसर
सामर्थ्य वान मानव के रहते
नही हक
सामान्य का
उनकी भाति जीने का हक
नही पाया सामान्य जन ने
जानकारी नही तुम्हे
अपार शक्ति के धनी
आवाज जानते है
किसकी निकली हक चाहते
खतरनाक है
जीवन नही रहेगा फिर
भय का छाया
मंडराने लगेगा
कुछ मत कहना ।
छगनलाल गर्ग ।






समर्पण ।

यह सत्य कैसे कहूँ
की कोमल
सबल रहता
 स्वीकार नहीं होता
यह हैं तर्क सम्मत
कि व्यक्ति पनपता
अपने जीवट
अपनी प्रबल क्षमता
अपने सतत संघर्ष के बल
ओर पाता वर्चस्व
बच जाता
प्रकृति की मार से
अपनी हुनर अपनी दम पर
सबलतम जो ठहरा
बौद्धिकता की साक्षी
पुख्तापन देती विचार बनता
अधिक सत्य
पर नहीं
हृदय की बात यह
ठोस ढहता टूटता
कोमल बच जाता अपनी
सूक्ष्मता को लेकर
कोमल जीत जाता
जीवन की बाजी
समर्पित हैं प्रवृत्ति उसकी
निरंकार हैं वृति
जल सी गति
समर्पित जीवन सार हैं
यदि जीने मे
आ जाये ।
छगन लाल गर्ग।



अकारण ।

नहीं पता यथार्थ
क्यों जीता हूँ मैं
अभी तक सोचने की
जरूरत रही नहीं
सभी की तरह
जी लेता हूँ मैं
अपनी तरह अपनी दिनचर्या
नहीं आकार नहीं प्रकार
किसी योजना आयोजन का
बस सुबह देखता हूँ
प्रकाश फैलाते
रोशन होते दुनिया
मैं भी अंग बना दुनिया
जी लेता
जिज्ञाशा थी पहले
सहारा था दाने पानी का
माँ बाप का
सोचता था जान लूँगा कारण
जीवन का
ओर पा जाऊँगा सत्य जीने का
नहीं हो सका
तन परिवार की परवरिश
वक्त जाता रहा
ओर मैं रीतता रहा
अकारण
जीवन अबोध रहा
घटना घटती रही हर पल
देखता रहा
नहीं रहा वजह मैं
नहीं रहा मालिक अपना भी
कहां रहा नियंत्रण मेरा
जीवन मेरे पर
जीता ही जाता अबोध
जिन्दगी
अकारण तुझे ।
छगन लाल गर्ग।

क्षण बोध ।

हाँ अभी तो मौजूद हूँ
तुम्हारे बीच
सपनों का देता हूँ हवाला
जीने हैं आगत मे
जानते हो
आज हूँ तो कहता हूँ
तुम हो तो सुनते हो
अन्यथा सब जुटे हैं
सपने पाने मे
कि खुली ऑखो देखने मे
ठीक मेरी तरह
अब देखते हो सामने
फूल खिला
पते हरे फूल लाल
हवाऐ चलती
ओर देखो थोड़ी दूर
धूधले छाया लिऐ
सिर ऊँचा किये पहाड़
लगता हैं ध्यानस्थ हैं
अस्तित्व चिन्तन मे
मेरी तरह
सोच लेता हूँ इस पल
अभी तो हूँ
जेसे कि प्रकृति का यह चित्र
ओर महसूस करता
भीतर भीतर
जैसे समुद्र मे लहर तंरगित
हृदय मे धड़कन
ठीक वैसे ही
यह क्षण भी साक्षी
मेरे होने का
तुम्हारी तरह प्रकृति की तरह
ओर यह अस्तित्व
शायद हो ईश्वरीय ।
छगन लाल गर्ग ।

Tuesday, February 9, 2016

आत्म निवेदन

अब तक नहीं जान पाया
जीवन मेरे तुम कहां हो
कभी नहीं कर पाया
ओरो से अपनी तुलना
शायद सोचना ऐसा भी
जीवन का निर्बल पक्ष
कहीं ठहराव लायक जगह
नहीं पा सका
कि लू श्वास तनिक
उठाऊ नजरें ऊपर की ओर
ओर कर अपने अस्तित्व का मोल
नहीं आ पाये वे पल
मात्र दौड धूप
कि गूजार सकूँ परिवार की उम्मीदें
केवल सहज सामान्य
जिसकी कभी कोई
नहीं देखी गई
ऊँचाई या कि नीचाई
बस हर जगह
एक ही आचरण बिना आवरण
नमन समर्पण
यही सिखा यही जाना
जिन्दगी मेने तुमसे
ओर शायद ठीक हो
यही देता
अलौकिक की शिक्षा का कोष भी ।
छगन लाल गर्ग।

फासला ।

बहुत दूर निकल आया
अपनत्व की दुनिया से
नहीं देते बोध
आत्मीय संबंध जिसमें रहा घीरा
जीवन पर्यन्त
अर्पित किये जीवन के बहुमूल्य क्षण
भावनामय कर्ममय
हर क्षण ताप की ज्वलन झेलता
कारण लिऐ
कि अपनों को अर्पित कर सकूँ
खुशहाली भरा जीवन
ओर आज बहुत व्यतीत हो चुका
अपनो को पूर्ण करने मे
नहीं बचा पाया अस्मिता अपनी
पूर्णता पाये अपनो की कृपा से
टूटा पहिया बना
वक्त का
बहुत दूर आ गिरा हूँ
बेकाम अर्थ हीन
रंगीनियो की परसाईया भी
नहीं पहुँच पाती
यहाँ तक
लगता जाता विलिन होता अस्तित्व
बेसार मिटता सा
अब हो चूका
अनंत फासला
अपनो बीच
नापा नहीं जा सकता
हाँ महसूस करवाते
पास आते
आत्मीयता प्रदर्शन भी होता
पर वे केवल शरीर हैं
ओर शरीर बने आऐ
जितने पास आने का
करते हैं दावा
आत्मा से बढ़ता जाता
गहरा अंतराल
अनंत फासला ।
छगन लाल गर्ग।

Monday, February 8, 2016

बहने दो नीर।

उमडते अरमान
कुण्ठित हुए रोना चाहते
रोने दो
मत रोको ऑसूओ को
पीर घनी हुई
बहना चाहती मार्ग तलाशती
होने दो तलाश
स्वयं लेगी राह
आकार मत बनो तुम
पीडा की कसक
बाढ़ बनी बहाव चाहती
बनने दो
भीतर की गंदगी
स्वतः होने दो पावन
अनुठा अवसर हैं यह
पाक साफ होने का
खुद से खुद का
साक्षात्कार
हो जाने दो
रास्ते देते है जीवन को
पावन अमिट रसधार के
जो मिलती जाती
अनंत की ओर ।
छगन लाल गर्ग।

अनंत हैं द्वार ।

आँकाक्षाऐ नहीं होती बाधित
अनेक कठोर बाधाओ से भी
अस्तित्व का स्वप्न
 पनपने लगता नित नया
ज्ञान की ज्योति
बनती सेतु कि गुजरते रहे
जीवन भर
अगनित पड़े पदचिन्हो को मिटाते
अपने ज्ञान की नयी छाप नया निशा
नयी परिभाषा गढते
बढते जाते आँकाक्षाओ का भार लिए
बंद होते कहीं
कहीं खुलते दरवाजे
सोये भीतर को जगाते
बढ़ते रहते जिन्दगी जीने तुझे
कभी करते तैयारी ऊर्जा लिऐ
ओर कभी करते विसर्जन अहंकार
अज्ञात मे लगाने छलाँग की
अनंत हैं यह यात्रा
जीवन तेरी
अंत अतीत मे सुना नहीं
वर्तमान मे दिखता नही ।
छगन लाल गर्ग।


कोन हैं सहज ।

नव चेतन नव युग
अति प्रज्ञा अति प्रगति
मनुष्य से भी ऊँचा मनुष्य का ही अस्तित्व
कहता समझता युग
अति सभ्य अति विवेक मय
जीने लगा आधुनिक जीवन
आज का मनुष्य
जितना गया ऊँचा धरातल से
उससे अधिक
ईश्वरीय शक्ति का धनी
समझ बेठा स्वयं
नहीं आती नजर सामान्य दशा
जीता जिसको नित मरता जिन्दगी
आम व्यक्ति
आँकाक्षाओ का जरूरी बौझ लिऐ
गुजार देता
अनपायी तरसती उम्र
केवल सम्पन्नता की चाकरी मे
नहीं पाता धरातल मे
चलने  की ऊर्जा
ओर विवेकी जन ऊपरी युग बने
जीते रहो अलग दुनिया
असल कहूँ
बुरा तो मानोगे पर कहना तो होगा
भौतिक प्रगति का नशा
हमे नीचे ही ले जाता
नही ऊपर का मार्ग
केवल सहजता
हम न तुलनीय बन सकते
उस परम सता के
ओर न बने हैं
यह सता व्यर्थ गुणवत्ता से लिपटी
निस्सार हैं
मनुष्य की सहजता से वंचित
यह जीवन
न स्व अर्थ हैं न स्व धर्म हैं ।
छगन लाल गर्ग।

Sunday, February 7, 2016

नमन जीवन ।

बड़ी अहंमन्यता घीर चुका
नहीं जानता उपाय
आनन्द का गरिमामय सार
महसूस करता
जीने लगा हूँ मेरे जीवन तुम्हें
साथ हो ना मेरे
एक नया स्थान
तुम्हारी क्षमता से अधिक
सच बताओ
क्या नहीं करते अहसास
 मर्यादा तुम अपनी
बाकी सच कहूँ
नहीं लगता गुणों का कोई कतरा
समाया लगता तुम्हारे भीतर
अच्छा रहा
सद कुल ओर प्रतिष्ठित घर पाया
हीन योग्यता रहते
कहां से होता सबकुछ
चलो पुण्य पूर्व जन्म का
आधार बना
अब बनता हैं हक
कि झुके निर्बल निर्धन
बंधे रहे
समर्पित हुए बिना
उनके अधिकार का दावा
हमारे रहते
दम नहीं रखता
समर्पित जीवन मे ही
मुक्ति संभव हैं
जरूरत जीवन जीने की
यदि चाहे तो रखे
नमन जीवन ।
छगन लाल गर्ग।


जल उठी धूप ।

 वेदना ताप भीतर रस सोखता
शुष्क धरातल हृदय कर चूका
अब नहीं कहीं छाया
कि आद्रता मिले संतापो को
अधिक उघडे कसक पाये
रीसने लगे घाव
कि उष्मा का जमाव
जलाता जाता
नहीं रहा घावो मे भी पानी
कि कहे
रोता हूँ विरह वेदना के पानी
उठता धूऑ भीतर का
बाहर आया ओर वेदना पाता
धूप बाहरी घनी हो गयी
जलते अस्तित्व के साथ
लेता हूँ औट वृक्ष की
बाहरी छाया घनीभूत हुई
देती तन को शीतल समीर
पर अन्तर्मन की दशा
ओर बिगडती
अहसास पाता हूँ
मन उडना चाहता
आकाश मे उडते बादलों के साथ
मन विकार भी देखो ना
कितने हैं बेजोड़
ठीक इन उडते बादलों की तरह
गगन को घेरे हैं बादल
मन को घेरे हैं विकार
घना अंधेरा छलक आया
गगन मे
बादलों के रहते
उडते छंटते भी निरंतर
स्वच्छ होना होगा आकाश को
निर्मल पावन निष्पक्ष
मेरे हृदय के भीतर घूमडते
विकार हट सकेंगे
शायद
जरूरत पूर्व नियोजित
प्रकृति की संयोजन दशा
ओर विकार हटे कि
निश्छल पावन सुप्त स्नेह धारा की
कठोर शिला टूटी
विकार हुए शून्य
बह उठेगा फिर फिर
अवरुद्ध स्नेह स्त्रोत
बहना ही चाहता
तब अविरल आनन्द
इस जलती धूप भी ।
छगन लाल गर्ग।

Saturday, February 6, 2016

इन्सान हो क्या ।

हर बार उभरते प्रश्न को
मोडता हूँ कागज की तरह
आवाज देता नहीं थकता
मुडते वक्त
बताता जाता अपनी अहमियत
इंसानियत भरी
पर असलियत छुपते नही छुपती
अपनी पाशविकता की पहचान देता
दबा देता वह
हर दानवता की सच्चाई
जो जरूरी होती
मानव बना रहने मे सहायक
जब टटोलता हूँ स्व
विवेक ओर हृदय बीच
गहनता से घीर जाता हूँ
शास्त्र मन व कर्म मध्य
आत्मविश्वास डगमगाता जाता
विवेक ही जीवन बना
जी लेता हूँ
यह जीना नहीं
केवल समझदारी हैं
जीवन जीने की
ओर इसी समझ से पाता
हर्ष शौक ओर सुखो की वासना
मतलब का जीना ही
बन गयी सच्चाई
युग की
तभी प्रश्न गहराया संचय देता
इंसान हो क्या ।
छगन लाल गर्ग।

अहं सत्य ।

अहं सत्य
इतना सा कि नहीं हो
स्थित प्रज्ञ
भ्रम आवरण सा पुञ्ज
लिपट गया तन मन व विवेक
सहारा पाया चेतन का
स्वीकार लिया
असत्य भी सत्य मान
नहीं होता मानना सत्य
सत्य स्वयं प्रत्यक्ष रहता
सूर्य की तरह
पर शायद यह भी नहीं
त्यागनी होती प्रखरता
सूर्य को भी
बादलों से क्षणिक पर प्रकट
या अस्थाई
उदित होते ही जाडो मे
तीक्ष्ण ऊर्जा हो जाती
शिथिल लंबोतरी
नहीं शास्वता का कोई पदार्थ
जो रखता हो सामर्थ्य
सत्य होना भी
अदृश्य अहं
राग तत्व लिपटा मानव
बार बार
भरता झूठा दंभ
अहंकार
सर्वोच्च होने का
अपूर्णता झलकती अधूरेपन की
बेबाक दंभ जानना कहां चाहता
अपना असली रूप
मानव का यही अहं सत्य ।
छगन लाल गर्ग।


Friday, February 5, 2016

अद्भुत उर्मी।

  अब नहीं फूटती
आनंद की उर्मी
प्राण की गहरी उष्मा का
 अंश पाये
अब बदले बदले लगते
आनंद के छीटे
आधुनिक रंग रूप मे
हो चुके अधिक लुभावने
लोभ ओर मोह की चमक
हो उठी चमकिली
सभी शास्वत चमक फीकी सी
धूधली हो चूकी
अब नहीं तडप देता
अहंकार
ओर चोट नहीं पाता प्रेम
अब आत्मा हो चूकी रूग्ण
कि पा सके दर्द
मिलते हैं रूपक ओर शालीन
चंचल
देते रहते अलौकिक उन्माद
प्रेम का घनत्व
डूबता हूँ आकंठ
हिलोरे ही हिलोरे
घेरती असीम अचेतना आने तक
नव युग बोध का
नवल स्नेह बोध
प्रगति मय उपकरणों से
संस्कारित हुआ
देता अब मेरे जीवन मे
अद्भुत उर्मी ।
छगन लाल गर्ग ।

सुनो भी।

वाजिब हैं रूठना तुम्हारा
सच्चाई के पंख कतरे
मैने मजबूरी मैरी
नहीं दोष तुम्हारा
झूठा आत्म संतोष देता
 जीता रहा खुद
ओर तुम्हें देता रहा प्रवंचना
अजीब धारणाओं का साक्षी
अज्ञात आस लिए
क्षमताओ की गलती करता
पहुँचा यहाँ तक
नहीं सत्य कथन की तनिक भी
प्रमाणिकता कि दम रखू
ओर कहूँ तुमसे
कि यह छलवा नहीं
सच हैं सत्य का आधुनिक रूप
जहां रिस्ते नाते
लेते हैं गहराई मात्र
प्रदर्शन व सहयोग पृष्ठभूमि
की कृत्रिमता पर
तुम अगर यह कहो
कि प्रेम मेरा
छिछला गया कि कम हुआ
नहीं कहूँगा मैं
कि सच यह
सच मात्र इतना कि
नये परिवेश के शब्दों मे
चमक विद्युतिय आई हैं
ओर तुम्हारी ऑखो मे
रंगीन चश्मे नहीं पहने
अब अगर फिर भी
माफ ना करो
तुम्हारी मरजी पर
सच्चाई कहता उसे
सुनो तो।
छगन लाल गर्ग।





Thursday, February 4, 2016

मेरे अंतर।

मेरे अंतर
अब सहा नहीं जाता
विरह का जाल
घीर चूका अनंत
नित मिटता शून्य हुआ
अणु सार
मेरे अंतर तुम हो कहां
अवरुद्ध हैं कंठ
भीतर संचित नेह
जलन की ऊष्मा पाये
हुआ अधिक विरल
नहीं रहा शब्द
बन चुका धुऑ निराकार
निशब्द
मेरे अंतर कहां हो तुम
अतीत ही रहा
स्मृति बना
रागमय क्षण अब विराग बने
घने केशपाश अब
नहीं देते छाया
घूटन देते प्राण कसक बनते
संसर्ग पल रमणीय
नहीं करते मधु वर्षा
उमस देती तीर बनी
वर्षा की बौछार
चीरने लगी
हृदय मेरा
नहीं रे नहीं चेतना
विलय चाहती अंतर मेरे
केवल तुममे
आ जाओ अब
मेरे अंतर
भरो ना मेरी रिक्तता ।
छगन लाल गर्ग।

जटिल जरूरत ।

परमेश्वर दाता रहा
जगत अनुभूति से रहस्य जाना
नहीं देखा कभी
अपनी नजर उसे देते
दाता बनकर
कहते जाते घने विवेक विख्यात
ईश्वर अदृश्य बना
देता रहता सामर्थ्य शक्ति
कि हो सके जरूरत पूरी
ओर इसी राह
आती रहती परीक्षाऐ
देनी अनिवार्य
आगे कि जरूरत जिन्दगी जीने की
सफलता पाये
होगी आसान उपलब्धि पाने निमित्त
जीवन की जटिलता हैं परीक्षा
यही होता आकलन
व्यक्तित्व का
ज्ञान व चेतना का
सूझ व क्षमता का
यही प्रकटती हैं निष्पक्षता
मौनता के साथ
समूचा व्यक्तित्व लिए
यही हैं जीवन सूत्र
घना जटिल
जिसे समझते सुलझाते
कम पड जाती मानव की जिन्दगी
कहना पडेगा
समस्त जीवन हैं
एक जटिल परीक्षा
सफल परीक्षार्थी
नहीं आता फिर
मानव जन्म लेकर
परीक्षार्थी बनकर ।
छगन लाल गर्ग।

Wednesday, February 3, 2016

भ्रम तो टूटा।

अच्छा ही रहा
पाला भ्रम तो टूटा
जोडता रहा नित्य
नये सपने
शुरूआती दौर ही
कच्चापन लिए सत्य उकेरते
बिम्ब स्केच किये
तूलिका से निर्मित
रंग देना चाहता
मनभाते जीवन से निकले
तैयार  था मैं
पक्का करू जीवंतता ले
कि भीतर का
जंजाल शब्दों घीरा
तुनक मिजाजी जज्बा
करता जाता सत्य का भी
अतिक्रमण तूलिका का
सौम्य तूली
अतिक्रमण की कर्कशता से
हार जाती
ओर असली चित्र
आज भी नहीं पा सका
अपना असली अस्तित्व
करता हूँ प्रयास
यथार्थ उतरे केनवास पर
हो जाता हर प्रयास
असफल मेरा
नौक घीसी तूलिका
अब रोकता हूँ
अहंकार का अति
बिम्ब उभरना चाहता
मेरी तूलिका बार बार
बना भी तो
धोखा होगा
निश्छलता के साथ निर्अहंकार के साथ
अब हर कौशिश मेरी नहीं
सौम्यता की भी नहीं
अहंकार की होगी
यह बेमानी होगा
अब तक का सृजन
असलियत की शक्ल हैं
रहने दो उसे
बाहरी चमक खोने से
अधिक महत्वपूर्ण हैं
भीतर सत्य ना ढक जाऐ ।
छगन लाल गर्ग।

अच्छा हो।

आज की शिक्षा
करती नित्य प्रगति
विस्तार मात्र बेरोजगारी का
कि विराट होता जाता
प्रतिस्पर्धा का तूफान
नहीं संभले संभलता
नीति धारको से
अब यह समस्या नहीं
उभरा बन चूका रावणाकार
जहां मानवता मरती जाती
हर दिन
प्रतिस्पर्धा का रण
पहुँच चुका नये आयाम
अब नहीं रहा आसान
सामान्य जन का शिक्षित होना भी
ओर यदि पढ़ें भी तो
रोजगार नहीं आसान
राहे अति हूई कठोर
नही रहा आसान
शिक्षा ओल विचार
नहीं पाते प्रतिफलन का आकार
शास्वत प्रतिभा घीर चूकी
रंगीन तेजी से बरसते
कीमती कागज के टुकड़ों
भरे गूम्फन मे
अब नही मिलते
ज्ञान व प्रतिभा के पुजारी
अब सब गुण छीपे
सफेद कपडो की चालाकी मे
ओर प्रजातंत्र के विद्वान
लरजते हाथों
युवाओं के लिए
माँगते दुऑओ की भीख
सब्रधारी शिक्षित युवा
थके हारे मौन मूक
उबलती हसरतो के साथ
माँगता हैं हिस्सा
जिन्दगी जीने का
ओर समर्थ निर्णायक
आगे बढकर
अदा दिखाते पहेलु दर पहेलु बदलते
संलग्न हैं
घोषणाओ का पिटारा लिए
भ्रमित करते सीमाओं को
निर्धारित समय की
अच्छा हो
दोनों निकले देखे सत्य
सीधा रास्ता
समय के धारे पर चलता
कोई रास्ता तो
खोलना ही होगा
समय रहते ।
छगन लाल गर्ग।



Tuesday, February 2, 2016

बहने दो।

नहीं करूणालय तनिक जगह
अविरल घनत्व लहरों का प्रवाह
भरता रूग्णमय भव भंवर चाह
आह करूणा कसक नीर प्रवाह।
                   दयनीय जीवन गति हीन दशा भर
                   नमनीय हृदय व्यथा विचलित मार
                   अंतहीन चिन्तन विरह घीरा हैं भार
                   करणीय कर्म अब नहीं पाते आधार।
गगन गहन घटा घूमने लगी
तपन हृदय ताप बढने लगी
विरह पीघल नद  होने लगी
विचार बंध मे बान्धने लगी।
                   घिर गया हृदय अब विचार बादलों से
                    मिट रहा बोध अपनत्व आत्माज्ञान से
                    मत रोको सुकाल घनघोर अंधकार से
                   विरह राग विकल होकर बहता हृदय से।
रोकना मत तुम ऑसूओ को
व्याकुल हैं मत बान्धो इनको
भीतर के जमे कुडे करक्ट को
बहने दो ऑसू संग प्रवाह को।
                    ऑधी पीछे का आक्रोशित बरसात
                    ज्वलंत तपन बदलता होता प्रशान्त
                   ताजगी प्रकृति ले होती ग्राह्य स्नात
                    मत करना हृदय अब तनिक उत्पात।
विरह ऑसू गतिमान जब होते हैं
भीतर विरल ही सघनता पाता हैं
ऑसू नयन मग संकेत दर्द देते हैं
अदृश्य रसधार खबर भी देता हैं ।।
छगन लाल गर्ग।


सखा मेरे ।

सखा मेरे आनंद दो
अपनी ही मरजी मत रहो
हृदय के किनारे
कगार बने  मत रहो
बाहरी धुऑ कालिमा लिए
बढता भीतर
सखा मेरे रोको ना
करो ना तुम प्रवेश भीतर
ऑधी नहीं आनंद बनकर
ध्यान दो मेरी तरफ
थोड़ा सा ही
घूटता जाता दम धुएँ घीरा
सखा मेरे आनंद दो
अनुराग की माया भी
विरक्ति की छाया भी
महा आनंद का सागर भी
हिलोर विहीन
निश्चल चेतन मय हो
भूल भूलैया बनू अस्तित्व हीन
विसर जाय चेतन अहं भी
सखा मेरे
रसास्वादन दो।
छगन लाल गर्ग।

Monday, February 1, 2016

आत्मनिन्दा काल।

 अभिव्यक्ति का स्वर
 रास नहीं आता
विगत जीवन देता टीस
असंख्य गूजरे पल
जहां अनंत कामनाओ के पंख
अधिक पैनापन लिए
भरते रहे उड़ान
विलास मय क्षणो की रमणिय
द्रव्य मान रसधार का
करते  रहे पान
अचेतन वासना का आगार
बना जीवन का क्रीड़ा स्थल
ओर पीता रहा निरंतर
कामनाओ से भरा जाम
स्पर्श का नमनीय अहसास
भरता था स्पंदन
यह जीवन था
कामनाओ का अतिसार
नादान भावों को मिलते रहे
झिलमिलाते संगीत चेतना के छाये
आह वह पल
रूप रस गंध का संगम
देह देह की लहरे
ओर उनका बेबाक टकराव
उन्माद पूर्ण ध्वनि
सिहरन देती जाती
आज भी सुसुप्त कामनाओ को
सत्य नहीं जीया मैं
महसूस करता हूँ आज
पावन हृदय मे उठती रही
नित्य अतीत मे
वासना जीती लहरे
आज पीडीत हूँ
आत्म निन्दा के भाव
ओर जब देखता
उपाय निमित्त शास्त्रों की तरफ
काम्प जाता हूँ
भीतर तक
वर्जित जीवन की सूची
के बीचो बीच जीया जीवन
खुद से निन्दित हूँ मैं
ओर यह भाव देते शास्त्र सारे
नहीं समझना होगा
जीवन की सत्यता अनुभूति से
ओर वहीं सोच दे सकेगी
भीतरी गहराई
कि स्वतः उठती जाती
प्रार्थना परमात्मा की
कि वहीं गुजारा जीवन
हुआ जाता निर्मल प्रेम का
पावन दरिया
ओर आत्म निन्दा बन जाती
रागिनी सी देती वीणा स्वर।
छगन लाल गर्ग।