Monday, February 29, 2016

चाहत ।

अकेले रहना
चैतन्य की अंतिम दशा
एक नहीं हैं
सामान्य क्रिया
नहीं रह पाते
 हम अकेले
ओर
चाहत भी नहीं
कि भाता हैं
अकेलापन
ओर स्नेहिल रिस्ते
बुलाते जाते
 पास पास
सामिप्य पाने को
होते रहते
आतुर अपनत्व लिए
जुडाव की चाहत
समय के साथ
बदलती करवट
नवल
 यौवन उन्माद क्षण
समय के अंतराल से
भावना की आस्था में
करते जाते
 अलौकिक
स्नेह का अहसास
लौकिक नेह पा जाता
 प्रार्थना का राग
ओर चाहत हो जाती
पावन
विशुद्ध बन
उठती साधना सी
अंकुर हो जाता
अकेलेपन मे पल्लवित
रागमय  स्वर
हृदय की वीणा सम
तंरग भरे
कामना भरे
चाहत का यह क्षण
बन जाता
चेतन तंत्र
फिर नहीं कहता
प्रेम रहता स्थूल
पहुँच जाता
सूक्ष्म बन
परमेश्वर की प्रार्थना तक ।
छगन लाल गर्ग ।