हाँ शायद यही तक
खिंचाव आवेग सघनता भूला
मर्म अवबोध का राज पाया
फिर वहीं आकार प्रकार
संभावनाओं के तलाशने होंगे
जीवन कहां रूका
शिथिल अवस्था कब जानी
गति का आवेग मंथरता मे बदला
पर राह अधिक सुगम
उजाले लिए
बुलाती रही लुभाती रही
कदम कब रूके कि रूकेगे अब
हर हताशा हर पराजय
मिल बैठ कर लेते सामजस्य
कि मिट मिट जाते हर असत्य
निखरती सार्वजनिक राहे
उजास लिए भीतर का
ओर अबका राही नहीं रहता अज्ञात
राहो का
अनुभव का मर्म अंतिम पराजय का सच
देता रहता दिशा बोध
हर पराजय का सार
नवीन बोध का आगमन
ओर जीवन का शुद्ध संश्लेषण हैं ।
छगन लाल गर्ग।
खिंचाव आवेग सघनता भूला
मर्म अवबोध का राज पाया
फिर वहीं आकार प्रकार
संभावनाओं के तलाशने होंगे
जीवन कहां रूका
शिथिल अवस्था कब जानी
गति का आवेग मंथरता मे बदला
पर राह अधिक सुगम
उजाले लिए
बुलाती रही लुभाती रही
कदम कब रूके कि रूकेगे अब
हर हताशा हर पराजय
मिल बैठ कर लेते सामजस्य
कि मिट मिट जाते हर असत्य
निखरती सार्वजनिक राहे
उजास लिए भीतर का
ओर अबका राही नहीं रहता अज्ञात
राहो का
अनुभव का मर्म अंतिम पराजय का सच
देता रहता दिशा बोध
हर पराजय का सार
नवीन बोध का आगमन
ओर जीवन का शुद्ध संश्लेषण हैं ।
छगन लाल गर्ग।