वाजिब हैं रूठना तुम्हारा
सच्चाई के पंख कतरे
मैने मजबूरी मैरी
नहीं दोष तुम्हारा
झूठा आत्म संतोष देता
जीता रहा खुद
ओर तुम्हें देता रहा प्रवंचना
अजीब धारणाओं का साक्षी
अज्ञात आस लिए
क्षमताओ की गलती करता
पहुँचा यहाँ तक
नहीं सत्य कथन की तनिक भी
प्रमाणिकता कि दम रखू
ओर कहूँ तुमसे
कि यह छलवा नहीं
सच हैं सत्य का आधुनिक रूप
जहां रिस्ते नाते
लेते हैं गहराई मात्र
प्रदर्शन व सहयोग पृष्ठभूमि
की कृत्रिमता पर
तुम अगर यह कहो
कि प्रेम मेरा
छिछला गया कि कम हुआ
नहीं कहूँगा मैं
कि सच यह
सच मात्र इतना कि
नये परिवेश के शब्दों मे
चमक विद्युतिय आई हैं
ओर तुम्हारी ऑखो मे
रंगीन चश्मे नहीं पहने
अब अगर फिर भी
माफ ना करो
तुम्हारी मरजी पर
सच्चाई कहता उसे
सुनो तो।
छगन लाल गर्ग।
सच्चाई के पंख कतरे
मैने मजबूरी मैरी
नहीं दोष तुम्हारा
झूठा आत्म संतोष देता
जीता रहा खुद
ओर तुम्हें देता रहा प्रवंचना
अजीब धारणाओं का साक्षी
अज्ञात आस लिए
क्षमताओ की गलती करता
पहुँचा यहाँ तक
नहीं सत्य कथन की तनिक भी
प्रमाणिकता कि दम रखू
ओर कहूँ तुमसे
कि यह छलवा नहीं
सच हैं सत्य का आधुनिक रूप
जहां रिस्ते नाते
लेते हैं गहराई मात्र
प्रदर्शन व सहयोग पृष्ठभूमि
की कृत्रिमता पर
तुम अगर यह कहो
कि प्रेम मेरा
छिछला गया कि कम हुआ
नहीं कहूँगा मैं
कि सच यह
सच मात्र इतना कि
नये परिवेश के शब्दों मे
चमक विद्युतिय आई हैं
ओर तुम्हारी ऑखो मे
रंगीन चश्मे नहीं पहने
अब अगर फिर भी
माफ ना करो
तुम्हारी मरजी पर
सच्चाई कहता उसे
सुनो तो।
छगन लाल गर्ग।