Thursday, February 11, 2016

वसीयत।

अच्छा रहा मरने से पहले
याद रहा
वसीयत लिखवाना
अब जिन्दगी का कमाया
आज तक बेहिसाब रहा
ऊपर ऊपर देखते देखते
लगने लगा
दोस्तों को कमाया जमा
कोई वसीयत लायक दिखता नहीं
पर हिसाब हो जाय
साफ साफ झगड़ा टंटा ना रहे
औलाद मे
चलो आज हो जाय बंटवारा
इकाई को तोड़ना बाँटना
अभी तक के अनुभव मे
आया नहीं
बुलाता हूँ आसपास के पंच समझदार
करते है हिस्सा
पूरा पूरा
मुझे व मेरे खाट को छोडकर
खाट मेहतर को
ओर तन मेरा अग्नि को
बाकी सब मेरी ऑखो के सामने
हो चुका बँटवारा
जिन्दा रहने तक
किसके हिस्से रहूँगा मैं
अनिर्णित छोडा गया हूँ
नहीं लायक
वसीयत की तरह ।
छगन लाल गर्ग।