मेरे अंतर
अब सहा नहीं जाता
विरह का जाल
घीर चूका अनंत
नित मिटता शून्य हुआ
अणु सार
मेरे अंतर तुम हो कहां
अवरुद्ध हैं कंठ
भीतर संचित नेह
जलन की ऊष्मा पाये
हुआ अधिक विरल
नहीं रहा शब्द
बन चुका धुऑ निराकार
निशब्द
मेरे अंतर कहां हो तुम
अतीत ही रहा
स्मृति बना
रागमय क्षण अब विराग बने
घने केशपाश अब
नहीं देते छाया
घूटन देते प्राण कसक बनते
संसर्ग पल रमणीय
नहीं करते मधु वर्षा
उमस देती तीर बनी
वर्षा की बौछार
चीरने लगी
हृदय मेरा
नहीं रे नहीं चेतना
विलय चाहती अंतर मेरे
केवल तुममे
आ जाओ अब
मेरे अंतर
भरो ना मेरी रिक्तता ।
छगन लाल गर्ग।
अब सहा नहीं जाता
विरह का जाल
घीर चूका अनंत
नित मिटता शून्य हुआ
अणु सार
मेरे अंतर तुम हो कहां
अवरुद्ध हैं कंठ
भीतर संचित नेह
जलन की ऊष्मा पाये
हुआ अधिक विरल
नहीं रहा शब्द
बन चुका धुऑ निराकार
निशब्द
मेरे अंतर कहां हो तुम
अतीत ही रहा
स्मृति बना
रागमय क्षण अब विराग बने
घने केशपाश अब
नहीं देते छाया
घूटन देते प्राण कसक बनते
संसर्ग पल रमणीय
नहीं करते मधु वर्षा
उमस देती तीर बनी
वर्षा की बौछार
चीरने लगी
हृदय मेरा
नहीं रे नहीं चेतना
विलय चाहती अंतर मेरे
केवल तुममे
आ जाओ अब
मेरे अंतर
भरो ना मेरी रिक्तता ।
छगन लाल गर्ग।