अहं सत्य
इतना सा कि नहीं हो
स्थित प्रज्ञ
भ्रम आवरण सा पुञ्ज
लिपट गया तन मन व विवेक
सहारा पाया चेतन का
स्वीकार लिया
असत्य भी सत्य मान
नहीं होता मानना सत्य
सत्य स्वयं प्रत्यक्ष रहता
सूर्य की तरह
पर शायद यह भी नहीं
त्यागनी होती प्रखरता
सूर्य को भी
बादलों से क्षणिक पर प्रकट
या अस्थाई
उदित होते ही जाडो मे
तीक्ष्ण ऊर्जा हो जाती
शिथिल लंबोतरी
नहीं शास्वता का कोई पदार्थ
जो रखता हो सामर्थ्य
सत्य होना भी
अदृश्य अहं
राग तत्व लिपटा मानव
बार बार
भरता झूठा दंभ
अहंकार
सर्वोच्च होने का
अपूर्णता झलकती अधूरेपन की
बेबाक दंभ जानना कहां चाहता
अपना असली रूप
मानव का यही अहं सत्य ।
छगन लाल गर्ग।
इतना सा कि नहीं हो
स्थित प्रज्ञ
भ्रम आवरण सा पुञ्ज
लिपट गया तन मन व विवेक
सहारा पाया चेतन का
स्वीकार लिया
असत्य भी सत्य मान
नहीं होता मानना सत्य
सत्य स्वयं प्रत्यक्ष रहता
सूर्य की तरह
पर शायद यह भी नहीं
त्यागनी होती प्रखरता
सूर्य को भी
बादलों से क्षणिक पर प्रकट
या अस्थाई
उदित होते ही जाडो मे
तीक्ष्ण ऊर्जा हो जाती
शिथिल लंबोतरी
नहीं शास्वता का कोई पदार्थ
जो रखता हो सामर्थ्य
सत्य होना भी
अदृश्य अहं
राग तत्व लिपटा मानव
बार बार
भरता झूठा दंभ
अहंकार
सर्वोच्च होने का
अपूर्णता झलकती अधूरेपन की
बेबाक दंभ जानना कहां चाहता
अपना असली रूप
मानव का यही अहं सत्य ।
छगन लाल गर्ग।