Sunday, February 14, 2016

रागिनी तुम ।

यह जीवन पल पल मे
अंगार सा ज्वलन देता
तब हृदय तडप बढती घनी रे
जब तन मन अतिशय जलते रोते
स्वर चेतन मय रागिनी बनकर
पवन संग मिल ऑधी बनकर
मेरी चेतना आती हो
 तभी तुम ठंडक बनकर
घेरती रहती अस्तित्व समूचा
राहत के हिमकण उष्मा बन जाते
मीठी अद्भुत प्रेम मदिरा पीलाकर
मस्त नींद बन आगोश भर लेती
अचेतन मन मे चेतन बनकर
गिरते जीवन मे संबल बनकर
बनती हो मधुरतम लहर सी
नवल रसमयी तरंगों जैसी
अरमानो के पंख बनी सी
पसरी मेरे जीवन ऑगन
ओ आशा की चिन्गारी तुम
मेरे जीवन की हो रागिनी तुम ।
छगन लाल गर्ग।