Monday, February 29, 2016

अधूरी यात्रा ।

स्पष्ट अहसास नहीं
जीवन हैं कहां
अपने आवास देह मे
या कि विचारों के गुंफन में
नहीं स्पष्ट आभास मुझे
अपना भी कि जीता हूँ इसे मैं
या कि जीना मजबूरी
रह रहकर झेलता अपना ही विरोध
हर बात पर
झगडता हूँ अपने से
साबित करता हूँ अच्छा बुरा
अपने स्तर पर अपने लिए
जीवन मे भोगने निमित्त
नहीं पाता भीतरी तुला का सत्य
दुविधा मे भावों के आसरे
जीने लगता हूँ जिन्दगी
अनजानी अनदेखी जिन्दगी
करता जाता अफसोस भी
जब मेरे स्वार्थ होता
दूसरों का बुरा
पर संभलता नहीं फिर
लाभ का मोह खीचता जाता
मतलब की राह
अब बन चुका अपने आकार के साथ
जीवन भी बेडोल
नहीं मापदंड मानवता के
रखता पास
ओर अपने से भी जीवन से भी
नित्य बिछुड गया
नहीं जान पाया स्वत्व भी
जगत व्यवस्था भी
अब लगता यह कि जीवन
मात्र बेमतलब अधूरी यात्रा ।
छगन लाल गर्ग ।