आज मैं महसूस करता
स्वयं को भरा भरा
हर दिन निरंतर पढता जाता
नवीनतम हर ज्ञान की पुस्तकें
हर पृष्ठ का लिखा कंठस्थ हो चुका
नहीं अब कहीं चूक
हर पृष्ठ दे चुका समर्पण मुझे
ओर यह केवल एक क्षेत्र नहीं
हर ओर का ज्ञान विस्तार
सिमटा समाया है मुझमें
बहुत भर गया इस ज्ञान से
मेरी चाल मेरा व्यवहार
अब नहीं रहा मेरा
मैं जानता हूँ अतिशय अहंकार
समा गया मुझमें
उठ रहा हूँ बहुत ऊँचा
सामान्य नहीं अब मैं
अनवरत अध्ययन से हुआ हूँ शास्त्री
बड़ा भेद हो चुका
मानव की निम्नता से
अमरत्व की यात्रा का ज्ञान भरा हैं मुझमें
क्रिया कर्म जानता भी
पर दिक्कत फसा हूँ
मानव हुए बिना कि ऊँचाई
नहीं देती रास्ता
अनंत का ।
छगन लाल गर्ग।
स्वयं को भरा भरा
हर दिन निरंतर पढता जाता
नवीनतम हर ज्ञान की पुस्तकें
हर पृष्ठ का लिखा कंठस्थ हो चुका
नहीं अब कहीं चूक
हर पृष्ठ दे चुका समर्पण मुझे
ओर यह केवल एक क्षेत्र नहीं
हर ओर का ज्ञान विस्तार
सिमटा समाया है मुझमें
बहुत भर गया इस ज्ञान से
मेरी चाल मेरा व्यवहार
अब नहीं रहा मेरा
मैं जानता हूँ अतिशय अहंकार
समा गया मुझमें
उठ रहा हूँ बहुत ऊँचा
सामान्य नहीं अब मैं
अनवरत अध्ययन से हुआ हूँ शास्त्री
बड़ा भेद हो चुका
मानव की निम्नता से
अमरत्व की यात्रा का ज्ञान भरा हैं मुझमें
क्रिया कर्म जानता भी
पर दिक्कत फसा हूँ
मानव हुए बिना कि ऊँचाई
नहीं देती रास्ता
अनंत का ।
छगन लाल गर्ग।