समेटने लगता नित्य
फैलाव का दरिया
घनाकार हुआ जाता वर्चस्व
अतिशय हिलोर लेता
स्थापित करता जाता लकीर
अहंकार भरी
निरंतर अभ्यस्त जिन्दगी
नही चाहती संतोष का विश्राम
बढना चाहती अज्ञात विस्मय
टटोलने श्रेष्ठता के
जहां भराव पाने का मिले
कुछ अहसास
जहां नही लगे जीवन एक नियम
एक अनंत ऊँचाई की ऊडान का
ना मिले अंत
लगातार अथक होता रहे
असीम मे ऊडान
कि दुनिया जान सके अचंभे का राज
मेरे समूल अस्तित्व की अपरिमित
श्रेष्ठता
ओर यही सब पाने निमित
समेटते फैलाव को
नित्य लेता हूँ कसौटी की तरह
कि स्वयं बन सकूं अनंत असीम
जहां कभी ना हो
संतुलन मानव की तरह
जीवन रहे ना रहे
भावनाओ का उफान
भरता रहे प्राण मे असीम की ऊर्जा
राग अचेतन बनकर ।
छगनलाल गर्ग ।
फैलाव का दरिया
घनाकार हुआ जाता वर्चस्व
अतिशय हिलोर लेता
स्थापित करता जाता लकीर
अहंकार भरी
निरंतर अभ्यस्त जिन्दगी
नही चाहती संतोष का विश्राम
बढना चाहती अज्ञात विस्मय
टटोलने श्रेष्ठता के
जहां भराव पाने का मिले
कुछ अहसास
जहां नही लगे जीवन एक नियम
एक अनंत ऊँचाई की ऊडान का
ना मिले अंत
लगातार अथक होता रहे
असीम मे ऊडान
कि दुनिया जान सके अचंभे का राज
मेरे समूल अस्तित्व की अपरिमित
श्रेष्ठता
ओर यही सब पाने निमित
समेटते फैलाव को
नित्य लेता हूँ कसौटी की तरह
कि स्वयं बन सकूं अनंत असीम
जहां कभी ना हो
संतुलन मानव की तरह
जीवन रहे ना रहे
भावनाओ का उफान
भरता रहे प्राण मे असीम की ऊर्जा
राग अचेतन बनकर ।
छगनलाल गर्ग ।