Sunday, February 7, 2016

नमन जीवन ।

बड़ी अहंमन्यता घीर चुका
नहीं जानता उपाय
आनन्द का गरिमामय सार
महसूस करता
जीने लगा हूँ मेरे जीवन तुम्हें
साथ हो ना मेरे
एक नया स्थान
तुम्हारी क्षमता से अधिक
सच बताओ
क्या नहीं करते अहसास
 मर्यादा तुम अपनी
बाकी सच कहूँ
नहीं लगता गुणों का कोई कतरा
समाया लगता तुम्हारे भीतर
अच्छा रहा
सद कुल ओर प्रतिष्ठित घर पाया
हीन योग्यता रहते
कहां से होता सबकुछ
चलो पुण्य पूर्व जन्म का
आधार बना
अब बनता हैं हक
कि झुके निर्बल निर्धन
बंधे रहे
समर्पित हुए बिना
उनके अधिकार का दावा
हमारे रहते
दम नहीं रखता
समर्पित जीवन मे ही
मुक्ति संभव हैं
जरूरत जीवन जीने की
यदि चाहे तो रखे
नमन जीवन ।
छगन लाल गर्ग।