Wednesday, February 10, 2016

समर्पण ।

यह सत्य कैसे कहूँ
की कोमल
सबल रहता
 स्वीकार नहीं होता
यह हैं तर्क सम्मत
कि व्यक्ति पनपता
अपने जीवट
अपनी प्रबल क्षमता
अपने सतत संघर्ष के बल
ओर पाता वर्चस्व
बच जाता
प्रकृति की मार से
अपनी हुनर अपनी दम पर
सबलतम जो ठहरा
बौद्धिकता की साक्षी
पुख्तापन देती विचार बनता
अधिक सत्य
पर नहीं
हृदय की बात यह
ठोस ढहता टूटता
कोमल बच जाता अपनी
सूक्ष्मता को लेकर
कोमल जीत जाता
जीवन की बाजी
समर्पित हैं प्रवृत्ति उसकी
निरंकार हैं वृति
जल सी गति
समर्पित जीवन सार हैं
यदि जीने मे
आ जाये ।
छगन लाल गर्ग।