Sunday, February 7, 2016

जल उठी धूप ।

 वेदना ताप भीतर रस सोखता
शुष्क धरातल हृदय कर चूका
अब नहीं कहीं छाया
कि आद्रता मिले संतापो को
अधिक उघडे कसक पाये
रीसने लगे घाव
कि उष्मा का जमाव
जलाता जाता
नहीं रहा घावो मे भी पानी
कि कहे
रोता हूँ विरह वेदना के पानी
उठता धूऑ भीतर का
बाहर आया ओर वेदना पाता
धूप बाहरी घनी हो गयी
जलते अस्तित्व के साथ
लेता हूँ औट वृक्ष की
बाहरी छाया घनीभूत हुई
देती तन को शीतल समीर
पर अन्तर्मन की दशा
ओर बिगडती
अहसास पाता हूँ
मन उडना चाहता
आकाश मे उडते बादलों के साथ
मन विकार भी देखो ना
कितने हैं बेजोड़
ठीक इन उडते बादलों की तरह
गगन को घेरे हैं बादल
मन को घेरे हैं विकार
घना अंधेरा छलक आया
गगन मे
बादलों के रहते
उडते छंटते भी निरंतर
स्वच्छ होना होगा आकाश को
निर्मल पावन निष्पक्ष
मेरे हृदय के भीतर घूमडते
विकार हट सकेंगे
शायद
जरूरत पूर्व नियोजित
प्रकृति की संयोजन दशा
ओर विकार हटे कि
निश्छल पावन सुप्त स्नेह धारा की
कठोर शिला टूटी
विकार हुए शून्य
बह उठेगा फिर फिर
अवरुद्ध स्नेह स्त्रोत
बहना ही चाहता
तब अविरल आनन्द
इस जलती धूप भी ।
छगन लाल गर्ग।